9/23/2020

अध्यक्षात्मक शासन अर्थ, विशेषताएं, गुण एवं दोष

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लोकतंत्र मे दो प्रकार की शासन प्रणालियाँ सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रचलित है, एक संसदात्मक शासन प्रणाली और दूसरी अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली। इन दोनों प्रणालियों मे अंतर कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के पारस्परिक संबंधों के कारण है। जहाँ कार्यपालिका और संसदात्मक सरकार है तथा जहाँ कार्यपालिका और व्यवस्थापिका पृथक है और एक-दूसरे को परस्पर नियंत्रण करती है तथा कार्यपालिका प्रमुख वास्तविक शासक है वहां अध्यक्षात्मक सरकार है। यहाँ हम अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का अर्थ, अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएं और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण एवं दोषों की चर्चा करेंगे।

अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का अर्थ (adhyakshatmak shasan arth)

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वह शासन प्रणाली है जिसमे कार्यपालिका वैधानिक रूप से व्यवस्थापिका से पृथक होती है तथा कार्यपालिका व्यवस्थापिका के सदस्यों से नही बनती। कार्यपालिका अपनी नीतियों तथा कृत्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी भी नही होती। 

दूसरे शब्दों में " जिस शासन व्यवस्था मे कार्यपालिका प्रधान व्यवस्थापिका से बिल्कुल अगल होता है और शासन विभाग का प्रधान एक ऐसा व्यक्ति होता है जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नही होता, उसे अध्यक्षीय शासन कहते है। 

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएं या लक्षण (adhyakshatmak shasan ki visheshta)

1. नाममात्र की और वास्तविक कार्यपालिका पृथक नही 

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली मे नाममात्र की और वास्तविक कार्यपालिका मे कोई भेद नही होता। राष्ट्रपति ही दोनों कार्यपालिका होता है। उसका निर्वाचन जनता द्वारा किया जाता है। लास्की का कहना है कि " वह सभी कार्यपालक निर्णयों का अंतिम स्त्रोत है। वह राज्य और शासन दोनों का प्रमुख है।

2. कार्यपालिका व व्यवस्थापिका का पृथक्करण 

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली मे कार्यपालिका के सदस्य व्यवस्थापिका के सदस्य नही होते और न ही उसकी कार्यवाहियों मे भाग लेते है। अमेरिकी मे राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल के सदस्य कांग्रेस की कार्यवाहियों मे भाग नही लेते तथा कांग्रेस के सदस्य नही होते। यदि कार्यपालिका को अपने अनुकूल कोई विधेयक पारित करवाना होता है तो अप्रत्यक्ष रूप मे कांग्रेस के सदस्यों द्वारा ही ऐसा करा सकते है। राष्ट्रपति व्यवस्थापिका को संदेश प्रेषित कर सकता है पर उस पर ध्यान देना या न देना व्यवस्थापिका पर निर्भर करता है। इसी प्रकार वह व्यवस्थापिका के कार्यों मे हस्तक्षेप नही कर सकता। वह व्यवस्थापिका को विघटित नही कर सकता उसका अधिवेशन नही बुला सकता। इस प्रकार दोनों ही स्वतंत्र है।

3. कार्यपालिका के कार्यकाल की निश्चितता 

कार्यपालिका कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नही होती। उसका संविधान द्वारा निश्चित कार्यकाल होता है जिसके पूर्व केवल महाभियोग द्वारा ही उसे हटाया जा सकता है पर महाभियोग एक जटिल प्रक्रिया है। अमेरिकी शासन व्यवस्था के लगभग दो सौ वर्ष के लंबे इतिहास मे केवल दो बार राष्ट्रपति जैक्सन और राष्ट्रपति क्लिंटन के विरूद्ध महाभियोग का असफल प्रयोग किया गया था। व्यवस्थापिका द्वारा अविश्वास का कोई प्रश्न ही नही उठता। राष्ट्रपति व्यवस्थापिका के अधिवेशनों का उद्घाटन भी नही करता, उसे तो केवल संदेश भेजने का अधिकार है।

4. व्यवस्थापिका का कार्यकाल निश्चित 

जिस प्रकार राष्ट्रपति संविधान द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है, उसी तरह व्यवस्थापिका भी एक निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित होती है और राष्ट्रपति उसको भंग नही कर सकता। 

5. अवरोध व असंतुलन की प्रणाली 

शक्ति पृथक्करण के साथ इस प्रणाली मे अवरोध और संतुलन के सिद्धांत का पालन किया जाता है। कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका अपने-अपने क्षेत्र मे सर्वोच्च है पर साथ ही अवरोध और संतुलन की प्रणाली के कारण कोई भी स्वेच्छाचारी नही हो सकता उदाहरण के लिए अमेरिका मे राष्ट्रपति अपने सलाहकारों की तथा राजदूतों आदि की नियुक्तियां करता है, विदेशों से संधियाँ भी करता है पर उनकी सीनेट द्वारा पुष्टि होना आवश्यक माना गया है।

संदर्भ मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण (adhyakshatmak shasan ke gun)

1. स्थायित्व 

यह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का सबसे बड़ा गुण है कि इसमे सरकारों के बार-बार बदलने और मध्यावधि चुनावों का खतरा नही रहता। सरकार एक निश्चित समयावधि के लिये निर्वाचित होती है। बीच मे उसे केवल "महाभियोग" द्वारा ही हटाया जा सकता है।

2. नीतियों मे स्थायित्व 

सरकार स्थायी रहने से उसकी बनने वाली नीतियाँ भी लम्बे समय तक स्थायी रहने की गारंटी होती है। इसमे जनता, व्यापारी और विदेशियों को सुनिश्चितता रहती है।

3. विशेषज्ञों का शासन 

संसदीय शासन प्रणाली के विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली विशेषज्ञों और निपुण लोगों द्वारा शासित प्रणाली मानी जाती है। राष्ट्रपति अपने सलाहकारों की नियुक्ति दलगत राजनीति से पृथक होकर करता है। संसदीय प्रणाली मे संभव है कि एक व्यापारी शिक्षा मंत्री अथवा विदेश मंत्री बन जाए पर अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था मे यह संभव नही है। 

4. दलबन्दी की बुराईयों से मुक्ति 

इस प्रकार की शासन व्यवस्था मे सरकार राजनीतिक दलबन्दी की प्रणाली से कम से कम प्रभावित होती है।

5. बहुलीय प्रणाली के लिए सर्वाधिक उपयुक्त 

दलीय प्रणाली प्रजातंत्र का आधार है पर द्विदलीय प्रणाली और बहुदलीय प्रणाली दोनों की भूमिकाएँ प्रजातंत्र मे अपने परिणामों को प्रकट करती है। बहुदलीय प्रणाली प्रायः अस्थिरता लाती है जनमत किसी भी प्रश्न पर स्पष्ट राय नही दे पाता वह कई भागों मे विभाजित हो जाता है। शासन पर इसका यह प्रभाव पड़ता है कि सरकार बहुत जल्दी-जल्दी बदलती रहती है जैसा कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद और द्वितीय विश्वयुद्ध मे फ्रांस के पतन के बीच हुआ वहाँ 42 बार सरकारें बदली। 

भारत मे भी यह हो चुका है। अध्यक्षीय सरकारे इन प्रभावों से मुक्त रहती है क्योंकि अध्यक्षीय सरकारों का कार्यकाल निश्चित होता है वहाँ मध्यावधि चुनाव नही होते तथा कार्यपालिका के प्रधान का भी कार्यकाल निश्चित होता है उसे व्यवस्थापिका के समर्थन की आवश्यकता नही होती अतः बहुदलीय व्यवस्था भी अस्थिरता नही ला सकती।

अध्यक्षात्मक शासन के दोष (adhyakshatmak shasan ke dosh)

1. विधायी और प्रशासनिक कार्यों मे सहयोग का अभाव 

आपस मे सहयोग का अभाव इस शासन व्यवस्था का मुख्य दोष है। इससे न प्रशासन ठीक प्रकार से चल पाता है, न उसकी आवश्यकता के अनुरूप विधि बन पाती है। 

2. उत्तरदायित्वहीनता

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली मे कार्य पालिका अनुत्तरदायी होती है, अतः वह एक निश्चित समयावधि के लिये निरंकुश बन जाती है। कार्य पालिका शक्ति का राष्ट्रपति के हाथों मे केन्द्रीयकरण हो जाता है। कहा जाता है कि राष्ट्रपति 4 या 5 वर्ष के लिये तानाशाह बन जाता है।

3. लचीलापन का अभाव 

संसदात्मक शासन प्रणाली की यह विशेषता है कि वह लचीली होती है इसलिए वह कई राजनीतिक दबावों को सह जाती है परन्तु अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली मे लचीलापन नही होता। यहाँ संवैधानिक परम्पराएं कम होती है सब कुछ संविधान के अनुसार चलता है। यदि कोई परिस्थिति आ जाए तो राष्ट्रपति व्यवस्थापिका को शीघ्र कानून बनाने के लिए प्रभावित नही कर सकता और न व्यवस्थापिका किसी विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए राष्ट्रपति को प्रभावित कर सकती है।

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