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11/09/2021

पाठ योजना का महत्व/आवश्यकता

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पाठ योजना का महत्व एवं आवश्‍यकता 

path yojna ka mahatva;एक सफल शिक्षक की सफलता का रहस्य उसके पाठों की पूर्व योजनाएँ होती हैं। अतः सफल शिक्षक के लिए पाठों की पूर्व योजना अति आवश्यक है। पूर्व योजना से वह अपने शिक्षण उद्देश्यों को भली-भाँति प्राप्त करने मे स्वयं को सक्षम पाता हैं। पाठ योजनाओं की आवश्‍यकाताओं तथा महत्व निम्नलिखित हैं-- 

1. लक्ष्यों की स्पष्टता 

अमुक पाठ का शिक्षण क्यों प्रदान किया जा रहा हैं? जब तक अध्यापक स्वयं इस प्रश्न के उत्तर के प्रति स्पष्ट नहीं, तब तक वह अपने शिक्षण-कार्य में रूचि ले सकता। कोई भी कार्य करने से पूर्व व्यक्ति को उसका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। इसी तरह शिक्षण-कार्य शुरू करने से पहले अध्यापक को स्पष्ट रूप से ज्ञात होता चाहिए कि जिस पाठ को वह पढ़ाने जा रहा हैं उस पाठ को पढ़ाने से उसे किन उद्देश्यों की प्राप्ति करनी है। 'पाठ-योजना' उसे पाठ के लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से निश्चित तथा निर्धारित करने में सहायक सिद्ध होती हैं। 

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2. शिक्षण-विधियों का चयन 

शिक्षण के उद्देश्य निश्चित कर लेने के बाद अध्यापक को उचित शिक्षण-विधियों के चयन की आवश्यकता होती हैं। कई नई पुरानी शिक्षण-विधियाँ प्रचलित हैं। जैसे-- 'पाठ्य-पुस्तक विधि', भाषण विधि, समस्या विधि, वाद-विवाद विधि, प्रोजेक्ट विधि आदि। कौनसी शिक्षण-विधि पाठ्य-विषय पढ़ाने के अनुकूल होगी-इसका निर्णय पहले से लेना जरूरी है। यह निर्णय लेते समय अध्यापक को विद्यार्थियों की योग्यताओं तथा क्षमताओं का भी ध्यान रखना होता है एवं चुनी गई शिक्षण-विधि की कार्य-प्रक्रिया का भी ध्यान रखना होता हैं। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षण-विधि की कार्य-प्रक्रिया को लिखा जाये ताकि उसके सुनिश्चित संचालन में अध्यापक को किसी तरह की कठिनाई का सामना न करना पड़े। अतः 'पाठ-योजना' शिक्षण की प्रक्रिया को प्रभावशाली ढंग से संचालन में मददगार सिद्ध होती हैं। 

3. समस्याओं का ज्ञान 

पाठ के संबंध में उत्पन्न होने वाली समस्याओं तथा कठिनाइयों के बारे में तथा उनके हल के बारे में शिक्षक पाठ-योजना के माध्यम से पहले ही सोच-विचार कर लेता हैं। अतः इस दृष्टिकोण से भी पाठ-योजना आवश्यक हैं। 

4. शिक्षण-सामग्री की व्यवस्था में मददगार 

शिक्षण-विधि के अनुरूप अपने शिक्षण को प्रभावशाली एवं सुबोध बनाने हेतु अध्यापक को विभिन्न प्रकार के मददगार साधनों की आवश्यकता पड़ती है। अगर इन साधनों का पहले से निश्चय करके इनकी व्यवस्था कर ली जाये तो तो शिक्षण-कार्य के सुसंचालन में मदद होती है। इस तरह पाठ-योजना शिक्षण-सामग्री की व्यवस्था में सहायक सिद्ध होती हैं। 

5. समय तथा शक्ति में बचत 

'पाठ-योजना' के निर्माण से अध्यापक तथा छात्रों के समय में बचत होती है एवं उनकी शक्ति का भी अपव्यय नहीं होता। योजना के अनुसार समूचा शिक्षण-कार्य स्वाभाविक गति से चलता रहता हैं। अध्यापक को पता है कि उसे कब क्या करना हैं? उसे यह भी पता होता है कि छात्रों को क्या करना हैं? इसलिए छात्रों की शक्ति का भी सार्थक उपयोग होता हैं। 

6. रूचिकर शिक्षण के लिए 

पाठ को सरल, स्पष्ट तथा रूचिकर बनाने के लिए उपयुक्त विधियों, नीतियों तथा युक्तियों का चयन पहले से ही कर लेना चाहिए। अतः इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षक को पाठ योजना भी पहले से ही तैयार कर लेनी चाहिए। विद्यार्थियों को अधिगम के लिए प्रेरित करने हेतु पाठ योजना शिक्षक के मन में स्पष्ट होनी चाहिए। 

7. अनुशासनहीनता पर नियंत्रण 

कई बार कक्षा में अनुशासनहीनता के कारण शिक्षक की तैयारी का न होना होता है। विद्यार्थी कक्षा में शिक्षक की अस्पष्ट क्रियाओं से उत्तेजित एवं अनुशासनहीन हो जाते हैं। अतः इस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए पाठ योजना का होना बहुत ही महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। इससे विद्यार्थी स्वयं क्रिया करने या चिंतन करने में व्यस्त रहते हैं। 

8. आत्मविश्वास की वृद्धि में मददगार 

अध्यापक शिक्षण-कार्य के लिए जितना तैयार होगा उतना अधिक वह अपने आप में आत्म-विश्वास महसूस करेगा तथा यह निश्चित है कि पाठ-योजना अध्यापक को पढ़ाने हेतु तैयार करती हैं। पाठ-योजना से सुसज्जित अध्यापक पूर्ण विश्वास के साथ कक्षा में जाता हैं। उसे पहले से मालमू होता हैं कि उसे कहाँ क्या करना हैं? किन-किन सोपानों में से गुजरना हैं? छात्रों को कैसे प्रेरित एवं व्यस्त करना हैं- आदि। अतः उसका आत्मविश्वास कहीं भी शिथिल नही होता। आत्मविश्वास की यह पूर्णता उसके शिक्षण-कार्य को रोचक, उपयोगी, प्रभावशाली, संतोषजनक एवं आनंददाय बनाती हैं। अतः पाठ-योजना आत्मविश्वास की वृद्धि में मददगार सिद्ध होती हैं। 

9. व्यक्तिगत विभिन्नताओं का उपयोग 

व्यक्तिगत विभिन्नताओं का उपयोग भी पाठ योजना में सहायक हो सकता है। शिक्षक कक्षा के विद्यार्थियों की विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर विभिन्न प्रकार की पाठ योजना तैयार कर सकता हैं। अतः व्यक्तिगत विभिन्नताओं के कारण भी पाठ योजना की आवश्यकता रहती हैं।

10. रूपरेखा प्रदान करना 

शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए पाठ योजना कक्षा की क्रियाओं के लिए रूपरेखा प्रदान करती है। इस प्रकार हम देखते है कि पाठ योजना की आज के आधुनिक युग में कितनी आवश्यकता है और इसका कितना महत्व हैं। मनोवैज्ञानिक आधार पर भी पाठ योजना शिक्षक को कक्षा में नैतिक बल प्रदान करती है। अतः कक्षा में जाने से पूर्व शिक्षक को अपने पाठ की योजना अवश्य तैयार कर लेनी चाहिए। 

11. पाठ्यक्रम को समय पर समाप्त करने में मददगार 

अध्यापक को निश्चित समय में निर्धारित पाठ्यक्रम खत्म करना होता है। इसके लिए जरूरी है कि समूचे पाठ्यक्रम को मासिक या त्रैमासिक इकाइयों में बाँट दिया जाये तथा फिर प्रत्येक इकाई को दैनिक पाठ-योजना में विभाजित कर दिया जाये। इस तरह पाठ्यक्रम संतुलित रूप से समाप्ति की तरह अग्रसर होता हैं। 'पाठ-योजना' से अध्यापक को पता लगता रहता है कि कितना पाठ्यक्रम समाप्त हो गया तथा कितना शेष रहता है। पाठ-योजनाओं के अभाव में अध्यापक एक ही पाठ को दो-दो, तीन-तीन बार पढ़ाने की भूल कर बैठता है। इस तरह पाठ-योजना अध्यापक को समय पर पाठ्यक्रम समाप्त करने में मददगार सिद्ध होती हैं।

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