4/28/2022

तिलक के राजनीतिक विचार

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प्रश्न; लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कौन थे? भारतीय राजनीतिक चिंतन को उनकी क्या देन हैं? 

अथवा" तिलक के राजनीतिक विचारों की विवेचना कीजिए। 

अथवा" एक राजनीतिक विचारक के रूप में तिलक का मूल्यांकन कीजिए। 

उत्तर--

lokmanya bal gangadhar tilak ke rajnitik vichar;लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक उग्रवादी विचारक और नेता थे। वे भारतीय राष्ट्रीयता के अग्रदूत थे। वे भारत में राजनीतिज्ञ ही नहीं धर्मशास्त्री, तत्व चिंतिक, समाजशास्त्री और शिक्षाशास्त्री भी थे। उनका जन्म 1 अगस्त, 1856 को महाराष्ट्र के एक चितपावन ब्राह्राण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम गंगाधर तिलक था। उन्होंने 1872 में हाई स्कूल तथा 1876 में बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने स्नातकोत्तर स्तर पर कानून की शिक्षा प्राप्त की। उनके मन में देश की ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति की तीव्र अदम्य इच्छा थी। वे एक शिक्षाशास्त्री एवं पत्रकार के रूप में राष्ट्र की सेवा में संलग्न हुए। वे एक महान समाज सेवक भी थे। 

उन्होंने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को उग्रवादी रूप प्रदान किया तथा साथ ही विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विषयों पर अपने ओजस्वी विचार भी व्यक्त किए। अपने जेल जीवन के समय तिलक ने 'गीता रहस्य' जैसी उत्तम पुस्तक लिखी तथा जेल के बाहर वह 'मराठा' तथा 'केसरी' पत्रों में अपने विचार वक्त करते रहें। 

डाॅ. अवस्थी के शब्दों में," कांग्रेस के मंच पर जो विशाल प्रबद्ध व्यक्ति अब तक आए तिलक उनसे बिल्कुल निराले थे क्योंकि सक्रिय क्रान्तिकारी होने के साथ ही वे एक महान् विद्वान भी थे।"

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राजनीतिक विचार 

तिलक के स्वराज संबंधी विचार 

तिलक के राजनीतिक चिंतन का सर्वोच्च उद्देश्‍य भारत को राजनीतिक दासता से मुक्त करने हेतु "स्वराज्य" की प्राप्‍ति था। स्वराज्य की सिद्धि की उनकी आत्मिक तीव्र इच्छा थी, जो "स्वशासन" की माँग करने वाले अनेक नेताओं में नहीं थी। यही कारण है कि उनका सारा राजनीतिक जीवन "स्वराज्य" सिद्धि के लिए समर्पित रहा; तथा जिस समर्पण के लिए सरकारी यातनाओं को तटस्थ एवं सहज दार्शनिक भाव से सहन किया। तिलक की यह मूल मान्यता थी कि देश तथा उसके लोगों की सेवा ईश्वर की ही सेवा हैं। इसी भावना से उन्होंने 1897 और 1908 के अभियोगों में दिए गए कारावास के दण्डों को स्वीकार किया; और इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने लखनऊ कांग्रेस के अधिवेशन में देश में यह मंत्र फूँका कि," स्वराज्य मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।" 

तिलक की दृष्टि से स्वराज्य केवल देश की राजनीतिक माँग ही नही बल्कि उसकी नैतिक आवश्यकता भी हैं। 

तिलक पहले भारतीय विचारक थे, जिन्होंने कहा था," स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगें। तिलक केवल कुछ रियायतें प्राप्त करने से सन्तुष्ट नहीं थे। वे मानते थे कि कुछ सुधारवादी टुकड़ों से भारत को सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। भारत अतीत में एक महान देश रहा हैं। यह भारत की गरिमा के सर्वथा अनुकूल होगा कि हम पूर्ण स्वराज प्राप्त करें।

तिलक के स्वतंत्रता संबंधी विचार 

एक राजनीतिक विचारक होने के नाते तिलक स्वतंत्रता की अवधारणा से परिचित थे। उन्होंने स्वतंत्रता संबंधी विचार भी व्यक्त किये, परन्तु उनकी स्वतंत्रता की धारणा पाश्चात्य धारणा से कुछ भिन्न थी। तिलक स्वतंत्रता को राजनीतिक ही नहीं, आध्यात्मिक रूप में भी देखते थे। तिलकजी के शब्दों में," स्वतंत्रता स्वशासन की आत्मा हैं। स्वशासन की दैवी प्रवृत्ति कभी समाप्त नहीं होती। स्वतंत्रता व्यक्तिगत आत्मा का प्राण हैं। इसे वेदान्त ने ईश्वर का रूप माना हैं। 

इसका अर्थ यह नहीं कि तिलक ने राजनीतिक स्वतंत्रता की उपेक्षा की, बल्कि वे तो राजनीतिक स्वतंत्रता को आध्यात्मिक स्वतंत्रता की आवश्यक शर्त मानते थें। जो समाज राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं, वह नैतिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र कैसा हो सकता हैं।

तिलक के अंतरराष्ट्रीयवाद तथा विश्व-बंधुत्व संबंधी विचार 

वेदांत की मानव एकता की धारणा को राष्ट्रवाद के माध्यम से व्‍यक्त कर विश्व-बंधुत्व की स्थापना करना तिलक का अंतिम लक्ष्य था। 

तिलक के अनुसार," सभी दृष्टियों से भातर एक साधन युक्त तथा स्वावलंबी देश हैं एवं संसार के किसी देश की भूमि पर उसका कोई दावा नहीं हैं। अपने विशाल भू-भाग अपरिमित साधन और अपार जनसंख्या के आधार पर भारत विश्व की एक महान शक्ति बनने की आकांक्षा रखता हैं। प्रस्तावित राष्ट्रसंघ का भारत एक प्रबल समर्थक हो सकता हैं।"

तिलक के स्वदेशी और बहिष्कार संबंधी विचार 

तिलक ने बहिष्कार को राजनीतिक अस्त्र के रूप में अपनाया। उनकी धारणा थी कि हम ब्रिटिश शासन, उसके प्रशसनिक तंत्र का, उसके अधिकारियों का, उसके कानूनों एवं न्यायालयों का बहिष्कार करके, उनके साथ सभी भाँति से असहयोग करके, शासन को पंगु बनाया जा सकता हैं। उनकी नीति थी कि इस प्रकार दबाव डाल कर सरकार को मजबूर किया जाये कि वह भारतीयों की स्वराज्य की माँग स्वीकार करें। 

तिलक ने केसरी में लिखा हैं," हमारा राष्ट्र एक वृक्ष की तरह है जिसका मूल तना स्वराज्य हैं तथा सूवदेशी तथा बहिष्कार शाखाएं हैं।" 

तिलक के राष्ट्रवादी विचार 

तिलक जी एक राष्ट्रवादी विचारक थे। वे अपने देश को प्राचीन गौरवमय स्थान पर फिर से प्रतिष्ठित होते देखना चाहते थे। एक राष्ट्रवादी के रूप में तिलक चाहते थे कि भारत राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त बने ताकि विश्व में उसका सम्मान हो। तिलक जी ने कहा था," अपने विशाल भू-भाग, अपरिमित साधन और अपार जनसंख्या के आधार पर भारत विश्व की महान् शक्ति बनने की आकांक्षा रखता हैं।"

तिलक जी हिन्दू और मुसलमानों में कोई भेद नहीं करते थे, तथापि एक अच्छे हिन्दू होने के नाते उन्हें हिन्दू धर्म पर गर्व था। कई बार उन पर यह आरोप लगाया गया हैं कि वे साम्प्रदायिक थे। इस आरोप की असत्यता का इससे बड़ा और प्रमाण क्या हो सकता है कि जिन्ना ने कहा था," तिलक मेरे गुरू थे।" 

तिलक के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों के बारे में एम. एन. राय ने कहा था," व्यक्तिगत रूप से उनकी गंभीर आस्था भारतीय धर्म और संस्कृति में थी। एक सच्चें जननेता के रूप में बिना किसी भेदभाव के उन्होंने 'भारतीय राष्ट्रवाद' को जगाना चाहा था।

क्रांतिकारी अथवा हिंसावादी 

लोकमान्य तिलक ने राजनीतिक उग्रवाद का पोषण करते हुए हिंसा तथा क्रांति को कभी प्रोत्साहन नहीं दिया। तिलक के विरोधियों तथा उनके राज-दर्शन के विदेशी व्याख्याताओं ने उन पर क्रांतिकारी और हिंसावादी होने का आरोप लगाया।

मूल्‍यांकन 

तिलक वो पहले नेता थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में जनशक्ति के महत्व को पहचाना था। उन्होंने 'शिवाजी उत्सव' तथा गणेश उत्सव के माध्यम से भारत में जन जागरण का जो महान यज्ञ आरंभ किया था वह ऐतिहासिक महत्व का हैं। 

शिरोल के अनुसार," तिलक भारतीय अशांति के जनक थे।" हालांकि शिरोध ऐसा कहकर उन दिनों तिलक को राजद्रोही सिद्ध करना चाहते थे लेकिन उन दिनों अंग्रेजों की नजरों में जो राजद्रोही था वही तो भारतीयों की आंखों का तारा था। इस अशांति के जनक तो स्वयं अंग्रेज थे। 

तिलक की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपने देश, अपने धर्म तथा अपने इतिहास पर गर्व करते थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा," स्वराज्य मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार हैं और मैं इसे लेकर रहूँगा।

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