12/28/2021

भीमराव अंबेडकर के सामाजिक विचार

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प्रश्न; डाॅ. भीमराव अम्बेडकर 'राजनीतिक विचारक की अपेक्षा एक समाज सुधारक अधिक थे।' इस कथन की विवेचना कीजिए। 

अथवा" डाॅ. अंबेडकर दलित वर्ग के मसीहा के रूप में जाने जाते हैं। समझाइए। 

अथवा" डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की आदर्श समाज की अवधारण की विवेचना कीजिए। 

अथवा" डाॅक्टर भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक विचार लिखिए।

उत्तर--

डाॅ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक विचार  

bhim rao ambedkar ke samajik vichar;डॉ. भीमराव अम्बेडकर मूलतः एक समाज सुधारक अथवा समाजिक चिंतक थे। वह हिन्दु समाज द्वारा स्थापित समाजिक व्यवस्था से काफी असंतुष्ट थे और उन में सुधार की मांग करते थे ताकि सर्व धर्म सम्भाव पर आधारित समाज की स्थापना की जा सके। अम्बेडकर ने अस्पृश्यता के उन्मूलन और अस्पृश्यों की भौतिक प्रगति के लिए अथक प्रयास किय । वे 1924 से जीवन पर्यन्त अस्पृश्यों का आंदोलन चलाते रहे। उनका दृढ विश्वास था कि अस्पृश्यता के उन्मूलन के बिना देश की प्रगति नहीं हो सकती। अम्बेडकर का मानना था कि अस्पृश्यता का उन्मूलन जाति-व्यवस्था की समाप्ति के साथ जुड़ा हुआ है और जाति व्यवस्था धार्मिक अवधारणा से संबद्ध है। समाजिक सुधारों को प्रमुखता

समाज सुधार हमेशा डॉ. अम्बेडकर की प्रथम वरीयता रही। उनका विश्वास था कि आर्थिक और राजनीतिक मामले समाजिक न्याय के लक्ष्य की प्राप्ति के बाद निपटाये जाने चाहिए। अम्बेडकर का विचार था कि अर्थिक विकास सभी समाजिक समस्याओं का समाधान कर देगा। जातिवादी हिंदुओं की मानसिक दासता की अभिव्यक्ति है। इस प्रकार जातिवाद के पिशाच/बुराई के निवारण के बिना कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। हमारे समाज में क्रांतिकारी बदलाव के लिए समाजिक सुधार पूर्व शर्त है समाजिक सुधारों में परिवार व्यवस्था में सुधार और धार्मिक सुधार भी शामिल है परिवार सुधारों में बाल विवाह जैसे कुप्रथाओं की समाप्ति भी शामिल है। अम्बेडकर ने भारतीय समाज में महिलाओं की गिरती स्थिति की कटु आलोचना की उनका मानना था कि महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार मिलने चाहिए और उन्हें भी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को सम्मति के अधिकार से वचिंत रखा गया है। हिंदू कोड बिल जो उन्होंने ही तैयार करवाया था उन्होने यह ध्यान रखा कि महिलाओं को भी सम्पति में एक हिस्सा मिलना चाहिए। उन्होंने अस्पृश्यों को संगठित करते समय अस्पृश्य समुदाय की महिलाओं का आगे आने के लिए सदैव आहवान किया कि वे राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भाग ले। 

जाति प्रथा का विरोध  

डॉ. भीम राव अम्बेडकर जाति प्रथा के कट्टर विरोधी थे। जाति प्रथा का विरोधी होने का मुख्य कारण उनके स्वयं का भुक्त भोगी होना था वह जाति प्रथा को वर्ण व्यवस्था का आधुनिक और घृणित रूप मानते थे क्योंकि समयानुसार वर्ण व्यवस्था में जटिलता आ गई और उसने जाति प्रथा का रूप धारण कर लिया था। अब व्यक्ति को उसके कार्यों की अपेक्षा जाति से जाना जाने लगा था। जहां समान जाति की उपजातियों के लोगों में भोजन, सदाचार व्यवसाय की समानता होने से विवाह सम्बन्धों की स्थापना हुई और उसने जाति व्यवस्था को मजबूती एवं स्थायित्व प्रदान किया। डॉ।  भीम राव अम्बेडकर ने जाति प्रथा के विरोध के निम्नलिखित कारण बताए-- 

1. यह प्रथा निम्न वर्गों के लोगों के गुणों एवं प्रतिमा की उपेक्षा करती है। 2. जति प्रथा अंतजातीय विवाह सम्बधों का बहिष्कार करती हैं। 

3. यह समाज में विद्यमान विभिन्न जातियों में परस्पर द्वेष और तनाव को पैदा करती है। 

4. यह व्यवस्था प्रजातन्त्र विरोधी है क्योंकि प्रजातन्त्र में समानता स्वतन्त्रता न्याय और बंधुत्व पर बल दिया जाता है। 

डॉ. अम्बेडकर ने जाति प्रथा को मानवीय विरोधी माना क्योंकि यह निम्न वर्गों को घृणित और अमानवीय कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इन्ही आधारों पर डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने जाति प्रथा का विरोध किया। 

पुरोहितवाद और मनुस्मृति का विरोध 

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का विचार था कि अछूत और दलित वर्ग के लोगों को सामाजिक समानता और न्याय मिलना चाहिए। यह सांस्कृतिक और सामाजिक कार्य हैं। इसके लिए हिन्दू समाज में बुनियादी स्तर पर सुधार किए जाने की आवश्यकता हैं। हिन्दू धर्म में कठोरता और रूढ़ियों के कारण उत्पन्न अमानवीय परम्पराओं को समाप्त किया जाना चाहिए। उनके सुझाव थे कि -- 

1. हिन्दू धर्म का एक प्रामाणिक ग्रंथ होना चाहिए, जो सभी हिन्दुओं द्वारा स्वीकृत हो जैसा कि ईसाइयों, मुसलमानों, सिक्खों आदि में हैं। 

2. हिन्दुओं में पुरोहितवाद समाप्‍त किया जाना चाहिए। यदि पुरोहितवाद को बनाए रखना आवश्यक हो तो उसके लिए पैतृक आधार नहीं होना चाहिए। सभी को समान अधिकार होना चाहिए। 

3. प्रत्‍येक पुरोहितों के पास राज्य द्वारा मान्य धार्मिक कार्यक्रमों तथा उत्सवों को सम्पन्न करने के लिए सनद होनी चाहिए। 

4. पुरोहित एक प्रकार से सरकारी नौकर होने चाहिए। 

5. पुरोहित की संख्या लोगों की आवश्यकताओं के मुताबिक निर्धारित की जानी चाहिए। 

उन्होंने मनुस्मृति का विरोध किया। उनका विचार था कि वर्णाश्रम व्यवस्था में कठोरता लाने का कार्य मनुस्मृति ने किया हैं जिसके कारण अछूतों को सामाजिक हीनता भोगनी पड़ रही है। मनुस्मृति को वे अन्याय की जड़ मानते थे। मनुस्मृति की व्यवस्थाओं के कारण ही अछूतों का सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण होता रहा हैं। अतः उन्होंने मनुस्मृति का विरोध किया।

हरिजन शब्द का विरोध 

महात्मा गांधी ने अस्पृश्य को हरिजन की संज्ञा दी। इसके पीछे उनका भाव यह था कि अस्पृश्य वर्ग के अंदर व्याप्त कुण्डा और आत्मग्लानि दूर हो और वे अपने को हीन न समझें। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अस्पृश्य वर्ग के लिए हरिजन संज्ञा के प्रयोग का विरोध किया, वे इसे राजनीतिक चाल मानते थे। उनका विचार था कि अन्ततः हरिजन अछूत वर्ग के ही लोग होंगे तब उनमें यह भावना रहेगी ही हम अस्पृश्य हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो सकेगी। इसके अलावा हरिजन नाम देने के लिए हरिजन सवर्ण लोगों को हमेशा ही अपना उपकारकर्ता मानेंगें।

अस्पृश्यता का अन्मूलन/ अस्पृश्यता को कैसे समाप्त किया जाए 

अस्पृश्यता सम्पूर्ण हिंदू समाज की दासता का संकेत है। अम्बेडकर ने कहा था कि जाति के आधार पर कुछ भी सार्थक सृजित नहीं हो सकता। इसलिए एक जातिविहीन समाज का सृजन किया जाना चाहिए। अंतर्जातीय विवाह जाति को प्रभावी तरीके से नष्ट कर सकते है लेकिन समस्या यह है कि जब तक लोगों के विचारों पर जातिवाद का दबदबा रहेगा तब तक लोग अपनी जाति से बाहर विवाह करने को तैयार नहीं होगे वह छुआछुत को हिन्दु सामाजिक व्यवस्था के लिए एक कलंक मानते थे। अम्बेडकर ने ऐसे उपायों को खत्म करने के कुछ उपाय बताये। इसलिए तीव्र परिवर्तन के लिए जरूरी है कि लोगों को धर्मग्रंथों की पकड़ और परम्पराओं से मुक्त कराया जाए। प्रत्येक हिन्दु शास्त्रों से और वेदों का दास है। जाति का उन्मूलन इन धर्मग्रंथों की महिमा के समाप्त किये जाने पर आधारित है। जब तक धर्मग्रंथ हिन्दुओं पर प्रभुत्वशाली रहेंगे तब तक वे अपनी अंर्तआत्मा के अनुसार कार्य करने को स्वतंत्र नहीं होगें। वंशानुगत पदसोपान में अन्यायपूर्ण सिद्धांतों के स्थान पर हमें समानता, स्वतन्त्रता और भातृत्व के सिद्धान्तों की अपनाना चाहिए। ये किसी भी धर्म की आधारशिला हो सकते हैं। 

शिक्षा 

अम्बेडकर का विश्वास था कि शिक्षा अस्पृश्यों के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान देगी। उन्होंने अपने अनुयायियों को सदैव ज्ञान के क्षेत्र में उच्चता तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया शिक्षा व्यक्ति को अपने आत्म-सम्मान के प्रति जागरूक बनाती है और उन्हे बेहतर भौतिक जीवन की ओर पहुंचने में सहायता प्रदान करती है। अम्बेडकर ने ब्रिटिश शिक्षा नीति की आलोचना की है कि इसने निम्न जातियों में शिक्षा को समुचित रूप में बढ़ावा नहीं दिया। उन्होंने महसूस किया कि अंग्रेजी राज में भी शिक्षा पर उच्च जातियों का एकाधिकार जारी रहा। इसलिए उन्होंने निम्न जातियों और अस्पृश्यों को गतिशील बनाया और सीखने के कई केंद्रों की नीव रखी। अम्बेडकर अस्पृश्यों को उदार शिक्षा और तकनीकि शिक्षा प्रदान करना चाहते थे। वे धार्मिक सहयोग से शिक्षा दिए जाने के विरोधी थे। उन्होंने चेतावनी दी कि केवल धर्मनिरपेक्ष शिक्षा छात्रों में स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों की प्रस्थापना कर सकती है। 

आर्थिक प्रगति 

एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन के बारे में भी अम्बेडकर ने कहा कि अस्पृश्य स्वयं को ग्रामीण समुदाय और इसकी आर्थिक जकड़न से मुक्त कर ले परंपरागत ढांचे में अस्पृश्य कोई विशेष व्यवसाय करने को बाध्य थे । वे अपने जीवनयापन के लिए हिंदू जातियों पर आश्रित थे। उनका हमेशा यही मानना था कि अस्पृश्यों को अपने परंपरागत व्यवसाय बंद कर देने चाहिए। इसके स्थान पर उन्हें नई तकनीकी हासिल करनी चाहिए और नये व्यवसाय शुरू करने चाहिए। उन्हें रोजगार दिलाने में शिक्षा भी सहायक होगी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आश्रित रहने का कोई बिंदू ही नहीं रह गया था। बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण के परिणाम स्वरूप शहरों में रोजगार के व्यापक अवसर विद्यमान थे। इसलिए अस्पृश्यों को यदि जरूरी है तो गांव भी छोड़ देना चाहिए और नये व्यवसाय या कार्य की तलाश करके स्वयं को उसमें लगा देना चाहिए। इसलिए अस्पृश्यों के लिए पहले ग्रामीण बंधनों से मुक्त होना जरूरी है। इसके बावजूद यदि अस्पृश्यों को गांव में रहना पड़े तो उन्हें अपने परंपरागत कार्य बंद कर देने चाहिए और आजीविका के नये साधन ढूंढने चाहिए। यह काफी सीमा तक उनका आर्थिक सुधार करेगी। 

अम्बेडकर जी का मानना था कि दलित वर्ग को अपने आप आत्म सम्मान पैदा करना चाहिए एवं सहायता की नीति उनके उत्थान की सर्वोतम नीति है। वे कठिन परिश्रम के समर्थक थे। वे मानवतावाद, सहानुभूति, परोपकार आदि के आधार पर समाज सुधारों में विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि सघर्ष द्वारा ही अपने अधिकारों को जीतना चाहिए। 

राजनीतिक सुदृढ़ता 

इस दिशा में एक कदम के रूप में अम्बेडकर ने दलित वर्गों को राजनीति में सहभागीता देने को काफी महत्व दिया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करके अस्पृश्य अपनी सुरक्षा करने में सक्षम होगे और शक्ति में पर्याप्त हिस्सा ले सकेगे। अम्बेडकर चाहते थे कि अस्पृश्य अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करे और शक्ति में पर्याप्त हिस्सा प्राप्त करे। इसलिए उन्होंने अस्पृश्यों के राजनीतिक संगठन बनाये। 

धर्म परिवर्तन 

अम्बेडकर ने जीवन भर हिंदूवाद के दार्शनिक आधार को सुधारने का प्रयास किया। लेकिन वे जानते थे कि हिंदूवाद अस्पृश्यों के प्रति अपनी धारणा में कोई परिवर्तन नहीं लाएगा। इसलिए उन्होंने हिन्दूवाद के विकल्प की खोज की। काफी सोच विचार करने के बाद उन्होने बौद्धवाद को अपनाया और अपने अनुगामियों से भी ऐसा करने को कहा। बौद्धवाद में उनके धर्म परिवर्तन का मतलब था मानवतावाद पर आधारित धर्म में उनकी आस्था अम्बेडकर मानते थे कि बौद्धवाद न्यूनतम वाला धर्म है। इसमें समानता और स्वतंत्रता की भावना का आदर किया जाता है। अन्याय और शोषण का उन्मूलन बौद्धवाद का लक्ष्य था। बौद्धवाद अपनाने के बाद अस्पृश्य अपने लिए एक नई पहचान बना पाने के योग्य होगें। हिन्दुवाद ने उन्हें उत्पीड़न के अलावा कुछ भी नहीं दिया है। एक नया भौतिक जीवन पाने के लिए। उदार भावना के साथ साथ एक नया आध्यात्मिक आधार जरूरी है। बौद्धवाद यह आधार प्रदान करेगा।

अछूत स्वयं अपना सुधार करें 

एक ओर जहाँ डाॅ. अम्बेडकर ने जाति-प्रथा, वर्णाश्रम और छूआछूत का विरोध किया तथा हरिजनों के प्रति सवर्ण जातियों के व्यवहार पर कठोर प्रहार किया, वहीं इस बात की ओर भी स्पष्ट संकेत किया कि अछूत वर्ग अपनी वर्तमान स्थिति के लिए काफी सीमा तक स्वयं उत्तरदायी हैं। स्वयं अछूतों के कुछ कार्य और उनकी आदतें ऐसी है कि वे उनमें आगे बढ़ने की प्ररेणा नहीं दे सकतीं। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि हरिजनों को माँगना छोड़ देना चाहिए। मुर्दा जानवर के मांस को खाना छोड़ देना चाहिए। झूठ बोलना बंद कर देना चाहिए तथा मरे हुए जानवर की खाल उतारने का काम बंद कर देना चाहिए। उनका मत था कि ऐसे काम करने से व्यक्ति के जीवन में हीनता आती है तथा वह आत्म गौरव का बोध नहीं कर पाता। वे इस बात पर जोर देते थे कि जीवन में आत्मसम्मान की भावना विकसित होनी चाहिए तथा स्वतंत्रता, समानता और न्यायपूर्ण जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए। उनका सुझाव था कि अछूतों को संगठित होना चाहिए, उन्हें शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए तथा अन्याय और अत्याचार के विरोध में संघर्ष करना चाहिए। वे चाहते थे कि अछूत सरकारी नौकरियों में जाएँ, अच्छे कार्य करें, खेती और व्यवसाय करें तथा बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर भी जोर दिया। वे चाहते थे कि अछूत महिलाएँ साफ-सुथरी रहें, अच्छे कपड़े पहनें तथा घर-परिवार को साफ सुथरा रखें।

मूल्यांकन 

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का भारतीय समाज के लिए बड़ा योगदान रहा उन्होंने शोषित, दलित वर्ग को जागृत किया, संगठित किया, उन्हें वाणी दी तथा संघर्ष के लिए तैयार किया। उन्होंने स्पष्ट कहा," खोए हुए अधिकारों की प्राप्ति याचना से नहीं हो सकती, उनके लिए संघर्ष करना पड़ेगा।" बलि बकरियों की चढ़ाई जाती है शेर की नहीं। उन्होंने बकरियों को शेर बनाने का सफल प्रयत्न किया। वर्तमान में कानूनी रूप से दलित, अछूत व श्रमिक वर्ग तथा स्त्रियां अन्य सभी लोगों के साथ बराबरी से खड़े हैं।

टी. के. टोप्पे के अनुसार," अंबेडकर का पांडित्य तथा ज्ञान निस्संदेह उच्च था। संभव है कि आने वाली पीढ़ियां अंबेडकर की राजनीतिक उपलब्धियों को याद न रखें पर ज्ञान के क्षेत्र में उनकी श्रेष्ठ उपलब्धियां कभी विस्तृत नहीं होंगी, राजनेता, सामाजिक, क्रांतिकारी और बौद्ध धर्म के आधुनिक व्याख्याकार के रूप में डाॅ. भीमराव अम्बेडकर को भूलाया जा सकता हैं, पर एक विद्वान के रूप में वे अमर रहेंगे।"

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