har din kuch naya sikhe

हर दिन कुछ नया सीखें।

11/11/2021

त्रिभाषा-सूत्र की मूल अवधारणायें, दोष

By:   Last Updated: in: ,

त्रिभाषा सूत्र की मूल अवधारणायें 

त्रिभाषा-सूत्र के प्रतिपादन में निम्नलिखित अवधारणाओं का सहारा लिया गया है--

1. भारत बहुभाषा-भाषी देश है, अतः यहाँ की सम्पर्क भाषा मातृ भाषा के अतिरिक्त हो सकती है एवं उस स्थिति में सम्पर्क भाषा का अध्ययन भी अभीष्ट है।

2. अंग्रेजी विश्व भाषा है, समृद्ध है तथा उसके बिना राष्ट्र का कार्य नहीं चल सकता इसलिये इसका अध्ययन पूरे राष्ट्र में अनिवार्य होना चाहिये। 

3. यह अन्य भाषा संस्कृत न हो। 

4. शिक्षण और शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा हो, साथ ही उसका अध्ययन भी अनिवार्य होना चाहिये। 5. लेकिन जिनकी मातृ-भाषा हिन्दी है, वे दो ही भाषायें पढ़ेंगे। ऐसा क्यों हो? इसलिये हिन्दी भाषी प्रदेशों में एक अन्य भाषा को अनिवार्य कर देना चाहिये। जिससे अहिन्दी भाषी प्रदेशों की दृष्टि से न्याय हो सके। 

यह भी पढ़े; त्रिभाषा सूत्र क्या हैं?

6. आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी वरीयता तमिल भाषा को दी जाये। 

7. भारत की राष्ट्र भाषा राजभाषा अथवा कम से कम सम्पर्क भाषा हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिये। यह लोकतंत्र की आवश्यकता है। 

8. जिन लोगों की मातृ-भाषा हिन्दी नहीं है उन्हें माध्यमिक स्तर पर कम से कम तीन भाषायें पढ़नी होंगी।

त्रिभाषा-सूत्र के दोष

यद्यपि त्रिभाषा सूत्र के कुछ गुण हैं तथापि इसमें निम्नांकित दोष भी पाये जाते हैं-- 

1. त्रिभाषा-सूत्र के अनुसार प्रत्येक छात्र को अंग्रेजी या अन्य कोई विदेशी भाषा का अध्ययन करना अनिवार्य है तथा प्रत्येक छात्र को एक विदेशी भाषा का अध्ययन करना बेकार है। इससे शिक्षा के स्तर में गिरावट आने का भय रहता है। 

2. इस सूत्र के माध्यम से देश की कोई भी भाषा राष्ट्रीय भाषा के रूप में विकसित नहीं हो सकती। 

3. त्रिभाषा सूत्र में अंग्रेजी को अनावश्यक रूप से अधिक महत्व दिया गया है, अतः प्रकाशवीर शास्त्री ने कहा," आयोग ने अन्तर्राष्ट्रीय षड्यंत्र से नाता जोड़ लिया है।

4. नौ विषयों को पढ़ने वाले बालक विषयों का ऊपरी अध्ययन तो कर सकते हैं, लेकिन उनका गहन अध्ययन उनके लिये संभव नहीं। 

5. त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत उत्तरी भारत में दक्षिणी भाषाओं के शिक्षकों का अभाव पाया गया है और दक्षिण में हिन्दी शिक्षकों का अभाव पाया गया। 

6. आयोग ने जो पाठ्यक्रम तैयार किया, उस पाठ्यक्रम में तीन भाषाओं को सम्मिलित करने से छात्र को कुल मिलाकर नौ विषयों का अध्ययन करना पड़ेगा तथा इतने अधिक विषयों का बोझ छात्र की शारीरिक व मानसिक दृष्टि से उचित नही हैं। 

7. अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिंदी के प्रति विरोध की भावना होने के कारण वहाँ पर हिंदी का शिक्षण ठीक प्रकार से न चल सका।

संबंधित पोस्ट,

यह भी पढ़े; भाषा का विकास

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

आपके के सुझाव, सवाल, और शिकायत पर अमल करने के लिए हम आपके लिए हमेशा तत्पर है। कृपया नीचे comment कर हमें बिना किसी संकोच के अपने विचार बताए हम शीघ्र ही जबाव देंगे।