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11/01/2021

सांख्यिकी का क्षेत्र

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सांख्यिकी का क्षेत्र 

sankhyiki ka kshetra;प्राचीन समय में सांख्यिकी का क्षेत्र अत्यंत सीमित था, परंतु आधुनिक युग में सांख्यिकी का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रत्येक क्षेत्र में सांख्यिकी विधियों का प्रयोग होने लगा है। आज इस विज्ञान ने सार्वजनिक महत्व प्राप्त कर लिया है और प्रत्येक विज्ञान अपने विकास के लिए इसका सहारा लेता है। इसलिए एक प्रसिद्ध विद्वान ने कहा है," सांख्यिकी के बिना विज्ञान फलदायक नहीं होते और विज्ञानों के बिना सांख्यिकी निराधार और निर्मूल है।" सांख्यिकी विज्ञान को निम्न दो भागों में बांटा गया है-- 

(अ) सांख्यिकी रीतियां 

सांख्यिकीय रीतियों से हमारा आशय उन रीतियों से जो अनेक कारणों से परिमाणात्म आंकड़ों को प्रदर्शित करने के उपयोग में आती है। सांख्यिकीय रीतियों की सहायता से आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं तथा उन आंकड़ों को सरल, समझने योग्य एवं तुलना करने के योग्य बनाया जाता है। ये रीतियां जटिलता को समाप्त करती हैं तथा सत्यता को प्रकट करती हैं। अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र जैसे अपूर्ण विज्ञान इन्हीं रीतियों के प्रयोग पर निर्भर करते हैं। पूर्ण विज्ञान भी अपने परिणामों का विश्लेषण करने हेतु इन्हीं रीतियों का सहारा लेते हैं। सांख्यिकीय रीतियों में अग्रलिखित को सम्मिलित करते हैं-- 

1. संग्रहण 

प्रत्येक सांख्यिकीय अनुसंधान के लिए यह सबसे पहला व आवश्यक कार्य है। की संकलित समंकों की समस्या के अनुसार ही यह निश्चित किया जाता है कि कब, कहां से, किस ढंग से और संपादन का कार्य भी इसमें शामिल होता है। कितने आंकड़े एकत्र किये जाएं जो समस्या पर समुचित प्रकाश डाल सकें।  

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2. वर्गीकरण 

एकत्र किए हुए आंकड़ों को अधिक सरल व तुलना योग्य बनाने के लिए। किसी गुण विशेष के आधार पर विभिन्न वर्गों में बांटते हैं। वर्गीकरण विशेषतः वजन, रंग स्थान आदि किसी भी गुण के आधार पर हो सकता है। यह संक्षिप्तीकरण की दिशा में एक कदम है। सारणीयन-समकों को आसानी से समझने एवं तुलना योग्य बनाने हेतु सारणीयन में रखा जाता है, ऐसा करने से समंक मस्तिष्क में आसानी से बैठ जाते हैं। 

4. प्रस्तुतीकरण

उचित उद्देश्यों के लिए समंकों का प्रस्तुतीकरण किया जा सकता है। समकों को तालिका में रखकर चित्रों या बिन्दु रेखीय रीति से प्रस्तुत किया जाता है। 

5. विश्लेषण

विश्लेषण करने में अनेक रीतियां कार्य में लायी जाती हैं। वर्गीकरण, माध्य, प्रकट किया जाता है। अपकिरण, विषमता, निर्देशांक, सहसंबंध, अंतर्गणन आदि। इससे समंकों के महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रकट किया जाता हैं।

6. निर्वाचन

विश्लेषणात्मक अध्ययन के पश्चात् निर्वाचन की विधि के द्वारा प्राप्त परिणामों से निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

7. पूर्वानुमान 

प्राप्त समंकों को वर्तमान अनुभवों एवं परिणामों के आधार पर सांख्यिकीय रीतियों द्वारा पूर्व अनुमान लगाकर प्रदर्शित किया जाता है। 

(ब) व्यावहारिक सांख्यिकी 

व्यावहारिक सांख्यिकी के क्षेत्र के अंतर्गत समंकों का संग्रहण, विश्लेषण प्रदर्शन आदि सम्मिलित किये जाते। समस्या से संबंधित जैसे जनसंख्या, उत्पादन, व्यापार या जन्म-मरण के समंकों को क्रियात्मक रूप देना इस विभाग का कार्य है। व्यावहारिक सांख्यिकी को निम्न दो वर्गों में रखा जा सकता है-- 

1. वर्णनात्मक 

व्यावहारिक सांख्यिकी इसमें भूतकाल एवं वर्तमान में इकट्ठे किये गये समंकों का पूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है। इसके आधार पर नियम नहीं बनाये जाते हैं। जैसे यदि दो भूतकाल के समय के मूल्य स्तरों का ज्ञान प्राप्त करना है तो इसे निर्देशांक द्वारा सरल बनाया जा सकता है। 

2. वैज्ञानिक 

व्यावहारिक सांख्यिकी इस विभाग में एकत्रित किये गए आंकड़ों की सहायता से विशेष सिद्धांत एवं नियम बनाए जाते हैं तथा इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आंकड़ों का संग्रहण विश्लेषण एवं निर्वचन किया जाता है।

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