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10/19/2021

साक्षात्कार की प्रक्रिया

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साक्षात्कार की तैयारी 

sakshatkar ki prakriya;साक्षात्कार आरम्भ करने के पूर्व अनुसंधानकर्ता को उसकी तैयारी करनी पड़ती है। क्योंकि पूर्व तैयारी के अभाव में साक्षात्कार उचित रूप में संचालित नहीं हो सकता। साक्षात्कार की पूर्व तैयारी में मुख्य सोपान निम्नलिखित हैं-- 

1. समस्या का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना 

2. साक्षात्कार निर्देशिका की रचना करना। 

3. सूचनादाताओं का चुनाव करना। 4. सूचनादाताओं के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना। 

5. साक्षात्कार का समय निश्चित करना। 

6. साक्षात्कार के स्थान को निश्चित करना। 

साक्षात्कार की प्रक्रिया 

साक्षात्कार की तैयारी पूर्ण होने के पश्चात् साक्षात्कार की प्रक्रिया आरम्भ होती है। साक्षात्कार की प्रक्रिया में निम्नलिखित बातें हैं--

1. परिचय

सबसे पहले साक्षात्कर्ता को सूचनादाता को अपना परिचय देना चाहिए तथा उचित अभिवादन के साथ मिलना चाहिए।

 2. साक्षात्कार का उद्देश्य 

परिचय देने के पश्चात् साक्षात्कार का उद्देश्य स्पष्ट कर देना चाहिए। उद्देश्य इस प्रकार स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सूचनादाता की समझ में आ जाये। 

3. सहयोग की प्रार्थना 

सूचनादाता को साक्षात्कार का उद्देश्य स्पष्ट करने के पश्चात् प्राप्त सूचनाएँ गुप्त रखी जायेंगी। उससे सहयोग की प्रार्थना करनी चाहिए। उससे यह कहना चाहिए कि आपका सहयोग अनुसंधानकर्त्ता के लिए अति आवश्यक है तथा उसे यह भी बतला देना चाहिए कि उसके द्वारा प्राप्त सूचनाएँ गुप्त रखी जायेंगी।

4. साक्षात्कार का आरम्भ 

साक्षात्कार के आरम्भ में सूचनादाता से प्राथमिक प्रश्न पूछना चाहिए। उदाहरण के लिए नाम, परिवार के सदस्यों की संख्या, आयु आदि। इसके पश्चात् विषय से सम्बन्धित प्रश्न पूछना चाहिए। जब सूचनादाता प्रश्न का उत्तर देना आरम्भ कर देता है तो उसे बीच में टोकना नहीं चाहिए और उसे बोलने का पूरा अवसर देना चाहिए। प्रारम्भ में साक्षात्कर्ता को बड़ा सतर्क, गम्भीर तथा तटस्थ रहना चाहिए। साक्षात्कर्त्ता को स्वयं कम बोलना चाहिए, सूचनादाता को ही बोलने का अधिक अवसर देना चाहिए। 

5. कुछ उत्साहवर्द्धक वाक्यों को दोहराना

साक्षात्कार के कुछ ऐसे वाक्यों को बीच-बीच में समय-समय पर दोहराते रहना चाहिए ताकि साक्षात्कारदाता का उत्साह बना रहे और वह साक्षात्कार में अधिक रूचि ले। ये वाक्य इस प्रकार के हो सकते हैं," आपने बहुत ही मूल्यवान सूचनाएँ देकर समस्या के हल में काफी योगदान दिया हैं" आदि। 

6. सहानुभूतिपूर्वक सुनना 

सूचनादाता द्वारा दी गई सूचना को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, यदि ध्यानपूर्वक नहीं सुनेगा तो वह बात करने में रूचि नहीं लेगा। 

7. क्रोध दिलाने वाले क्षणों से बचाव 

प्रश्न पूछते समय इस बात का विशेष रूप से अथवा ध्यान रखा जाये कि ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाये जिससे कि साक्षात्कारदाता को क्रोध आ जाये अथवा वह चिढ़ जाये। 

8. स्मरण कराना

कभी-कभी सूचनादाता उत्तर देते-देते भावनाओं में बह जाता है। ऐसे अवसर पर साक्षात्कर्ता को सावधानी से फिर से उसे स्मरण दिलाना पड़ता है। 

9. समयानुसार प्रश्न 

प्रश्न समयानुसार होना चाहिए। अचानक एक विषय को छोड़कर दूसरे विषय पर प्रश्न नहीं पूछना चाहिए। समझ में आये तो निरन्तरता को भंग नहीं करना चाहिए।

10. बातचीत में प्रवाह

साक्षात्कर्त्ता को चाहिए कि वह बातचीत का प्रवाह बनाये रखे। यदि बातचीत करते समय वार्ता में रुकावट आ जावे और कोई नया प्रश्न समझ न आये तो निरन्तरता को भंग नहीं करना चाहिए। 

11. दोहरे प्रश्न से बचाव

दोहरे प्रश्नों से बचना चाहिए। यदि साक्षात्कार में दोहरे प्रश्न किये जाते हैं तो उनके उत्तर ठीक से नहीं मिलने की सम्भावना रहती है। 

12. आज्ञा देने एवं मना करने की पद्धति से बचाव

साक्षात्कार के मध्य बात-चीत करते समय साक्षात्कारदाता से कभी भी सूचना देने के लिए न तो आज्ञा ही प्रदान करना चाहिए और न ही उसे अपनी बात कहने से रोकना चाहिए। 13. कुछ अन्य सामान्य बातें

उक्त बातों के अतिरिक्त कुछ अन्य बातें भी हैं जिनको साक्षात्कर्ता को ध्यान में रखना चाहिये। ये बातें अग्रलिखित हैं-- 

(अ) प्रश्न सरल होना चाहिए। 

(ब) ऐसे प्रश्न नहीं पूछना चाहिए जिनसे अति संक्षिप्त उत्तर प्राप्त होने की सम्भावना हो। 

(स) साक्षात्कार के विषय से नहीं हटना चाहिए। 

(द) प्रत्यक्ष प्रश्न नहीं पूछना चाहिए। (ई) पथ प्रदर्शन करने वाले प्रश्न, जैसे क्या आप सिनेमा देखना पसन्द करते हैं? नहीं पूछना चाहिए। 

(फ) सूचनादाता का विश्वास बनाये रखना। 

14. सूचना को नोट करना 

प्राप्त सूचना को नोट करना भी जरूरी है। जब साक्षात्कार स्वतन्त्र वर्णन के रूप में होता है तो उसे नोट करना एक जटिल समस्या होती है। यदि साक्षात्कारदाता के बोलते समय लिखने का कार्य किया जाता है तो उसका उत्साह कम हो जाता है तथा वार्तालाप का प्रवाह रुक जाता है। जहाँ तक हो सके साक्षात्कारदाता के बोलते समय में नोट नहीं करना चाहिए। साक्षात्कर्त्ता को मुख्य मुख्य बातें संकेत लिपि में या संक्षेप नोट करते रहना चाहिए।

साक्षात्कार का नियन्त्रण, निर्देशन एवं प्रमाणीकरण की प्रक्रिया 

साक्षात्कार का नियन्त्रण, निर्देशन एवं प्रमाणीकरण भी एक महत्वपूर्ण कार्य है। कभी-कभी प्राप्त तथ्यों से अमहत्वपूर्ण असम्बन्धित बातों का समावेश हो जाता है जिनके कारण सम्पूर्ण तथ्य बेकार हो जाते हैं। अतः उसी समय उनका निरीक्षण हो जाना चाहिए। साक्षात्कार के नियन्त्रण, निर्देशन एवं प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं-- 

(1) सूचनादाता ने जो सूचनायें दी हैं उनमें आपस में विरोधाभास तो नहीं है। यदि विरोधाभास है तो उसके कारणों पता लगाने का प्रयत्न करना चाहिये। साधारणतया विषय को ठीक प्रकार से न समझने के कारण ऐसा होता है। 

(2) प्रथम तो सूचनादाता को ऐसा मौका ही न देना चाहिए कि वह साक्षात्कर्त्ता को धोखा देने का प्रयत्न करे। यदि ऐसा महसूस होने लगे कि सूचनादाता धोखा दे रहा है अथवा झूठ बोल रहा है तो साक्षात्कर्ता को इस प्रकार का दिखावा करना चाहिए कि वह इन तथ्यों को पहले से ही जानता है। इससे सूचनादाता पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। परन्तु सूचनादाता को यह कह दिया जाय कि वह झूठ बोल रहा है या धोखा दे रहा है तो वह शायदे सूचना देना बन्द कर दे। 

(3) ऐसी स्थिति में साक्षात्कर्त्ता को क्रास प्रश्नों द्वारा सूचना प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।

साक्षात्कार की समाप्ति 

साक्षात्कार का अन्त उचित तरीके से होना चाहिए। जब सूचनादाता सब कुछ कह चुकता है तो उसके कहने की गति धीमी पड़ जाती है अथवा वह बीच-बीच में मौन हो जाता है। तो समझना चाहिए कि साक्षात्कार समाप्त होने की स्थिति में है। यदि साक्षात्कार एक ही बैठक में समाप्त होना है तो साक्षात्कार समाप्त करते समय सूचनादाता से यह पूछ लेना जरूरी है कि वह और कुछ तो नहीं कहना चाहता है या कुछ बात विषय से सम्बन्धित छूट तो नहीं गई है। यह सहायक साक्षात्कार करना और शेष हो तो बात-चीत किसी ऐसी महत्वपूर्ण बात पर समाप्त करना चाहिए ताकि सूचनादाता को पुनः बातचीत करने की रुचि बनी रहे। कभी-कभी साक्षात्कारदाता भावनाओं में बहकर गुप्त बातें भी बतला देता है और उसके पश्चात् वह आत्मग्लानि अनुभव करता है और सोचता है कि व्यर्थ ही उसने अपना गुप्त रहस्य एक अपरिचित व्यक्ति को बता दिया। ऐसी स्थिति में साक्षात्कार समाप्त करते समय सूचनादाता को यह विश्वास दिला दिया जाना चाहिए कि उसने जो कुछ कहा है, वह गुप्त रखा जावेगा। 

रिपोर्ट 

साक्षात्कार समाप्त होने के पश्चात् अन्तिम कार्य है प्रतिवेदन लिखना। प्रतिवेदन तैयार करने का कार्य शीघ्र ही कर डालना चाहिए। इसे टालने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए अन्यथा गलतियाँ होने की सम्भावना रहती है। अनुसंधान निष्कर्ष इसी प्रतिवेदन पर आधारित होते हैं। अतः साक्षात्कर्त्ता को प्रतिवेदन तैयार करने का कार्य शीघ्र करना चाहिए।

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