5/21/2020

प्रजातंत्र के सिद्धांत, महत्व एवं गुण दोष

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प्रजातंत्रात्मक शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी राज्य से सम्बंधित हैं। इसमे व्यक्ति की महत्त और उसकी स्वतंत्रता पर बल दिया गया है तथा संप्रभुता जनता मे निहित होना माना गया है। मानव जाति के विकास मे जो भिन्नता की शासन व्यवस्थाएँ रही उनमे प्रजातंत्र विश्व की प्रमुख शासन प्रणाली मानी गयी है।
प्रजातंत्र
आज हम प्रजातंत्र या लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धांत और प्रजातंत्र का महत्व एवं गुण दोषों को जानेंगे।

प्रजातंत्र या लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धांत (prajatantra ke siddhant)

1. प्रजातंत्र का शास्त्रीय सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार शासन का आधार जनता की सहमति है, लेकिन सरकार यदि जनता की कसौटी पर खरी नही उतरती है, तो जनता निर्वाचिन के माध्यम से सरकार को हटा सकती है। जनहित साधन उसका लक्ष्य है। यह प्रजातंत्र का उदारवादी सिद्धांत भी कहलाता है। क्योंकि व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं समाज की सर्वोपरिता पर इसमे बल दिया गया है।
2. प्रजातंत्र का विशिष्टवर्गीय या अभिजनवादी सिद्धांत
बीसवीं शताब्दी के आरंभ मे प्रतिपादित यह सिद्धांत मानव की प्राकृतिक असमानता के सिद्धांत पर बल देते हुए यह मानता है, कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था मे शासक और शासित दो वर्ग होते है। शासक वर्ग हमेशा अल्पसंख्यक होते हुए भी सत्ता के केंद्र मे विशिष्ट वर्ग होता है। शासन की शक्ति इसी विशिष्ट वर्ग के हाथ मे केन्द्रित होती है। सामान्यतः व्यक्ति यह सोचते है कि वे राजनीतिक प्रक्रिया मे भाग ले रहे है, लेकिन वास्तव मे उनका प्रभाव चुनाव तक सीमित होता है। अभिजन का आधार है श्रेष्ठता के आधार पर चयन। प्रकृति, विचार, आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक पृष्ठभूमि आदि किसी भी आधार पर इसकी श्रेष्ठता निर्भर हो सकती है, जो इन्हें आम लोगों से भिन्न बनाती है।
अभिजन भी स्वयं को आम लोगों से भिन्न एवं श्रेष्ठ समझते हैं, परन्तु आम लोगों के साथ इनकी क्रिया प्रतिक्रिया होती रहती है। इस तरह जन संप्रभुता का समन्वय हो जाता है। समाज की धन संपदा एवं नीति निर्धारण मे अभिजन की प्रभावशाली भूमिका होती है, परन्तु प्रजातंत्र मे इस वर्ग मे प्रवेश के सभी को समान अवसर प्राप्त होते हैं। दूसरी ओर नियमित एवं खुली निर्वाचन प्रक्रिया अभिजन को जनहित मे कार्य करने हेतु बाध्य करती है।
3. बहुलवादी सिद्धांत
प्रजातंत्र के इस सिद्धांत की मान्यता है कि प्रजातंत्र मे व्यक्ति को अपने विभिन्न हितों की पूर्ति के लिए समूह मे संगठित होने कि स्वतंत्रता है। ये समूह अपने-अपने क्षेत्र मे स्वायत्त भी होते है और अपनी हितपूर्ति के लिय शासन पर दबाव भी डालते है। इस तरह सभी समूहों को अपनी हितपूर्ति की सीमा तक सत्ता मे भागीदारी मिलती है। बहुलतावादी सिद्धांत की यह मान्यता है कि वास्तव मे सत्ता इन समूहों मे बँटी रहती है। अत: सत्ता का विकेन्द्रीकरण इस सिद्धांत की मूल धारण है। इसके अनुसार राज्य सर्वोच्च सत्ता का अधिकारी नही अपितु प्रजातंत्र मे समाज के सभी समूहों की राजनीतिक शक्ति एवं शासन की सत्ता मे भागीदारी होती है।
4. मार्क्सवादी सिद्धांत
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध मे साम्यवाद की विचारधार के आधुनिक प्रवर्तक कार्ल मार्क्स व लेनिन के विचारों पर आधारित प्रजातंत्र का एक  नवीन सिद्धांत सामने आया। इसके अनुसार शास्त्रीय प्रजातंत्र या उदारवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं मे वास्तविक प्रजातंत्र सम्भव नही है, क्योंकि इसमे शासन पर एक छोटे साधन संपन्न वर्ग का नियंत्रण हो जाता है, जबकि वास्तव मे प्रजातंत्र सभी का कल्याण व उनकी समानता पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार सच्चे प्रजातंत्र के लिये एक वर्ग विहीन तथा राज्य विहिन समाज की स्थापना होनी चाहिए। साधन संपन्न वर्ग राजनीतिक सत्तायुक्त होता है। अतः राज्य स्वयं शोषणकर्ताओं का समूह हो जाता है। मार्क्सवादी सिद्धांत की यह मान्यता है कि राजनीतिक शक्ति संपूर्ण समाज मे निहित हो इस हेतु यह आवश्यक है कि आर्थिक सत्ता संपूर्ण समाज मे निहित हो। ऐसी स्थिति मे ही शासन सबके द्वारा सभी के हित के लिए संचालित हो पाएगा। प्रजातंत्र का यह सिद्धांत राजनीतिक एवं नागरिक समानताओं की अपेक्षा आर्थिक समानता पर अधिक बल देता है। इसकी मान्यता है कि यदि व्यक्ति के पास रोटी, कपड़ा, मकान नहीं है तो उसे मतदान या निर्वाचित होने का अधिकार कोई अर्थ नही रखता है। वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना हेतु मार्क्सवाद निम्न सुझाव देता है----
(अ) उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व होना।
(ब) संपत्ति का समान वितरण तथा सभी की मूलभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना।
(स) सभी के आर्थिक हित समान होने से इनके प्रतिनिधित्व के लिए एक दल साम्यवाद दल के हाथ मे शासन संचालन की संपूर्ण शक्ति होना। मार्क्सवाद ऐसे प्रजातंत्र को ही वास्तविक व श्रेष्ठ प्रजातंत्र मानता है।
प्रथम  महायुद्ध के पश्चात् 1990 तक सोवियत संघ मे इसका प्रयोग हुआ। वर्तमान मे चीन इस सिद्धांत की आंशिक मान्यता पर आधारित गणराज्य है।

प्रजातंत्र या लोकतंत्र का महत्व (prajatantra ka mahatva)

प्रजातंत्र न केवल शासन का एक विशेष प्रकार है बल्कि यह जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण हैं। प्रजातंत्र स्वतंत्रता समानता, सहभागिता और बंधुत्व की भावना पर आधारित एक शासन व्यवस्था है। इसे हम एक सामाजिक व्यवस्था भी कह सकते है। इसके अन्तर्गत मनुष्य का संपूर्ण जीवन इस लोकतंत्रीय मान्यता पर आधारित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज मे समान महत्व एवं व्यक्तित्व की गरिमा प्राप्त है। व्यक्ति के महत्व की यह स्थिति जीवन के केवल राजनीतिक क्षेत्र मे ही हो तो प्रजातंत्र अधूरा रहता है। प्रजातंत्र की पूर्णता के लिए यह आवश्यक है कि जीवन के राजनीति सामाजिक व आर्थिक तीनों ही क्षेत्रों मे सभी व्यक्तियों को अपने विकास के समान अवसर प्राप्त हों।
मानव जीवन के राजनीति क्षेत्र मे प्रजातंत्र से आश्य ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमे निर्णय लेने की शक्ति किसी एक व्यक्ति मे न होकर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों मे निहित होती है। अतः शासन जन भावना पर आधारित होता है।
मानव जीवन के सामाजिक क्षेत्र मे प्रजातंत्र से आश्य ऐसे समाज से है, जिसमे जाति, धर्म, रंग, लिंग, नस्ल, मूलवंश व सम्पत्ति आदि के आधार पर भेदभाव न हो। सभी को अपना जीवन उन्नत बनाने के अधिकार व अवसर बिना भेदभाव के समान रूप से प्राप्त हो तथा समाज मे बंधुत्व तथा पारस्परिक सहयोग की भावना निहित हो।
मानव जीवन के आर्थिक क्षेत्र मे प्रजातंत्र से आश्य ऐसी व्यवस्था से है जिसमे समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका चुनने अथवा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। सभी को अपना आर्थिक विकास करने कि स्वतंत्रता व समान अवसर प्राप्त होते हैं। एक व्यक्ति का किसी अन्य द्वारा द्वारा शोषण न हो ऐसी व्यवस्था के प्रयास होते है। सभी को वे सामान्य सुविधाएं प्रदान करने का प्रयास भी किया जाता है जिससे वे अपनी न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताएं पूर्ण कर सके एवं गरिमामय जीवन जी सके, अर्थात् व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि की सुविधाएं प्रजातंत्र के आधार हैं।
प्रजातंत्र की मान्यता है कि राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक क्षेत्र मे जो भी परिवर्तन किए जाने हो,  उन सभी परिवर्तन को शांतिपूर्ण तरीकों से किया जा सकता हैं। प्रजातंत्र के महत्व के बाद अब प्रजातंत्र के गुणों के बारे मे जानेंगे।

प्रजातंत्र या लोकतंत्र के गुण (लाभ) (prajatantra ke gun)

1. मानवता के उच्च मूल्यों पर आधारित
प्रजातंत्र समानता, न्याय और भ्रातृत्व जैसे उच्च मूल्यों पर आधारित है तथा इसमे प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करते हुए सभी को समान माना जाता है। जनता की संप्रभुता एवं सहभागिता पर आधारित होने से से प्रजातंत्र मे व्यक्ति मे आत्मसम्मान व आत्मनिर्भर के उच्च गुण विकसित होते है।
2. लोक कल्याण
प्रजातंत्र मे जन प्रतिनिधियों के द्वारा शासन किया जाता है जिनका चुनाव जनता एक निश्चित समय के लिए करती है। उन्हें यह भय रहता है कि, जनता की इच्छाओं, भावनाओं और आवश्यकता के अनुसार यदि वे कार्य करेंगे तो जनता उन्हें भविष्य मे होने वाले चुनावों मे परिजित कर देगी। इसलिए प्रजातंत्र मे शासक जनता के प्रति उत्तरदायी है, और उनके हितों के प्रति सजग रहता है। अतः प्रजातंत्र मे लोक कल्याण का पूरा ध्यान रखा जाता है।
2. राजनीतिक शिक्षण 
प्रजातंत्र राजनीतिक प्रशिक्षण का उत्तम साधन है। मताधिकार और राजनीतिक पद प्राप्त करने की स्वतंत्रता के कारण जनता स्वाभाविक रूप से राजनीतिक क्षेत्र मे रूचि लेने लगती है। भाषण, विचारों की अभिव्यक्ति, संचार माध्यमों के उपयोग की स्वतंत्रता जनता मे विचारों के आदान-प्रदान करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। सभी राजनीतिक दल निरंतर प्रचार द्वारा जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करते रहते है। अतः प्रजातंत्र मे नागरिकों को प्रशासनिक, राजनीतिक व सामाजिक सभी प्रकार का शिक्षण प्राप्त होता है।
3. राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास
प्रजातंत्र जनता द्वारा लोकहित की प्राप्ति के लिए जनता का शासन है। जनता राजनीतिक दृष्टि से सजग हो जाने के कारण सरकार व राज्य के प्रति एक प्रकार का लगाव अनुभव करती है और इस लगाव के कारण राष्ट्र के प्रति प्रेम व प्रतिबद्धता की भावना जागृत होती है। इसी से राष्ट्रभक्त उपजती है। नागरिक यह अनुभव करते है कि शासन उन्ही की बनायी हुई व्यवस्था है तथा सार्वभौम सत्ता के अधिकारी एवं वे स्वयं है।
5. हिंसात्मक क्रांति की न्यूनतम सम्भावना
प्रजातंत्र शांति और सहिष्णुता का दर्शन है। यह सहमति और समझ पर आधारित है। इसमे विपक्ष को भी अपनी बात कहने का पूरा अवसर प्राप्त होता है। विवक्ष द्वारा सरकार की आलोचना और निन्दा भी की जाती है। बहुसंख्यक जनता यदि शासक वर्ग से असंतुष्ट है तो वह उसे सरलतापूर्वक संवैधानिक तरीकों से हटा सकती है। प्रजातंत्र के गुणों को जानेंगे के बाद अब हम प्रजातंत्र के दोषों के बारें मे जानेंगे।

प्रजातंत्र या लोकतंत्र के दोष (prajatantra ke dosh)

1. गुणों की अपेक्षा संख्या को महत्व
प्रजातंत्र मे गुणों की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। इसमे मात्र मतों की गणना की जाती है। प्रत्येक मतदाता चाहे योग्य हो या अयोग्य मत का मूल्य एक ही होता हैं। प्रजातंत्र का आधार यह अवधारणा है कि सभी व्यक्ति समान है, जबकि समाज के सभी सदस्यों की बौद्धिक क्षमता समान नही होती है। इस प्रजातंत्र मे प्रत्येक व्यक्ति को एक मत देने का अधिकार है अर्थात् वह सबको समान मानता है। अत: अधिक गुणी व्यक्तियों की महत्ता का सही मूल्यांकन नही हो पाता है।
2. अयोग्यों व्यक्तियों के शासन की संभावना
शासन एक कला भी है। इस हेतु विशेष ज्ञान और क्षमता की आवश्यकता होती है। यदि शासक को इस कला का ज्ञान नही है तो पूरे समाज के कल्याण का लक्ष्य प्राप्त नही किया जा सकता। शासन करने की कला, योग्यता और क्षमता केवल कुछ लोगों मे रहती है। किन्तु प्रजातंत्र मे बहुमत का शासन होता हैं और योग्य व्यक्ति का मूल्य भी अयोग्य के समान ही आँका जाता है। विकासशील देशों मे तो यह स्थिति और भी चिंतनीय है। इसलिए आलोचक प्रजातंत्र को आयोग्य का शासन भी कहते है।
3. सार्वजनिक समय व धन का अपव्यय
प्रजातंत्र मे चुनावों की लम्बी और जटिल प्रक्रिया के पश्चात ही व्यवस्थापिका का गठन हो पाता है। अत्यावश्यक कानूनों के निर्माण मे भी कई बार वर्षों लग जाते हैं। चुनावों की प्रक्रिया मे काफी धन खर्च होता है। सांसदो, विधायकों, मंत्रियों एवं व्यवस्थापिका से जुड़े अधिकारियों आदि पर भी बड़ी मात्रा मे धन खर्च होता है। अतः प्रजातंत्र मे धन व समय दोनों का अपव्यय होता हैं।
4. धनिकों का वर्चस्व 
यह केवल कहने की बात है कि प्रजातंत्र मे सभी को समान रूप से राजनीतिक प्रक्रिया मे भागीदारी मिलती है, लेकिन यह केवल सैद्धान्तिक बात है। व्यवहार मे प्रजातंत्र मे चुनाव इतने खर्चीले हो गये है कि सामान्य जन तो चुनावों मे किसी पद हेतु प्रत्याशी के रूप मे भाग लेने की बात भी नही सोच सकते। धन के आधार पर चुनाव लड़ना प्रजातांत्रिक प्रणालियों मे एक आम बात हो गई है। चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी प्रचार-प्रसार मे अत्यधिक धन व्यय करते है। इससे जनता का शासन सहज ही धनिकों के शासन मे परिवर्तित होता जा रहा है।
5. दलीय गुटबन्दी 
वर्तमान प्रजातंत्र के संचालन के लिए राजनीति दल अनिवार्य हो गये है। राजनीति दलों का गठन तो विचारों के आधार पर होता है किन्तु सत्ता प्राप्ति ही इनका मुख्य लक्ष्य बन जाता है। जनता को प्रभावित करने व लोकप्रिय ता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल परस्पर एक दूसरे के विरूद्ध अर्नगल प्रलाप करते रहते है। विरोध के लिए विरोध न कि मूल्य या सिद्धांतों के आधार पर विरोध राजनीतिक दलों का लक्ष्य बन जाता है। राजनीति दल ऐसे लोगों का अखाड़ा बन जाते हैं जो गहन प्रचार द्वारा लोगों की भावनाओं को प्रभावित करके अपना वर्चस्व व स्वार्थ सिद्ध के उपाय खोजते रहते है। चुनाव के दौरान इनके अमर्यादित्त प्रचार-प्रसार के कारण संपूर्ण देश का वातावरण दूषित हो जाता है। लोक कल्याण के स्थान पर गुटीय हितपूर्ति महत्वपूर्ण हो जाती है तथा सत्ता का प्रयोग भी वे अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु करने लगते हैं।
स्त्रोत; समग्र शिक्षा, मध्यप्रदेश राज्य शिक्षा केन्द्र, भोपाल।
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