5/04/2020

रस किसे कहते हैं? दसों रस की परिभाषा भेद उदाहरण सहित

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Ras in hindi 



रस शब्द आनन्द का पर्याय है। रसवादी आचार्यों ने काव्य मे रस को ही मुख्य माना है। उन्होंने रस को काव्य की आत्मा कहा हैं। जैसे आत्मा के बिना शरीर का कोई मूल्य नही उसी प्रकार रस के बिना काव्य भी निर्जीव माना जाता हैं। 
आज हम रस किसे कहते हैं? परिभाषा भेद प्रकार अंग स्थायी भाव। दसों रसों श्रृंगार रस, हास्य रस, करूण रस, रौद्र रस, वीभत्स रस, भयानक रस, अद्धभुत रस, वीर रस, शान्त रस, और वात्सल्य रस की परिभाषा उदाहरण सहित जानेगें। 
स लेख को छोड़कर आपको और कही जानें की आवश्यकता नहीं हैं इस लेख में रस के बारें में सम्पूर्ण जानकारी दी गई हैं।

रस किसे कहते है? (Ras kise kahte hai)

काव्य मे रस का अर्थ आनन्द स्वीकार 
किया गया है। साहित्य शास्त्र मे रस का अर्थ अलौकिक या लोकोत्तर आनन्द होता हैं। 
दूसरे शब्दों में जिसका आस्वादन किया जाये वही रस है। रस का अर्थ आनन्द है अर्थात् काव्य को पढ़ने सुनने या देखने से मिलने वाला आनन्द ही रस है। रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से होती है। 

रस की परिभाषा (ras ki paribhasha)

कविता, कहानी, नाटक आदि पढ़ने, सुनने या देखने से पाठक को जो एक प्रकार के विलक्षण आनन्द की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं। 
दूसरे शब्दों में " काव्य के पढ़ने सुनने अथवा उसका अभिनय देखने मे पाठक, श्रोता या दर्शक को जो आनंद मिलता है, वही काव्य मे रस कहलाता हैं। रस 10 प्रकार के होते हैं नीचे दसों रस उनके स्थायी भाव के साथ दिए गए हैं---

रस इन हिन्दी
रस

दसों रस एवं उनके स्थायी भाव 
1. श्रृंगार रस का स्थायी भाव =        रति
2. हास्य रस का स्थायी भाव =         हास 
3. करूण रस का स्थायी भाव =       शोक
4. रौद्र रस का स्थायी भाव =           क्रोध 
5. वीभत्स रस का स्थायी भाव =      जुगुप्सा 
6. भयानक रस का स्थायी भाव =     भय 
7. अद्धभुत रस का स्थायी भाव =     विस्मय 
8. वीर रस का स्थायी भाव =           उत्साह 
9. शान्त रस का स्थायी भाव =         निर्वेद 
10. वात्सल्य रस का स्थायी भाव =  वत्सल 
आचार्य भरत ने नाटक मे आठ रस माने है। परवर्ती आचार्यों ने शान्त रस को अतिरिक्त स्वीकृति देकर कुल नौ रसों की पहचान निश्चित की। काव्य मे महाकवि सूरदास ने वात्सल्य से संबंधित मधुर पद लिखे, तो एक अन्य  नया रस वात्सल्य रस की स्थापना (जन्म हुआ)। 

रस के अंग (ras ke ang)

रस के चार अंग है जो इस प्रकार से है---
1. स्थायी भाव 
मानव ह्रदय मे स्थायी रूप मे विद्यमान रहने वाले भाव को स्थायी भाव कहते है। 
2. विभाव 
स्थायी भाव को जगाने वाले और उद्दीप्त करने वाले कारण विभाव कहलाते है। विभाव दो प्रकार के होते है--- (क) आलम्बन (ख) उद्दीपन।
3. अनुभाव 

  • स्थायी भाव के जाग्रत होने तथा उद्दीप्त होने पर आश्रय की शारीरिक चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती हैं। उदाहरण वन शेर को देखकर डर के मारे काँपने लगना, भागना आदि। अनुभाव पांच प्रकार के होते हैं-- 1. कायिक 2. वाचिक 3. मानसिक 4. सात्विक 5. आहार्य।
4. संचारी भाव 
जाग्रत स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए कुछ समय के लिए जगकर लुप्त हो जाने वाले भाव संचारी या व्यभिचारी भाव कहलाते है। जैसे वन शेर को देखकर भयभीत व्यक्ति को ध्यान आ जाये कि आठ दिन पूर्व शेर ने एक व्यक्ति को मार दिया था। यह स्मृति संचारी भाव होगा।

उदाहरण सहित दसों रस के भेद (ras ke udaharan)

1.  श्रृंगार रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

संयोग; श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति हैं। नर और नारी का प्रेम होकर श्रृंगार रस रूप मे परिणत होता हैं। इस रस मे नायक-नायिका के संयोग (मिलन) की स्थिति का वर्णन होता हैं। 
श्रृंगार रस का उदाहरण " बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करें, भौंहनि हँ सें, देन नट जाय।।
वियोग ; नायक-नायिका के बिछुड़ने या दूर देश मे रहने की स्थिति का वर्णन, वियोग श्रृंगार की व्यंजना करता हैं।
उदाहरण; " भूषन वसन विलोकत सिय के
प्रेम विवस मन कम्प, पुलक तनु नीरज नीर भये पिय के।"
यहाँ आलम्बन सीता तथा आश्रय राम है। सीता के आभूषण, वस्त्र आदि उद्दीपन हैं। कम्पन, पुलक, आँख मे आँसू अनुभाव हैं। दर्द, स्मृति भाव हैं। 
"राम के रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाई।
याते सबै सुधि भूलि गई, कर टेकि रही पल टारत नाहीं।।"

2. हास्य रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

जहाँ किसी व्यक्ति की विकृत (अटपटी) बाते वेश एवं बनावट, चेष्टा आदि का वर्णन हो जिसे सुनकर या देखकर हँसी उत्पन्न होती हैं, वहाँ हास्य रस होता हैं। 
हास्य रस का उदाहरण 
कहा बन्दरिया ने बन्दर से, चलो नहायें गंगा। 
बच्चों को छोडेंगे घर में, होने दो हुड़दंगा।।
" जब धूम धाम से जाती है बारात किसी की सज-धज कर।
मन करता धक्का दे दूल्हे को, जा बैठूं घोड़े पर।
सपने मे ही मुझको अपनी, शादी होती दिखती हैं। 
वरमाला ले दुल्हन बढ़ती, बस नींद तभी खुल जाती हैं। 

3. करूण रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के विनाश या अनिष्ट की आशंका से जागे शोक स्थायी भाव का विभावादि से पुष्ट होने पर करूण रस परिपाक होता हैं। 
करूण रस का उदाहरण 
"करि विलाप सब रोबहिं रानी। 
महाविपति किमि जाइ बखानी।।
सुनि विलाप दुखद दुख लागा।
धीरज छूकर धीरज भागा।।
इसमे रानियाँ आश्रय, राजा दशरथ की मृत्यु की सूचना उद्दीपन हैं। आँसू बहाना, रोना, विलाप करना, अनुभाव और विषाद, दैन्य, बेहोशी आदि संचारी भाव हैं। 
"अभी तो मुकुट बँधा था माथ
हुए कल ही हल्दी के हाथ। 
खुले भी न थे लाज के बोल
खिले भी न चुम्बन-शून्य कपोल।
हाय! रूक गया यही संसार, 
बना सिन्दूर अंगार।।"

4. रौद्र रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

दुष्ट के अत्याचार, अपने अपमान आदि के कारण जाग्रत क्रोध स्थायी भाव का विभावादि मे पुष्ट होकर रौद्र रस रूप मे परिपाक होता हैं। 
रौद्र रस का उदाहरण 
" श्री कृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगे।।
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण मे मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा, वे हो गए उठकर खड़े।।"
" सुनत लखन के वचन कठोरा।
  परशु सुधारि धरेउ कर घोरा।
 अब जनि दोष मोहि लोगू,
 कटू वादी बालक वध जोगू।।"

5. वीर की परिभाषा उदाहरण सहित 

वीर रस का स्थायी भाव उत्साह हैं। युद्ध या कठिन कार्य करने के लिए जगा उत्साह भाव विभावादि से पुष्ट होकर वीर रस बन जाता हैं। युद्ध मे विपक्षी को देखकर, ओजस्वी वीर घोषणाएं या वीर गीत सुनकर तथा उत्साह वर्धक कार्यकलापों को देखने से यह रस जाग्रत होता हैं।
वीर रस का उदाहरण 
"वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नही।"

6. भयानक रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

भयानक रस का स्थायी भाव भय है। भयंकर प्राकृतिक दृश्यों को देखकर अथवा प्राणों के विनाशक बलवान् शत्रु को देखकर उसका वर्णन सुनकर भय उत्पन्न होता हैं। 
भयानक रस का उदाहरण 
"एक ओर अजगर सिंह लखि, एक ओर मृगराय।
विकट वटोही बीच, पर्यो मूरछा खाय।।
" हाहाकार हुआ क्रन्दनमय कठिन वज्र होते थे चूर।
हुए दिगन्त बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर।।"

7. वीभत्स रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा हैं। 
जहाँ दुर्गन्धयुक्त वस्तुओं, चर्बी, रूधिर, आदि का ऐसा वर्णन हो, जिससे मन में घृणा हो वहाँ वीभत्स रह होता है।
वीभत्स रस का उदाहरण 
" कहुँ धूम उठत बरति कहूँ चिता,
   कहूँ होते रोर, कहूँ अर्थी धरि अहैं।
   कहूँ हाड़ परों, कहूँ जरो, अधजरो माँस,
   कहूँ गीध काग माँस नोचत पीर अहैं।।
" सिर पर बैठो काग आँखि दोऊ खात निकारत।
  खींचित जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।
  गिद्ध जाँघ कहँ खोदि-खोदि के मांस उपारत।
  स्वान अंगुरिन काटि के खात विरारत।।"

8.अद्भुत रस की परिभाषा उदाहरण सहित 


जहाँ अलौकिक व आश्चर्यजनक वस्तुओं या घटनाओं को देखकर जो विस्मय (आश्चर्य) भाव ह्रदय मे उत्पन्न होता है, वहाँ अद्भुत रस पाया जाता हैं।
अद्भुत रस का उदाहरण 
"बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, 
 कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
 आनन रहित सकल रस भोगी, 
 बिनु वाणी वक्का बड़ जोगी। "

9. शान्त रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

शान्त रस विषय वैराग्य एवं स्यायी भाव निर्वेद हैं। संसार की अनिश्चित एवं दु:ख की अधिकता को देखकर ह्रदय में विरक्ति उत्पन्न होती है। इस प्रकार के वर्णनो मे शान्त रस होता हैं। 
शान्त रस का उदाहरण 
"चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय।
दुइ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।" 

10. वात्सल्य रस की परिभाषा उदाहरण सहित 

जहाँ शिशु के प्रति प्रेम, स्त्रेह, दुलार आदि का प्रमुखता से वर्णन किया जाता है वहाँ वात्सल्य रस होता है, इसका स्थायी भावं वात्सल हैं। सूरदास ने वात्सल्य रस का सुन्दर निरूपण किया हैं।
वात्सल्य रस का उदाहरण 
"धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, 
  तैसि बनी सिर सुन्दर चोटी।।"
" जसोदा हरि पालने झुलावैं।
   हलरावैं दुलराय मल्हावैं, जोइ कछु गावैं।।"
"मैया मोरी मैं नही माखन खायों,
 ख्याल पैर सब सखा मिली मेरे मुख लपटायों।"
हमने इस लेख में ras in hindi रस किसे कहते है? रस के अंग दसों रसों की परिभाषा, भेद उदाहरण सहित जानीं। अगर इस लेख से सम्बंधित आपका कोई सवाल, विचार है तो हमें नीचे comment कर जरूर बताएं और अपने दोस्तों संग शेयर करना न भूले।

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