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10/19/2021

मुसोलिनी की विदेश नीति

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मुसोलिनी की विदेश नीति 

mussolini ki videsh niti;सत्ता में आने से पहले मुसोलिनी यह घोषण की थी, कि वह इटली को वैश्विक पटल पर महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिलायेंगा। मुसोलिनी का कथन था, ‘‘फासिज्‍म राज्‍य की सत्ता की सर्वोच्‍चता में विश्‍वास करता है।‘‘ अतः विदेश नीति में भी राज्‍य की सर्वोच्‍चता की स्‍थापना के लिए उसने साम्राज्‍यवादी तथा उपनिवेशवादी उग्र नीति को प्रतिपादित किया। मुसोलिनी का मानना था कि, ‘‘साम्राज्‍य विस्‍तार शाक्ति का प्रदर्शन है और इसके विपरीत साम्राज्‍य का चहारदीवारी में सीमित रहना पतन है।‘‘

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मुसोलिनी की विदेश नीति के सिद्धांत और विचार 

हिटलर की तरह मुसोलिनी भी इंग्‍लैण्‍ड़, फ्रासं और राष्‍ट्र संघ को विश्‍वासघाती मानता था तथा इनसे बदला लेना चाहता था क्‍योंकि इन्‍होंने प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद लंदन की संधि के तहत इटली को ट्रेण्टिनों, ट्रीस्‍ट, इस्ट्रिया, फ्यूम, टेल्‍मेशियन क्षेत्र, टायरोल, अल्‍बानिया आदि देने का वचन दिया था परन्‍तु उसे केवल टेण्टिनों, डाल्‍मेशिया और दक्षिणी टायरोल ही दिये गये। इस प्रकार उसका युद्ध में उपयोग तो किया गया परन्‍तु वचन पूरे नहीं किये गये। अतः सम्‍पूर्ण इटली और मुसोलिनी का यह विचार था कि यह अपमान इटली की भौगोलिक लघुता, शक्तिहीनता और वर्तमान सरकार की अयोग्‍यता के कारण हुआ था। अतः उसने शक्ति, साम्राज्‍य और लोह-नीति से इटली का उत्‍थान करने का निश्‍चय किया।

1. अल्‍‍बानिया पर अधिकार 

अल्‍बानिया इटली के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। इटली और अल्‍बानिया के मध्‍य ओट्रेंटो सागर था। इसके माध्‍यम से भूमध्‍यसागर पर नियंत्रण किया जा सकता था। ओट्रेन्‍टों को प्राप्‍त करने के लियें अल्‍बानिया को जीतना जरूरी था। अल्‍बानिया का निर्माण बाल्‍कन युद्ध के बाद हुआ था। ऑस्ट्रिया और इटली ने अल्‍बानिया को संघर्ष का केन्‍द्र बनाया। इटली अल्‍बानिया को संरक्षित राज्‍य के रूप में लेना चाहता था। परंतु मित्र राष्‍ट्रों ने इसे पसंद नहीं किया। 1925 में जूगो नामक व्‍यक्ति न वहां गणतंत्र की स्‍थापना की। अल्‍बानिया की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। इसलिए इटली ने सहायता प्रदान करने के बहाने अल्‍बानिया पर अपना अधिकार कर लिया। 1926 ई. में संधि के अनुसार यह तय किया गया कि उसकी सेनाओं का प्रशिक्षण इटली करेगा और उसे आर्थिक सहायता देगा, जिसके बदले में इटली को अल्‍बानिया की आं‍तरिक एवं बाह्य नीति नियंत्रित करने का अधिकार मिल गया। इटली का अल्‍बानिया अधिकार 1939 ई. तक रहा। बाद में मुसोलिनी ने आक्रमण द्वारा अल्‍बानिया पर अधिकार कर लिया। 

2. कोर्फु कांड

यूनान में सन् 1923 ई. कुछ डकैतों के द्वारा एक इटालियाई सेनापति और उसके सहयोगियों की हत्‍या हो गई। मुसोलिनी ने इसके हर्जाना भरने के लियें अल्‍टीमेटम जारी कर दिया। और बिना राष्‍ट्रसंघ को सूचित किए इटली के लडाकू जहाजों ने यूनान के एक द्वीप कोर्फू पर गोलीबारी की। उस पर कब्‍जा कर लिया। इसके साथ ही उससे पचास लाख लीरा की मांग की गई तो जो यूनान द्वारा पूर्ण कर दी गई। इसकी जांच के लियें मित्र राष्‍ट्रों ने एक कमीशन बैठाया जिसने यूनान के प्रति थोड़ी से सहानुभूति जताई। इटली को कोर्फु पर से कब्‍जा समाप्‍त करने की सलाह दी, बदले में यूनान को क्षतिपूर्ति करना थी। इटली द्वारा आरंभ से अंत तक इस मसले पर जो नीति अपनाई गई वह उसकी नई आक्रामक शैली की परिचायक थी। 3.इथोपिया पर आक्रमण 

3­. अबीसीनिया पर आक्रमण 

जब यूरोपीय राजनीति में हिटलर की आक्रमक नीति का भूचाल आया हुआ था। तब मुसोलिनी ने भी सन् 1934 ई. उचित समय जानकर अबीसीनिया का भक्षण कर लिया। सन् 1896 ई. में एडोवा की घटना को लेकर अबीसीनिया ने इटली के साम्राज्‍यवादी इरादों को मात दी थी। इटली तथा इथोपिया के बीच मुसोलिनी युद्ध अवसर तलाश रहा था। वह अवसर 5 दिसम्‍बर 1934 ई. को आया, जिसमे इटली तथा इथोपिया  के सैनिकों के मध्‍य युद्ध प्रारंभ हो गया। इधर इथोपिया को लेकर फ्रांस तथा ब्रिटेन भी चिन्तित थे। 7 जनवरी 1935 ई. को इटली तथा फ्रांस में समझौता हो गया। अंतः अबीसीनिया के मामले में फ्रांस ने चुप्‍पी साध ली। पाश्‍चात्य राष्‍ट्र हिटलर की बढ़ती शक्ति से चिन्तित थे। अतः मुसोलिनी की आक्रमक नीति की ओर ध्‍यान नही दे रहे थे। यूरोपीय राजनीति की हलचल का फायदा उठाकर अक्‍टुबर 1935 ई. में मुसोलिनी ने अबीसीनिया को घेर लिया। अबीसीनिया के इरिटिया तथा सोमालीलैण्‍ड़ इटली के अधिकार में थे। अतः मुसोलिनी अबीसीनिया को इटली के औद्योगिक विकास के लिए आवश्‍यक मानता था। अबीसीनिया के सम्राट ‘हेलसिलाली‘ ने राष्‍ट्रसंघ से अपील की तथा पंच फैसला चाहा। मुसोलिनी ने राष्‍ट्रसंघ की कोई परवाह नहीं कर 1936 ई. में अबीसीनिया की राजधानी अंदिस-अवाबा पर अधिकार जमा लिया। सम्राट हेलसिलाली इंग्‍लैण्‍ड़ पलायन कर गया। 9 मई 1936 ई. को अबीसीनिया इटली साम्राज्‍य का अंग घोषित कर दिया गया। 

4. रूस से संधि 

मुसोलिनी अपने लियें एक मित्र राष्‍ट्र की तलाश में था। उस समय यूरोप में अधिकांश राष्‍ट्र यथास्थिति के समर्थक थे। केवल आस्ट्रिया, हंगरी और बल्‍गारिया ही ऐसे राज्‍य थे जो संधि के इच्‍छुक थे। ये राष्‍ट्र इटली से मित्रता स्‍थापित करना चाहते थे, यद्यपि ये सब छोटे राज्‍य थे किन्‍तु इनके साथ भी इटली ने संधिया कर लीं। इटली किसी बड़े राज्‍य से संधि का इच्‍छुक था। इस कारण उसने 1924 ई. में सोवियत रूस के साथ एक व्‍यापारिक समझौता कर लिया। उसने सोवियत संघ की साम्‍यवादी सरकार को मान्‍यता प्रदान कर दी। उसे राष्‍ट्रसंघ में शामिल करने का प्रयास भी करने लगा। 

5. जर्मनी के साथ मित्रता 

हिटलर ने जब 1935 ई. में वर्साय-संधि का उल्‍लघंन किया तो इटली, फ्रांस और इंग्‍लैण्‍ड़ के प्रतिनिधि स्‍ट्रेसा नामक स्‍थान पर मिले और एक समझौता किया जिसके अनुसार हिटलर के विरूद्ध एक संयुक्‍त मोर्चा कायम किया गया। अबीसीनिया युद्ध के बाद इटली की विदेश-नीति बड़ी अवसरवादी हो गयी। राष्‍ट्रसंघ ने अबीसीनिया पर आक्रमण का विरोध किया था। अतएव इटली राष्‍ट्रसंघ से अलग हो गया। अबीसीनिया के प्रश्‍न पर इंग्‍लैण्‍ड़, फ्रांस आदि राष्‍ट्र भी उससे चिढ़ गये। अब उसने अपना ध्‍यान जर्मनी की ओर आकर्षित किया जिसने उसको साम्राज्‍य-विस्‍तार में बड़ा सहयोग प्रदान किया गया था। जर्मनी को भी मित्र की आवश्यकता थीं। अक्‍टूबर, 1936 ई. में दोनों देशों में एक संधि हुई जो रोम-बर्लिन धूरी के नाम से विख्‍यात है। 1937 ई. में इटली उस संधि में भी सम्मिलित हो गया जो जर्मनी के रूस के विरूद्ध नवम्‍बर, 1936 ई. में जापान से की थी और ‘कामिन्‍टार्न विरोधी संधि‘ के नाम से विख्‍यात थी। इस प्रकार जर्मनी, जापान और इटली का एक संघ बन गया।  

6. द्वितीय महायुद्ध तथा मुसोलिनी

हिटलर द्वारा पोलैण्‍ड़ के क्षेत्र पर आक्रमण करते ही सितम्‍बर 1939 ई. में द्वितीय विश्‍व युद्ध का आगाज हो गया। 22 मई 1939 को जर्मनी तथा इटली ‘‘फौलादी समझौता‘‘ कर चुके थे। मुसोलिनी ने ‘‘तेल देखो, तेल की धार देखो‘‘ नीति अपनाकर युद्ध में भाग लेने का तत्‍काल कोई निर्णय नहीं किया। इसके लिए उसने विचार विमर्श करके श्रृंगाल की नीति का अनुसरण करते हुऐ निर्णय लिया कि लाभ किसके साथ रहने से होगा? अन्‍ततः जून 1940 ई. में हिटलर की बढ़ती शक्ति तथा विजयों की ओर आकर्षित होकर मुसोलिनी ने जर्मनी की ओर से युद्ध में भाग लिया। मुसोलिनी का निर्णय गलत सिद्ध हुआ। द्वितीय विश्‍व युद्ध में पराजय के बाद उसको अपने ही देशवासियों ने गोली से उड़ा दिया। फासीवाद इटली के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। 

मुसोलिनी की विदेश नीति का मूल्‍याकंन 

यह सब विवरण से यह तो स्‍पष्‍ट होता है कि मुसोलिनी ने सत्ता को अपने हाथ में लेन के बाद अपने देश में महायुद्ध  से पैदा निराशा, हीनता तथा आपमान की भावना को खत्‍म करके इटली में अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठा की स्‍थापना की। उसने विश्‍व के सामने यह सिद्ध कर दिया कि इटली निर्बल राष्‍ट्र नहीं है, उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती। मुसोलिनी ने पहले के शासन की भूलों को सुधारने का प्रयास किया। उसने अनेक संधियों से इटली को शक्तिशाली राष्‍ट्र बनाया, लेकिन उसने अनेक संधियों से इटली को शक्तिशाली राष्‍ट्र बनाया, लेकिन उसने भी इटली को महायुद्ध में झोंक दिया। इसके लिए उसकी विदेशनीति भी जिम्‍मेदार थी।

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