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10/13/2021

द्वितीय चीन जापान युद्ध कारण, घटनांए, परिणाम

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द्वितीय चीन-जापान युद्ध (1937-45)

dwitiya chin japan yudh karan ghtnayen prinam;जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कर सितम्‍बर, सन् 1931 ई. में जीत लिया। जापान ने मंचूरिया को जीतकर उसको मंचकूओं नाम से नया राज्‍य स्‍थापित किया। चीन ने राष्‍ट्रसंघ में अपील की उसने कहा कि जापान ने बिना कुछ कारण के ही मंचूरिया पर आक्रमण किया हैं। उसकी इस अपील से रूस तथा ब्रिटेन तटस्‍थ रहें। राष्‍ट्रसंघ ने भी जापान के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर अपनी कमजोरी प्रकट कर दी थीं। 

इसके बाद जापान केवल मंचूरिया पर अधिकार कर संतुष्‍ट नहीं हुआ बल्कि वह विस्‍तारवादी नीति की ओर अग्रसर हो गया। चीन के विशाल प्रदेश के उत्तरी भाग के विभिन्‍न क्षेत्रों पर अधिकार कर जापान अपनी साम्राज्‍यवादी भूख को मिटाना चाहता था। अतः 8 जुलाई 1937 ई. को जापान ने चीन के विरूद्ध युद्ध घोषित कर दिया। इस युद्ध के प्रारंभ होने के कारण का कोई महत्‍व नहीं था। वस्‍तुतः जापान विस्‍तारवादी नीति पर तुला हुआ था। अतः कोई भी बहाना ढूंढ लेना ही काफी था। 

द्वितीय चीन-जापान युद्ध के कारण (dwitiya chin japan yudh ke karan)

चीन जापान के बीच द्वितीय युद्ध के निम्नलिखित कारण थे--

1. अंतर्राष्‍ट्रीय परिस्थितियां

1937 ई. तक आते-आते अंतर्राष्‍ट्रीय परिस्थितियां जापान के अनुकूल हो चुकी थीं। मंचूरिया के प्रश्‍न पर राष्‍ट्रसंघ की निर्बलता ने सभी से राष्‍ट्र से भय समाप्‍त कर दिया था। इंग्‍लैंड, जापान और रूस तो जर्मनी में हिटलर एंव इटली में मूसोलिनी के अभ्‍युदय से परेशान थे। इंग्‍लैण्‍ड, जापान और रूस के लिए हिटलर व मूसोलिनी का आतंक खत्‍म कियें बिना सुदूरपूर्व की समस्‍या पर गंभीर रूप से ध्‍यान दे सकना संभव नहीं था। अमेरिका ने इस बीच तटस्‍थता की नीति की घोषणा कर दी। जापान ने इस परिस्थिति में 1936-37 ई. में जर्मनी एवं इटली से समझौता कर लिया। यह समझौता इतिहास में ‘एंटी कोमिण्‍टर्न पैक्‍ट‘ के नाम से जाना जाता है। जापान, जर्मनी और इटली के मध्‍य हुए इस समझौते ने जापान को नई शक्ति प्रदान कर दी। 

2. साम्‍यवादी व कुओमिन्‍तांग सरकार के बीच समझौता

यह समझौता च्‍यांग काई शेक के रिहा होने के बाद ही सम्‍भव हो पाया। 25 दिसंबर 1936 ई. च्‍यांग काई शेक रिहा हो गया, और इसके बाद साम्‍यवादी व कुओमिन्‍तांग सरकार के बीच एक समझौता हो गया। समझौता हो जाने से चीन के आंतरिक संघर्ष की समाप्ति हुई तथा देश की संपूर्ण जनता एक साथ मिलकर जापान का विद्रोह करने को तैयार हो गई। 

3. जापान विरोधी भावनाएं 

चीन में जापान विरोधी भावनांए इतनी प्रबल हो उठीं कि जगह-जगह पर जापान विरोधी प्रदर्शन उग्र होने लगे। हैन्‍कों नामक स्‍थान पर एक जापानी सिपाही का वध तक कर दिया गया। इस घटना ने जापान को बहुत उत्‍तेजित किया। 

द्वितीय चीन जापान युद्ध की प्रमुख घटनांए 

1. चीन में जापान की विस्‍तार वादी नीति के कारण चीन के नागरिकों में जापान विरोधी भावना जाग उठी। 1936-1937 ई. में चीन राजनीतिक एकीकरण की दिशा में बढ़ने लगा। 

2. 1936 ई. में च्‍यांग की गिरफ्तारी से मुक्ति के बाद नानकिंग में च्‍यांग-काई-शेक के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रवादी सरकार और साम्‍यवादीयों ने अपने मतभेदों को भुलाकर जापान के विरूद्ध संयुक्‍त मोर्चा स्‍थापित किया। 

3.1936-1937 ई. का वर्ष जापान के लिए बड़ा उत्‍कर्ष भरा रहा। इसके उत्‍कर्षता के लिये इसको उसकी सेनिक शक्ति ने प्रेरित किया। चीन की असंगठित सरकार से उसे प्रेरणा मिली। जापानी सैनिक अधिकनायक भी ऐसा समझ रहे थे कि अधिनायकवाद की स्‍थापना के लिए विदेशी संघर्ष जरूरी था। इसी समय जापान जर्मनी और इटली के साम्‍यवाद विरोधी गुट में आ गया। 

4. नानकिंग पर कब्‍जा करने के लिये जापान ने सरकारों का संगठन करने के साथ-साथ जापानी सेनाओं ने द.चीन के समुद्र तटों पर हमला किया। नवंबर 1937 ई. में जापानी सेनाओं ने शंघाई पर भी फतेह हासिल कर ली। शंघाई के बाद जापान की सेना ने नानकिंग प्रांत कि तरफ रूख किया। 15 दिसबंर, 1937 को नानकिंग जो कि कुओमिन्‍तांग सरकार की राजधानी था, पर जापान का कब्‍जा हो गया। कुओमिन्‍तांग सरकार जापान की शक्तिशाली सेना का मुकाबला करने की स्थिति में न थी इसलिए च्‍यांग कई शेक ने सभी सरकारी कार्यलायों को जापानी सेनाओं के प्रवेश से पूर्व ही हैंको पहुंचा दिया था। अब तक च्‍यांग की सभी उत्‍तम सैनिक टुकडियां समाप्‍त हो गई थी अतः उसने हैंकों पहुंचकर वहीं से जापान के विरूद्ध युद्ध जारी रखा।

5. जापान की स्थिति इसलिए मजबूत थीं क्‍योकि उसके पास उसकी श्रेष्‍ठ वायुसेना, गोला-बारूद और अन्‍य शस्‍त्रों की बहुत ही भरमर थी। इन वस्‍तुओं ने उसकी स्थिति को मजबूत बना दिया और--

1. उसने 1937 में शंघाई पर आक्रमण किया। 

2. जापानियों ने बिना युद्ध की घोषणा किए हुए नगर पर बमबारी की। 

3. शंघाई के पतन के बाद जापानी सेनाएं नानकिंग की ओर बढ़ी। दिसम्‍बर में नानकिंग उसके हाथ आ गया। अक्‍टुबर 1938 ई. में जापान ने हेन्‍कों और केन्‍टन भी जीत लिया। चीन की सरकार ने हेन्‍कों को अपनी राजधानी बनाया। 

6. यह सब घटना क्रम लगभग आठ वर्षो तक चलता रहा। और इस युद्ध का अंत 17 अगस्‍त 1945 ई. को हुआ। इस युद्ध में चीन के तकरीबन 18 लाख सैनिक मारे और 17 लाख लापता हो गयें। जापान को अनेक विजयें प्राप्‍त हुई। अन्‍त में 9 सितम्‍बर 1945 ई. को चीन में जापानी सेनाओं ने आत्‍मसमर्पण किया। जापान में परिवर्तन और प्रगति कि प्रक्रिया के कारण उत्‍साह-उमंग था, लेकिन योजना, चिन्‍तन और दूरदर्शिता का अभाव था। जापान के मित्र राष्‍ट्र उससे काफी दूर थे। यही उसकी पराजय का कारण था। 

द्वितीय चीन-जापान युद्ध के परिणाम 

चीन जापान युद्ध जो 1937 से प्रारंभ हुआ। इसके काफी परिणाम निकलकर सामने जिसमें की सबसे महत्‍वपूर्ण था, चीन में कठपुतली सरकार की स्‍थापना होना। 

हेन्‍कों पर विजय प्राप्‍त करने के बाद चीन में एक नयी सरकार की स्‍थापना हुई जिसका कार्यभार बांगचिंग बेई को सौपां गया। बांगचिंग वेई च्‍यांग का ही मित्र था पर इसने हेन्‍कों की विजय के बाद च्‍यांग का साथ छोड़ दिया था। इसका कारण यह था कि च्‍यांग युद्ध जारी रखना चाहता था। किन्‍तु बांग जापान के साथ समझौता कर चीन में शांति स्‍थापित करने के पक्ष में था। अंततः बांग का  1940 ई. में जापान के साथ एक समझौता हो गया तथा बांग के नेतृत्‍व में मंचूकुओं की ही भांति एक कठपुतली सरकार की स्‍थापना चीन में हुई। जुलाई 1941 ई. में जर्मनी, स्‍पेन, इटली, रूमानिया और अन्‍य तानाशाह राष्‍ट्रों ने इस सरकार को मान्‍यता प्रदान कर दी। जापान के दबाव में आकर अब नानकिंग की इस कठपुतली सरकार ने 9 जनवरी 1943 ई. में इंग्‍लैण्‍ड़ और अमेरिका के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इधर साम्‍यवादियों ने माओत्‍से तुंग के नेतृत्‍व में कठपुतली वाली सरकार एंव जापान का विरोध जारी रखा। इस पर जापानियों के नृशंस अत्‍याचार किए। द्वितीय विश्‍वयुद्ध का भाग बन जाने के कारण चीन-जापान युद्ध का अंत भी 1945 ई. में जापान के समर्पण के बाद ही हुआ।

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