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8/15/2021

वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएं

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वैदिक शिक्षा का अर्थ 

vaidik kalin shiksha ko samjhaie;वैदिक साहित्य मे शिक्षा से आशय विद्या, बोध और विनय से होता था अर्थात् वेदों के अनुसार शिक्षा का अर्थ ज्ञान अथवा विद्या की प्राप्ति है। वेदों के आधार पर शिक्षा ज्ञान, आत्मा तथा ब्रह्रा की खोज है। शिक्षा का उद्देश्य आत्मानुभूति व आत्मबोध है। वेदों के अनुसार शिक्षा पूर्णता तक पहुँचाने का सद् मार्ग है। वेदों को समस्त ज्ञान का कोश माना गया है। वेदों मे शिक्षा को मोक्ष का साधन भी माना गया है--" सा विद्या या विमुक्तये।" 

यहाँ शिक्षा विमुक्ति का साधन थी। यह मानव हेतु एक 'स्व-पहचान' की अनुभूति थी, जिससे कि वह जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सके। 

भारतीय शैक्षिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं का इतिहास विश्व मे सबसे प्राचीन है। इसका अस्तित्व विगत 5000 वर्षों से भी ज्यादा सुदूर अतीत में दृष्टिगोचर होता है। हम सिर्फ आत्माभिमान मे ही ऐसा नही मान बैठे बल्कि कई अंग्रेजी विद्वानों ने भारतीय शिक्षा के स्वरूप को इस तरह उकरने का प्रयत्न किया है जिससे कि इसके गौरवान्वित अतीत की पुष्ठि होती है। 

एफ. डब्ल्यू. थाॅमस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक- 'द हिस्ट्री एंड प्रोस्पेक्टस ऑफ ब्रिटिश एजुकेशन इन इंडिया' में अपने विचारों को उद् धृत करते हुए लिखा है," भारत मे शिक्षा कोई नवीन प्रत्यय नही है। ऐसा कोई भी विश्व का देश नही है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय से शुरू हुआ हो अथवा जिसने इतना सहज, स्थायी तथा शक्तिशाली प्रभाव अपनी आगामी पीढ़ियों पर छोड़ा हो।" 

यह चिर-संरक्षित शैक्षिक संस्कृति तथा अपनी अस्मिता को इसलिए बचा पायी क्योंकि यह धर्म से अनुप्राणित थी, सांसरिक कष्टों के शमन हेतु नही, बल्कि पारलौकिक कष्टों के निदान का माध्यम थी। यह मात्र मानव निर्माण मे नही 'महामानव' की संकल्पना से विभूषित थी। इसके उद्देश्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्रोत्थान की संकीर्णता से ऊपर विश्व कल्याण एवं 'वसुधैव कुटुम्बकम' के महाबोध से प्रतिध्वनित होते थे। 

हमारा प्राचीन भारतीय वाड़्गमय तथा साहित्य ऐसे उद्धरणों से भरा पड़ा है जहाँ शिक्षा के समस्त पक्षों पर महर्षियों, मनीषियों, चिंतको ने अपने विचार प्रस्तुत किये है। इस आधार पर शिक्षा के सर्वोत्कृष्ट स्वरूप की संकल्पना सरल तथा सुबोध हो जाती है साथ ही उसकी तार्किक तथा वैज्ञानिक पुष्टि भी। 

भारतीय प्राचीन शिक्षा का स्वरूप वर्तमान जीवन की तैयार अथवा जीने की कुशलता जैसे तुच्छ गुणों की सीमाओं में न बँधकर मानव के धार्मिक, आध्यात्मिक उत्थान की शिक्षा थी, जो पारलौकिक जीवन हेतु मनुष्य को तैयार कर रही थी। यह तात्कालिक समय सीमाओं से परे त्रिकालदर्शी तथा शाश्वत थी, जिसकी अमर धारा आज तक प्रवाहित है। 

वैदिक शिक्षा की विशेषताएं 

प्राचीन भारतीय शिक्षा के आदर्शों तथा उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु तत्कालीन ब्राह्रणों, शिक्षकों ने जिस विशिष्ट शिक्षा-प्रणाली का विकास किया, उसका गुणगान करते हुए डाॅ. एफ. ई. केई ने लिखा है," ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा-प्रणाली का विकास किया, वह न सिर्फ साम्राज्यों के पतन तथा समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्जलिय रखा।" वैदिक कालीन या वैदिक युगीन शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएं है--

1. शिक्षा प्रणाली 

वैदिक काल मे छात्र माता-पिता का घर छोड़कर गुरूकुल मे रहकर ही शिक्षा प्राप्त किया करते थे। गुरू मौखिक प्रवचन द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे और छात्र सुनने के बाद मनन तथा चिन्तन किया करते थे। उस समय मौखिक पद्धति का प्रचलन हुआ करता था। कभी-कभी वाद-विवाद करना, कथा प्रणाली का प्रयोग, गृहकार्य देना आदि का प्रयोग भी किया जाता था। 

2. विद्यालय भवन 

प्राचीन काल में छात्रों हेतु किस तरह के भवन थे, इस विषय मे किसी प्रकार की ठोस जानकारी उपलब्ध नही है अतः डाॅ. अल्तेकर का यह मत सामान्य रूप से स्वीकार किया जाता है," अच्छे मौसम में कक्षाएं वृक्षों की छाया मे होती होंगी, पर वर्षा-ऋतु मे किसी तरह के साधारण आच्छादन की व्यवस्था जरूर होगी। जहाँ तक देवालयों मे शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों का प्रश्न है, वहाँ उनके लिए भव्य तथा विशाल भवन थे।"

3. गुरूकुल प्रणाली 

प्राचीन भारतीय शिक्षा की एक विशेषता गुरूकुल-प्रणाली थी। गुरूकुल किसी सुंदर प्राकृतिक स्थान  पर साधारणतः किसी ग्राम अथवा नगर के निकट होते थे, ताकि छात्रों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति हो सके तथा उन्हें भिक्षाटन की सुविधा रहे छात्र अपने गुरू के पास उसके कुल के सदस्य के रूप मे रहकर ज्ञान का अर्जन करते थे तथा उससे वास्तविक जीवन की शिक्षा प्राप्त करते थे। वे गुरू के उच्च विचारों तथा आदर्शों को अनुकरण करके, अपने श्रेष्ठ जीवन का निर्माण करते थे। 

4. नियंत्रण मुक्त 

इन आश्रमों तथा गुरूकुलों पर केवल आचार्य का ही नियंत्रण रहता था। ये आश्रम तथा गुरूकुल बाहरी नियंत्रण तथा हस्तक्षेप से पूरी तरह से स्वतंत्र रहते थे। किसी व्यक्ति विशेष, दल, समूह, राज्य तथा सरकार के नियंत्रण तथा हस्तक्षेप से सदैव दूर रहते थे। प्रत्येक आचार्य अपने आश्रम अथवा गुरूकुल का सर्वेसर्वा होता था। इतना ही नही, प्रत्येक आश्रम जातीय तथा सामुदायिक प्रभावों से भी बहुत दूर था। 

5. वैदिक शिक्षा शुरू करने की आयु 

डाॅ. ए. एस. अल्तेकर ने लिखा है," वैदिक शिक्षा उपनयन संस्कार के बाद शुरू होती थी तथा कई बातों मे आधुनिक माध्यमिक शिक्षा के समान थी। अतः उसे शुरू करने की आयु साधारणतः 8 अथवा 12 वर्ष के बीच में मानी जाती थी। मनु के अनुसार," ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य छात्रों का उपनयन संस्कार क्रमशः 8, 11, 12 वर्ष की आयु तक हो जाना चाहिए। (शुद्रों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नही था) मनु ने उपनयन की उच्चतम आयु भी निर्धारित कर दी थी जिसके बाद यह संस्कार नही हो सकता था। यह उच्चतम आयु ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य छात्रों के लिए क्रमशः 16, 22 और 24 थी। 

यहाँ इस बात का उल्लेख कर देना असंगत न होगा कि जिस तरह वैदिक शिक्षा प्राप्त करने हेतु "उपनयन संस्कार" अनिवार्य था, उसी तरह सैनिक शिक्षा, औषधि शास्त्र की शिक्षा आदि के लिए भी था। 

6. अध्ययन की अवधि 

प्राचीन काल में अध्ययन की अवधि प्रायः 12 वर्ष की थी। इस अवधि मे छात्र सिर्फ एक वेद का अध्ययन कर सकते थे। अगर वे एक से ज्यादा वेदों का अध्ययन करना चाहते थे, तो उनको हर वेद के लिए 12 वर्ष व्यतीत करने पड़ते थे। 12, 24, 36, तथा 48 की आयु तक अध्ययन करने वाले छात्र क्रमशः स्नातक, बसु, रूद्र तथा आदित्य कहलाते थे। साहित्य तथा अर्थशास्त्र के छात्रों के अध्ययन की अवधि 10 वर्ष की थी। 

7. पाठ्यक्रम 

पाठ्यक्रम मे राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, व्याकरण, ज्योतिष एवं तर्कविज्ञान को शामिल किया जाता था। नृत्य, कला, संगीत व अभिनय आदि को भी स्थान दिया गया था। स्वास्थ्य शिक्षा का पाठ्यक्रम में विशेष स्थान होता था। 

8. परीक्षाएँ 

परीक्षाएँ मौखिक रूप से प्रतिदिन होती थी। दूसरा पाठ पढ़ाने से पहले पढ़ाए गये पाठ की मौखिक परीक्षा ली जाती थी। 

9. शिक्षा-सत्र छुट्टियाँ 

शिक्षा-सत्र, श्रावण मास की पूर्णिमा को 'उपाकर्म' 'श्रावणी' समारोह से शुरू होता था तथा पौष मास की पूर्णिमा को 'उत्सर्जन' समारोह के साथ खत्म होता था। इस प्रकार शिक्षा-सत्र की अवधि पाँच माह की थी। 

आधुनिक समय के समान प्राचीन काल मे भी शिक्षा-संस्थाओं मे छुट्टियाँ होती थी। हर मास में एक-एक सप्ताह के अंतर से चार छुट्टियाँ मिलती थी। ज्यादा आयु के छात्रों की बजाय कम आयु के छात्रों को ज्यादा छुट्टियाँ मिलती थी। छुट्टियाँ लंबी नही होती थी क्योंकि आवागमन की कठिनाइयों के कारण छात्र साधारणतः शिक्षा खत्म करके ही घर लौटते थे।

10. निःशुल्क शिक्षा 

वैदिक काल मे गुरूकुलों मे शिष्यों से किसी प्रकार का शुल्क नही लिया जाता था तथा शिष्यों के आवास, भोजन व वस्त्रादि की व्यवस्था निःशुल्क होती थी। इन पर हुये व्यय की पूर्ति समाज के संपन्न वर्ग द्वारा प्राप्त दान, भिक्षाक व गुरूदक्षिणा से होती थी। आज भी संसार के सभी देशों मे एक निश्चित स्तर तक की शिक्षा निःशुल्क है। 

11. कक्षा-नायकीय पद्धति 

प्राचीन भारतीय शिक्षा की एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता कक्षा-नायकीय पद्धति थी। इस पद्धति मे उच्च कक्षाओं के बुद्धिमान छात्र, जिनको नायक कहा जाता था, निम्न कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाते थे तथा इस तरह गुरू के शिक्षण कार्य मे मदद देते थे। इस पद्धति के दो प्रमुख लाभ थे। पहला, शिक्षक की अनुपस्थित मे शिक्षण का कार्य अधिकांश कक्षाओं मे चलता रहता था। दूसरा, कक्षा-नायक कुछ समय के बाद शिक्षण कार्य में प्रशिक्षित हो जाते थे। 

12. अनुशासन 

गुरूकुल मे छात्र पिता-पुत्र की तरह रहते थे। इसलिए छात्र आत्म-अनुशासित होते थे। दण्ड केवल छात्रों को प्रायश्चित स्वरूप दिया जाता था। 'स्व अनुशासन' की प्रथा थी। छात्र गुरू के प्रति आज्ञाकारी व विनम्र होते थे। 

13. गुरू शिष्य संबंध 

वैदिक काल मे गुरु-शिष्य संबंध अत्यंत मधुर हुआ करते थे। गुरु-शिष्य पिता-पुत्र की तरह रहते थे। शिष्य अपने अध्ययन काल मे पूर्णरूपेण गुरू के संरक्षण मे रहता था। गुरू शिष्य का आध्यात्मिक पिता माना जाता था। गुरू शिष्य की उसी प्रकार देखरेख करता था जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र की करता है। गुरु-शिष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास का प्रयास करता था। आवश्यकता होने पर गुरु अपने शिष्य की सुश्रूषा तथा चिकित्सा भी करता था। गुरू अपने शिष्यों मे अच्छी आदतों का निर्माण करता था। गुरू का प्रयास अपने शिष्यों का शारिरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास रहता था। 

छात्र गुरू के प्रति बड़ी श्रद्धा व सेवा-भाव रखते थे। गुरू की आज्ञा का पालन करना, सेवा करना, दैनिक कार्य करना, भिक्षा माँगना तथा आश्रम की व्यवस्था संबंधी कार्यों में गुरू की सहायता करना छात्रों के प्रमुख कर्तव्य माने जाते थे। 

14. नारी शिक्षा 

वैदिक काल मे कन्याओं का उपनयन होता था, किन्तु बालकों के समान उनके लिए पृथक से गुरूकुल नही थे। फिर भी वैदिक युग मे स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। वे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा ग्रहण कर सकती थी। बालकों के समान बालिकाएँ भी ब्रह्राचर्य व्रत का पालन करती थी तथा यज्ञों मे भाग लेती थी। 

15. शिक्षा का उद्देश्य 

प्राचीन भारतीय समाज के सभी पक्ष धार्मिक भावनाओं से परिपूर्ण थे। समाज के प्रत्येक पहलू पर धर्म का रंग चढ़ा हुआ था। फलतः शिक्षा भी धर्म के आधार आधारित थी। धर्म के कारण शिक्षा के उद्देश्य भी धार्मिक थे। वैदिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य आध्यात्मिक विकास करना था। 

डाॅ. राधा कुमुद मुकर्जी के अनुसार," ज्ञान प्राप्ति केवल ज्ञान-प्राप्ति के लिए ही नही थी और न धर्म का एक अंग ही थी, बल्कि इसका प्रमुख उद्देश्य जीवन का चरम लक्ष्य 'मुक्ति' प्राप्त करना था।"

16. शिक्षा का स्वरूप 

प्राचीन समय मे संपूर्ण शिक्षा-धर्म मे अनुप्राणित थी। शिक्षा के आदर्श, उद्देश्य, व्यवस्था, विषय-सामग्री, यहाँ तक की छात्रों का दैनिक जीवन भी धर्म पर अवलंबित था। ज्ञान का अर्जन धर्म के द्वारा तथा धार्मिक कर्तव्य के रूप मे किया जाता था। इस तरह शिक्षा का संपूर्ण कलेवर, धर्म के अभेद्य आवरण से आवृत्त था।

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