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8/16/2021

वैदिक कालीन शिक्षा के गुण, दोष

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वैदिक कालीन शिक्षा के गुण 

वैदिक शिक्षा के गुण निम्नलिखित है-- 

1. निःशुल्क तथा सार्वभौमिक शिक्षा 

प्राचीन भारत मे शिक्षा निःशुल्क थी, लेकिन शिक्षा खत्म करने के बाद हर छात्र अपने गुरू को दक्षिणा जरूर देता था। दक्षिणा के रूप में धन, भूमि, पशु, अन्न कुछ भी दे सकता था। दक्षिणा इतनी कभी नही होती थी, जो शिक्षक का पर्याप्त पारिश्रमिक कहा जा सके। 

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2. अनुशासन 

गुरूकुल मे छात्र पिता-पुत्र की तरह रहते थे। इसलिए छात्र आत्म-अनुशासित होते थे। दण्ड केवल छात्रों को प्रायश्चित स्वरूप दिया जाता था। 'स्व अनुशासन' की प्रथा थी। छात्र गुरू के प्रति आज्ञाकारी व विनम्र होते थे। 

3. शिक्षा का व्यापक अर्थ 

वैदिक काल मे, गुरूकुल शिक्षा पूर्ण करने पश्चात भी छात्रों को आलस्य न करने की शिक्षा दी जाती थी। अतः वे जीवन मे अन्य कार्यों को करते हुये भी निरंतर ज्ञानोपार्जन करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार वैदिक शिक्षा पद्धति शिक्षा से संबंधित उन समस्त पक्षों पर विचार करती है, जिनका सामना मनुष्य को अपने जीवन मे समय-समय पर करना पड़ता है। अतः इसका स्वरूप व्यापक था। वर्तमान मे संसार के प्रायः हर देशों मे सतत् शिक्षा की व्यवस्था है।  

4. शिक्षा का व्यापक उद्देश्य 

वैदिक कालीन शिक्षा के द्वारा मनुष्यों का शारीरिक व मानसिक विकास किये जाने के अतिरिक्त उन्हें सामाजिक एवं राष्ट्री कर्तव्यों का बोध कराकर उनका नैतिक व चारित्रिक विकास भी किया जाता था। उसकी व्यावसायिक शिक्षा के साथ ही आध्यात्मिक विकास हेतु भी प्रेरित किया जाता था, परन्तु सबसे अधिक बल ज्ञान के विकास, चरित्र निर्माण और आध्यात्मिक विकास पर दिया जाता था। अतः शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य भी व्यापक थे। 

5. शिक्षा की व्यापक पाठ्यचर्या 

वैदिक काल मनुष्य के प्राकृतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक तीनों पक्षों के विकास पर बल दिये जाने के कारण, इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु पाठ्यचर्या मे परा (आध्यात्मिक) व अपरा (भौतिक) दोनो प्रकार के विषयों और क्रियाओं को स्थान दिया जाता था। अतः शिक्षा के बहुपक्षीय उद्देश्यों के कारण शिक्षा की पाठ्यचर्या अतिव्यापक थी। 

6. व्यक्ति का सर्वांगीण विकास 

वैदिक कालीन शिक्षा मनुष्य को वास्तविक मानव धर्म, अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान और निदिध्यासन के माध्यम से जीवन की सर्वोच्च उपलब्धियों को प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर जीवन के चरम लक्ष्य 'मुक्ति' हेतु प्रेरित करती है। इस प्रकार यह शिक्षा व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों का विकास करने के साथ उसका सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से भी विकास करती है, जिसमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव होता है।

7. बाहरी नियंत्रण से मुक्त स्वायत्त शिक्षा 

वैदिक कालीन शिक्षा पद्धति किसी प्रकार के समाज, राज्य अथवा बाहरि नियंत्रण स्वीकार नही करती थी। गुरूकुल मे शिक्षा पर आचार्य का पूर्ण उत्तरदायित्व व नियंत्रण होने के कारण यह पूरी तरह स्वायत्त शिक्षा थी, क्योंकि शिक्षा संबंधी समस्त गतिविधियों पर गुरू स्वतंत्र निर्णय ले सकते थे। 

8. विशिष्ट शिक्षा 

उच्च शिक्षा में विशिष्टीकरण का प्रारंभ वैदिक काल से ही हो गया था। प्रारंभिक वैदिक काल मे जहाँ यह विशिष्टीकरण छात्रों की योग्यता के आधार पर होता था, वही उत्तर वैदिक काल मे यह छात्रों के वर्ण के आधार पर होने लगा था। वर्तमान मे भी भारत मे छात्रों को उनकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार विशिष्ट शिक्षा व प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर दिये जाते है। 

9. गुरू शिष्य संबंध 

वैदिक युग मे गुरू व शिष्य का संबंध अत्यंत निकटता व घनिष्ठता का होता था। शिष्य एव गुरू पिता-पुत्र की तरह रहते थे। छात्र गुरू के प्रति बड़ी श्रद्धा व सेवा-भाव रखते थे। गुरू की आज्ञा का पालन करना, सेवा करना, दैनिक कार्य करना तथा आश्रम की व्यवस्था संबंधी कार्यों मे गुरू की सहायता करना छात्रों के प्रमुख कर्तव्य माने जाते थे। 

10. धर्म व सामाजिकता का समन्वय 

वैदिक शिक्षा धर्म व अध्यात्म प्रधान होने के बावजूद इसके पाठ्यक्रम मे अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र, दर्शनशास्त्र, पशुपालन, भूगर्भ विज्ञान, कृषि, चिकित्सा व सैन्य शास्त्र आदि विषय भी सम्मिलित किये गये थे, जिसमें धर्म, अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन से जुड़े कार्यों में समन्वय स्थापित करने के अवसर मिल जाते थे। भिक्षावृत्ति के माध्यम से उन्हें सामाजिक समस्याओं और परिस्थितियों की जानकारी हो जाती थी, जिनके आधार पर वे शुरू से सामाजिकता संबंधित तथ्यों पर विचार-विमर्श करते थे।

वैदिक कालीन शिक्षा के दोष 

प्राचीन  भारत मे जिस शिक्षा प्रणाली का संगठन किया गया, वह कई शताब्दियों तक अति अल्प परिवर्तनों के साथ चलती रही। यह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि इस शिक्षा-प्रणाली में कई महत्वपूर्ण तत्व मौजूद थे। इन तत्वों ने भारतीयों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की तथा कई महान् विचारकों एवं सत्य के अन्वेषकों को जन्म दिया, जिसका बौद्धिक योगदान सभी दृष्टि से सराहनीय है। 

पर जैसा कि डाॅ. अल्तेकर का मत है, लगभग 500 ई. से भारत की प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में दोष प्रकट होने शुरू हो गये। समय की गति के साथ-साथ इन दोषों मे वृद्धि होती चली गई, जिनके कारण यह प्रणाली भारतीयों की आवश्यकताओं को पूरा करने मे असमर्थ हो गई तथा इसका पतन शुरू हो गया। 

वैदिक कालीन शिक्षा के निम्नलिखित दोष व पतन के कारण है-- 

1. लोकभाषाओं की उपेक्षा 

प्राचीन भारतीय शिक्षा मे सिर्फ संस्कृत के अध्ययन तथा अध्यापन पर संपूर्ण ध्यान केंद्रित था। फलतः लोकभाषाओं की उपेक्षा हुई तथा उनकी प्रगति न हो सकी। 

2. धर्म-निरपेक्ष विषयों की उपेक्षा 

प्राचीन भारतीय शिक्षा मे धर्म का आधारभूत स्थान था तथा संपूर्ण शिक्षा उससे संबद्ध थी। फलस्वरूप, धर्म-निरपेक्ष विषयों की बहुत सीमा तक उपेक्षा हुई। अतः उनका पर्याप्त विकास नही हुआ। 

3. शुद्रों की शिक्षा की उपेक्षा 

प्राचीन भारत मे शुद्रों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। अतः प्राचीन भारतीय शिक्षा के द्वारा उनके लिए बंद थे। इस तरह उनकी शिक्षा की न सिर्फ उपेक्षा की गई, बल्कि उनको शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित रखकर उनके प्रति घोर अन्याय किया गया। 

4. जनसाधारण की शिक्षा की उपेक्षा 

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली ने जनसाधारण की शिक्षा की पूरी तरह उपेक्षा की। इस संबंध मे डाॅ. अल्तेकर ने लिखा है," संभवतः संस्कृत पर अपना ध्यान केंद्रित रखने तथा लोकभाषाओं की उपेक्षा करने से हिन्दू शिक्षा-प्रणाली, जनसाधारण की शिक्षा का विकास न कर सकी।"

5. सांसारिक जीवन की उपेक्षा 

शिक्षाशास्त्रियों के विचारानुसार शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को पूर्ण जीवन हेतु तैयार करना है। इसका तात्पर्य यह है कि शिक्षा द्वारा व्यक्ति को लौकिक तथा पारलौकिक-दोनों जीवन के लिए तैयार किया जाना चाहिए। पर जैसा कि डाॅ. एफ. केई ने लिखा है," ब्राह्राणीय शिक्षा मे जीवन के व्यावहारिक कर्तव्यों तथा उसके लिए व्यक्ति को तैयार करने के प्रति घृणा की प्रवृत्ति थी।" 

इस प्रवृत्ति का परिणाम यह हुआ कि लौकिक पक्ष की उपेक्षा करके आध्यात्मिक पक्ष को महत्व यह दिया गया। फलस्वरूप, प्राचीन युग के व्यक्ति संसार तथा सांसारिक जीवन को असार मानने लगे एवं उनके प्रति उदासीन हो गये। अतः इस युग मे व्यक्तियों की लौकिक प्रगति का मार्ग बहुत सीमा तक अवरुद्ध हो गया। 

6. विचार-स्वातंत्र्य का अभाव 

प्राचीन भारतीय शिक्षा मे धर्म को बहुत महत्व दिये जाने के कारण व्यक्तियों मे यह प्रवृत्ति पैदा हो गई कि धर्मशास्त्रों मे लिखी हुई सब बातें पूर्णतया सत्य है तथा उन्होंने जिन बातों को असत्य बताया है, वे कदापि सत्य नही हो सकती है। इस प्रवृत्ति के कारण भारतीय समाज में कई अंधविश्वासों तथा रूढ़िवादिताओं का प्रवेश हुआ। 

7. हस्तकार्य तथा शारीरिक श्रम के प्रति घृणा 

प्राचीन भारतीय शिक्षा मे धार्मिक शिक्षा की तुलना में लौकिक शिक्षा का स्थान बहुत निन्म था। फलस्वरूप, अध्ययन-केन्द्रों मे लौकिक शिक्षा से संबंधित हस्तकार्यों की शिक्षा को कोई स्थान प्राप्त नही हुआ। अतः उच्च वर्गों के छात्रों का, जो इन अध्ययन केन्द्रों मे शिक्षा ग्रहण करते थे, इन कार्यों से कोई संपर्क नही हुआ। ये कार्य निम्न वर्गों तक ही सीमित रहे, जिनको इनकी शिक्षा अपने परिवारों मे प्राप्त होती थी। इन वर्गों के व्यक्तियों को हेय समझा जाता था। अतः उनके द्वारा किये जाने वाले हस्यकार्यों तथा शारीरिक श्रम को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा। 

8. धर्म को अधिक महत्व 

प्राचीन भारतीय शिक्षा मे धर्म को बहुत महत्व दिया जाता था। शिक्षा की संपूर्ण संरचना धार्मिक आदर्शों से निमज्जित थी। इन्हीं आदर्शों के अनुसार, शिक्षा के विषयों, उद्देश्यों तथा पाठ्यक्रमों को निर्धारित किया गया था। छात्रों के समय का अधिकांश भाग धर्म-शास्त्रों के अध्ययन तथा कर्मकांडों के संपादन में व्यतीत होता था। उनको निष्काम कर्म करने तथा अपनी इच्छाओं का दमन करने का उपदेश दिया जाता था।

9. नवीन धर्मों का आविर्भाव 

डाॅ. एन. एन. मुखर्जी का विचार है-- लगभग पाँचवीं शताब्दी के अंत तक शिक्षा अधिकांश रूप में ब्राह्मणों तक सीमित रह गई थी तथा शिक्षा के व्यवसाय पर उनका एकमात्र अधिकार था। इस अधिकार को बनाये रखने हेतु उन्होंने धर्म का सहारा लिया तथा उसमें जटिलता को कूट-कूट कर भर दिया। इस जटिलता के कारण धार्मिक कृत्यों तथा ब्राह्मणों द्वारा उनमें प्रयोग की जाने वाली संस्कृत भाषा का जनसाधारण हेतु कोई महत्व नही रह गया। वैदिक धर्म के प्रति जनसाधारण के इसी परिवर्तित दृष्टिकोण के कारण दो नवीन धर्मों का आविर्भाव हुआ-- बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म। 

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा मे कई गंभीर दोष थे, जिनके कारण वह कालांतर में समयानुकूल न रह गई तथा उसका ह्रास आरंभ हो गया।

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