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8/18/2021

मध्यकालीन मुस्लिम शिक्षा की विशेषताएं

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मध्यकालीन शिक्षा या मुस्लिम शिक्षा 

madhyakalin shiksha ki visheshtayen;इस्लाम धर्म की स्थापना हजरज मोहम्मद साहब ने की थी। इस धर्म को मानने वालों को मुसलमान कहा जाने लगा। इतिहासकारों ने 1200 से 1700 ईसवीं तक के काल को मध्यकाल अथवा मुस्लिम काल की संज्ञा दी है। 

मुस्लिम शिक्षा का अर्थ ज्ञानार्जन करना था। इस ज्ञान के अंतर्गत कुरान शरीफ की आयतों तथा हजरत मुहम्मद के उपदेशों का ज्ञान जनता तक पहुँचाना तथा मकतबों और मदरसों के माध्यम से इसका अधिक से अधिक प्रसार करना ही शिक्षा का मुख्य अर्थ लिया जाता था। इस प्रकार सामान्य जीवन से संबंधित धार्मिक व लौकिक ज्ञान के अध्ययन को ही मुस्लिम शिक्षा कहा जाता था। 

भारत की अतुलित धन संपदा से प्रेरित होकर, मुसलमानों ने भारत पर आठवीं शताब्दी मे अपने आक्रमण प्रारंभ कर दिये, किन्तु उनके आक्रमणों का असली तूफान महमूद गजनी के समय मे आरंभ हुआ, जिसने सन् 1000 से 1026 ई. तक भारत पर लगभग 17 बार आक्रमण किये। उसके आक्रमणों का मुख्य ध्यये, भारत की संपत्ति को लूटकर गजनी को वैभवशाली बनाना था, न कि यहाँ मुस्लिम शासन की स्थापना करना। अतः वह हर बार आक्रमण के बाद लूट का माल लेकर स्वदेश को लौट जाता था। 

इसके बाद 12 वीं शताब्दी मे मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया और पृथ्वीराज को पराजित कर यहाँ मुस्लिम सामाज्य की नींव डाली। उसकी मृत्यु के बाद भारत पर क्रमशः गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी और मुगल वंश ने सन् 1757 ई. तक शासन किया। 1192 ई. से औरंगजेब की मृत्‍यु तक (1797 ई. तक) प्रायः पूरे भारत के अधिकांश हिस्सों पर मुसलमानों का ही शासन रहा।  ये मुस्लिम शासक भारत में अपनी संस्कृति और अपना धर्म लेकर आए थे। इन्होंने भारत शासन करने के साथ-साथ यहाँ अपनी संस्कृति और धर्म का प्रचार एवं प्रसार भी किया। 

लगभग 550 वर्ष तक भारत पर मुसलमानों का आधिपत्य रहा। मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों ने भारत की विश्व प्रसिद्ध वैदिक और बौद्ध शिक्षा प्रणालियों को ध्वस्त करके एक नवीन शिक्षा-प्रणाली का सूत्रपात किया, जिसे 'मध्यकालीन मुस्लिम शिक्षा-प्रणाली' कहा जा सकता है। इस काल में धार्मिक शिक्षा के अलावा कला, संगीत, भूमि-व्यवस्था, न्याय तथा शासन-प्रबन्ध आदि में विशेष प्रगति हुई। अनेक प्रसिद्ध भवनों का निर्माण भी इसी काल में हुआ, जिनमें से आगरा का ताजमहल व लाल किला, दिल्ली की जमा मस्जिद व लाल किला तथा कुतुबमीनार आदि प्रसिद्ध है। मुस्लिम शिक्षा प्रणाली के विषय मे अपना मत व्यक्त करते हुए डाॅ. एफ. ई. केई ने लिखा है," मुस्लिम शिक्षा एई विदेशी प्रणाली थी, जिसका भारत में प्रतिरोपण किया गया और ब्राह्राणीय शिक्षा से अति अल्प संबंध रखकर अपनी नवीन भूमि में विकसित हुई।"

मध्यकालीन मुस्लिम शिक्षा की विशेषताएं (muslim shiksha ki visheshta)

जैसा की पूर्व मे हमने पढ़ा कि मुस्लिम शासक भारत मे अपनी संस्कृति और अपना धर्म लेकर आए थे। इन्होंने भारत पर शासन करने के साथ-साथ यहाँ अपनी संस्कृति और धर्म का प्रचार एवं प्रसार भी किया। अपनी संस्कृति और धर्म का प्रचार करने लिए इन्होंने शिक्षा का सहारा लिया। इन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, 'उसे मुस्लिम शिक्षा प्रणाली' के नाम से जाना जाता है। मुसलमानों की यह नवीन शिक्षा-प्रणाली इस देश मे लगभग 600 वर्ष तक प्रचलित रही और मकतबों के रूप मे इसके अवशेष आज भी यत्र-तत्र दिखाई देते है। इस शिक्षा-प्रणाली मे कुछ ऐसी विशेषताएं थी, जिन्होंने भयंकर विप्लवों और राजनीतिक संघर्षों के मध्य भी इसकों जीवित रखा। मध्यकालीन शिक्षा या मुस्लिम शिक्षा की विशेषताएं निम्नलिखित है-- 

1. विस्मिल्लाह रस्म 

मुस्लिम शिक्षा विस्मिल्लाह रस्म से शुरू होती थी। ये विस्मिल्लाह रस्म वैदिक काल के उपनयन संस्कार तथा बौद्ध काल के पवज्जा संस्कार से मिलजी-जुलती थी। इसमे बालक को नये कपड़े पहनाकर मौलवी के पास ले जाया जाता था। बालक को यहाँ पर मौलवी के द्वारा उच्चारित कुरान की कुछ आयतों को दुहराना पड़ता था। यदि बालक उन आयतों को दुहराने मे असमर्थ रहता था, तब विस्मिल्लाह शब्द कहना ही पर्याप्त माना जाता था। इसके बाद बालक की प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ हो जाती थी, तथा मौलवी को कुछ नजराना देकर बालक को मकतब मे प्रवेश दे दिया जाता था। 

2. निः शुल्क शिक्षा 

मकतबों तथा मदरसों मे निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था थी। शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से किसी भी प्रकार का शुल्क नही लिया जाता था। शिक्षा-संस्थाओं के संपूर्ण खर्च का भार इनको स्थापित करने एवं संचालित करने वाले शासको या धनी व्यक्तियों द्वारा उठाया जाता था। 

3. कक्षा-नायकीय पद्धित 

इन शिक्षा-संस्थाओं में कक्षा-नायकीय पद्धित का प्रचलन था। इस पद्धित मे उच्च कक्षाओं के योग्य छात्रों को नायक बनाया जाता था जो निम्न कक्षा के छात्रों का शिक्षण कर, अध्यायक के अध्यापन कार्य में सहायता देते थे। 

4. व्यावहारिक शिक्षा 

मुस्लिम लोगों का परलोक एवं पुनर्जन्म मे कोई विश्वास नही थी इसलिए ये शिक्षा को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष प्राप्ति का साधन नही मानते थे। इनका विश्वास था कि जीवन इसी संसार मे है और इस कारण शिक्षा द्वारा व्यक्ति को इस जीवन हेतु तैयार किया जाना चाहिए। इसी विचार से प्रेरित होकर इन्होंने शिक्षा को व्यावहारिक रूप प्रदान किया। 

5. शिक्षा का संरक्षण 

संपूर्ण मुस्लिम काल मे शिक्षा को राज्य का संरक्षण प्राप्त था, यह तथ्य निर्विवाद है। इसके साथ ही यह कथन भी विवाद से दूर है कि लगभग सभी मुस्लिम शासकों ने तकतबों एवं मदरसों की स्थापना करके, शिक्षा के प्रति अपने प्रेम तथा उदारता का परिचय दिया। 

6. शिक्षा का भाषा माध्यम 

मुस्लिम का मे शिक्षा का माध्यम अरबी-फारसी भाषायें थी। फारसी भाषा राज भाषा होने के कारण सरकारी नौकरी पाने का साधन थी तथा इसी भाषा के ज्ञान द्वारा व्यक्ति को राजपद मिल सकता था। यही कारण था कि कुछ हिन्दू भी फारसी भाषा सीखने लगे थे। अकबर ने हिन्दी को तथा औरंगजेब ने उर्दू को प्रोत्साहन दिया, फिर भी अरबी और फारसी भाषा का महत्व भाषा के माध्यम के रूप मे बना रहा। संस्कृत व पाली आदि भाषाओं के लिए मुस्लिम शिक्षा मे कोई स्थान नही था।

7. शिक्षक की स्थिति 

शिक्षा के प्रति लौकिक दृष्टिकोण के कारण, मुस्लिम युग में शिक्षक की स्थिति मे बहुत परिवर्तन हो गया था। इन शिक्षकों की स्थिति, प्राचीन भारतीय शिक्षकों के समान उच्च नही थी। 

8. शिक्षण पद्धित 

मुस्लिम काल मे शिक्षण की पद्धित मुख्य रूप से मौखिक थी, रटने एवं स्मरण पर बल दिया जाता था। व्याख्यान, प्रश्नोत्तर तथा वाद-विवाद विधियों का प्रयोग किया जाता था। विद्यार्थियों को स्वाध्याय विधि से ज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता था। शिक्षक की उपस्थिति मे बड़ी कक्षाओं के कुशल तथा योग्य विद्यार्थी छोटी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने का कार्य करते थे। राजदरबारों मे महत्वपूर्ण विषयों पर शास्त्रर्थ भी कराया जाता था। 

7. धार्मिक लौकिक शिक्षा का समन्वय 

धार्मिक एवं लौकिक शिक्षा का समन्वय मुस्लिम शिक्षा की एक मुख्य विशेषता थी। इस शिक्षा पद्धित मे प्राथमिक स्तर पर बालकों को कुरान की आयतें कंठस्थ कराने के साथ-साथ उन्हें अंकगणित, पत्र-लेखन कला तथा अन्य जीवनोपयोगी विषयों का अध्ययन कराया जाता था। उच्च स्तर पर कुरान के नियमित अध्ययन कराने के साथ उन्हें इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र इत्यादि विषयों का अध्ययन कराया जाता था।

8. धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा 

मुस्लिम शिक्षा प्रणाली मे धर्म के नाम पर इस्लाम धर्म की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाती थी और नैतिकता के नाम पर शरीयत (इस्लामिक नियम व कानून) की शिक्षा दी जाती थी। यह धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा का संकुचित रूप था। 

9. व्यक्तिगत संपर्क 

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धित की तरह ही मुस्लिम शिक्षा पद्धित मे भी गुरू शिष्य का व्यक्तिगत संपर्क था। शिक्षक के विचारों और आदर्शों से प्रभावित होकर, छात्र भी स्वयं की प्रतिभा, कुशलता व योग्यता मे वृद्धि करने मे संलग्न रहते थे। टी. एन. सिक्वेरा के अनुसार," शिक्षा को व्यक्तिगत प्रक्रिया माना जाता था। शिक्षक को अपने छात्रों के साथ रहना पड़ता था।" 

10. गुरू-शिष्य संबंध

मुस्लिम काल मे गुरू तथा शिष्यों के संबंध अधिक घनिष्ठ थे। शिक्षकों को समाज मे बहुत अधिक सम्मानीय स्थान दिया जाता था। शिक्षकों को वेतन बहुत कम मिलता था फिर भी उन्हें सभी स्थानों पर अत्यधिक सम्मान मिलता था। विद्यार्थी गुरू के आदेशों का पालन करके अनुशासित, विनम्र तथा सहनशील बन जाते थे और गुरू-विद्यार्थियों मे श्रद्धा पाकर पूजनीय बन जाता था। 

11. अनुशासन 

माध्यमिक कालीन शिक्षा व्यवस्था मे अनुशासन को बहुत अधिक महत्व दिया जाता था। मकतबों और मदरसों दोनों ही स्तरों पर ग्रहण करने की अवधि मे छात्रों को मुस्लिम शिक्षा प्रणाली के नियमों, रीति-रिवाजों, आदेशों, परम्पराओं और मुस्लिम कानूनों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होता था। इन सभी नियमों और पद्धितियों को शिक्षक के आदेशों व निर्देशों के माध्यम से छात्रों तक संप्रेषित किया जाता था। अतः सामान्यतया शिक्षकों की आज्ञा व आदेशों का पालन करना ही अनुशासन के अंतर्गत आता था। जो छात्र इन आदेशों व नियमों आदि का पालन नही करते थे, उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था। चूँकि उस समय तक मनोवैज्ञानिक शिक्षण व्यवस्था का प्रचलन नही था, इसलिए दमनात्मक शासन (Repressionistic Discipline) द्वारा ही छात्रों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता था। 

12. शिक्षा की अनिवार्यता 

मुसलमानों द्वारा शिक्षा को व्यक्ति के जीवन हेतु तीन मुख्य कारकों से जरूरी माना जाता है। 

पहला, कुरान शरीफ में ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य बताया गया है।

दूसरा, मुसलमानों द्वारा मुहम्मद साहब के इस कथन मे विश्वास किया जाता है," जो छात्र, ज्ञान की खोज करता है, उसे ईश्वर-स्वर्ग मे उच्च स्थान प्रदान करता है।"

तीसरा इस्लाम धर्म मे कहा गया है," जो मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है, वह धार्मिक कार्य करता है, जो ज्ञान की बात करता है, वह ईश्वर की प्रशंसा करता है, जो ज्ञान की खोज करता है, वह ईश्वर की उपासना करता है।" 

इस तरह की धार्मिक पृष्ठभूमि मे शिक्षा को व्यक्ति हेतु अनिवार्य समझा गया। यही कारण था कि सभी मुस्लिम शासकों तथा ज्ञान-प्रेमी व्यक्तियों ने मकतबों एवं मदरसों की स्थापना करके तथा उनमें निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करके जनसाधारण हेतु शिक्षा को अधिक-से-अधिक सुलभ बनाने का प्रयास किया। 

13. सांस्कृतिक एकता की अभिवृद्धि 

मुस्लिम शासकों के आरंभ मकतबों तथा मदरसों मे प्रदान की जाने वाली शिक्षा सिर्फ मुसलमानों तक ही सीमित थी तथा उनमें हिन्दुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था। सिकंदर लोदी के समय से यह प्रतिबंध हटा दिया गया था। फलस्वरूप, सभी जातियों के हिन्दू-मकतबों तथा मदरसों में प्रवेश करके, मुसलमानों के साथ शिक्षा ग्रहण करने लगे थे। 

इस तरह मुस्लशिक्षा-संस्थाओं ने सभी जातियों के हिन्दुओं तथा मुसलमानों में पारस्परिक संपर्क स्थापित किया, जिसके दो सुंदर परिणाम दृष्टिगोचर हुए-जातीय बंधनों की समाप्ति तथा सांस्कृतिक एकता की अभिवृद्धि। 

14. भाषा तथा विज्ञानों को प्रोत्साहन 

मुस्लिम युग मे फारसी भाषा तथा विज्ञानों को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया जाता था। इसका कारण यह था कि फारसी सभी मुस्लिम शासकों की राजभाषी थी। अतः इस भाषा के विद्वानों को राजपदों हेतु बहुत माँग थी। इसी तरह विज्ञानवेत्ताओं की भी मांग थी। 

उक्त दोनों माँगों को पूरा करने के लिए मुस्लिम काल मे फारसी भाषा तथा विज्ञानों की शिक्षा का प्रधान लक्ष्य निर्धारित किया गया। 

15. साहित्य तथा इतिहास का विकास 

मुस्लिम काल मे साहित्य तथा इतिहास का पर्याप्त विकास हुआ। कई मुस्लिम शासक, विद्या के प्रेमी तथा विद्वानों के संरक्षक थे। संरक्षण-प्राप्त विद्वानों का आर्थिक चिंता से मुक्त होना तथा इसके कारण उनके द्वारा साहित्य सृजन के प्रति ध्यान दिया जाना स्वाभाविक था। यही कारण था कि मुस्लिम युग मे नीति, दर्शन आदि विषयों पर साहित्य का निर्माण हुआ तथा रामायण, महाभारत आदि हिन्दू ग्रंथों का फारसी अनुवाद किया गया।

मुस्लिम शिक्षा प्रदान करने वाली प्रमुख संस्थाएं 

मुस्लिम काल मे शिक्षा प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य कई अभिकरणों ने किया था। इन्हें मुख्य रूप से दो वर्गों मे विभाजित किया जा सकता है-- 

(अ) प्राथमिक शिक्षा से संबंधित, 

(ब) उच्च शिक्षा से संबंधित।

पर कुछ ऐसी भी अभिकरण थे जो प्राथमिक तथा उच्च दोनों ही शिक्षाओं से संबंधित ये। इस तरह के प्रमुख शिक्षा अभिकरण निम्न प्रकार है-- 

1. मकतब 

'मकतब' की व्युत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द 'कुतुब' से हुई है, जिसका अभिप्राय है 'उसने लिखा' अगर उर्दु भाषा मे देखें तो इसके समकक्ष शब्द 'कुतुब', किताब के बहुवचन के रूप मे प्रयोग मे लाया जाता है। 

वास्तव में शाब्दिक अर्थ के आधार पर मकतब का अर्थ ऐसे स्थान के संदर्भ मे स्वीकार कर लिया जाता है, जहाँ पठन-पाठन का कार्य किया जाता है। इस तरह मकतब वे संस्थाएं थी जो कि प्राथमिक स्तर पर छात्रों को शिक्षा प्रदान करती थी। ये मकतब व्यक्तिगत स्तर पर अथवा नजदीक किसी मस्जिद के अंदर बुलाये जाते थे। ये मकतब मुसलमान एवं हिन्दू-दोनों ही बालकों को शिक्षा प्रदान करने के लिए खोले गये थे। पर मकतब एक सार्वजनिक संस्था का स्वरूप नही ग्रहण कर पाये थे। इस कारण इनकी संख्या कम ही हुआ करती थी। 

डाॅ. युसुफ हुसैन ने मकतबों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है," मकतब एक शिक्षक वाली व्यक्तिगत संस्थाएं थी जहाँ पर प्रातःकाल से सायंकाल तक शिक्षण कार्यक्रम अनवरत गति से चलता रहता था। ये संस्थाएं निःशुल्क थी। सिर्फ धनवान लोग ही इन संस्थाओं को उदार रूप से दान देते थे। इन मकतबों द्वारा प्रदान की गयी शिक्षा तात्कालिक शासन व्यवस्था से मुक्त थी।" 

2. खानक्वाहें 

'खानक्वाह' भी प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने वाले अभिकरण थे। ये भी व्यक्तिगत प्रयत्नों से संचालित किये जाते थे। सिर्फ मुस्लिम छात्र ही इन स्कूलों मे शिक्षा प्राप्त करने के हकदार थे। इनकी वित्त व्यवस्था उदार दान से की जाती थी। 

3. दरगाह 

'दरगाह' वास्तविक रूप से तो वे स्थान थे, जो किसी पीर, पैगंबर की समाधि अथवा सम्मान मे स्थापित किये गए थे। मुस्लिम काल में ज्यों ही शिक्षा का प्रादुर्भाव हुआ कुछ मौलवियों ने इन स्थानों पर धार्मिक शिक्षा प्रदान करना प्रारंभ कर दिया। इस तरह ये खानक्वाहों से मिलते थे एवं सिर्फ मुस्लिम छात्रों को अध्ययन के लिए प्रवेश प्रदान करते थे।

4. मदरसे 

'मदरसा' शब्द अरबी भाषा के मूल 'दरस' से प्राप्त हुआ है, जिसका अर्थ होता है 'भाषण'। इस तरह इसकी व्युत्पत्ति से जो अर्थ निकलता है वह है एक ऐसा स्थान जहाँ भाषणों का प्रयोग किया जाता है अर्थात् भाषणो द्वारा शिक्षा प्रदान करने वाला स्थान ही मदरसा कहा जाता है। एक तथ्य और भी इससे उजागर होता है कि मदससा, शिक्षा के उच्चतम केन्द्र थे, क्योंकि किशोर तथा युवकों को ही भाषण विधि द्वारा शिक्षा प्रदान की जा सकती है। 

मदरसा सामान्य रूप से किसी मस्जिद से संबद्ध रहते थे।  इनके लिए बादशाह तथा संपन्न लोग जरूरी दान देते थे। मदसरे मे प्रदान की जाने वाली शिक्षा दीर्घकालिक होती थी एवं शिक्षा के पाठ्यक्रम भी व्यापक होते थे। इन सभी विषयों के योग्य शिक्षकों को मदरसे में शिक्षण के लिए नियुक्त किया जाता था। 

साधारणतया मदरसे आवासीय प्रकृति के होते थे। छात्रों हेतु छात्रवृत्ति एवं अन्य तरह की मदद का भी प्रावधान था। यह छात्र-शिक्षको के बीच लगातार अंतःक्रियाओं के लिए सुअवसर प्रदान करते थे। 

5. अरबी-फारसी के स्कूल 

मुस्लिम शिक्षा मे अरबी-फारसी का उत्कृष्ट स्थान प्रदान किया गया था। इन भाषाओं की वृद्धि तथा विकास के लिए व्यक्तिगत तथा शासकीय स्तर पर अनेकों प्रयत्न किये जाते रहे थे। इन प्रयासों की पूर्ति के लिए इन भाषिक स्कूलों की स्थापना की गयी थी। इसके अलावा फारसी मूलरूप से राज-काज की भाषा होने से शासन को भी सुयोग्य भाषाविदों को लगातार जरूरत बनी रहती थी। 

इन विद्यालयों मे दोनों भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य की शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ सुंदर लेकन शैलियों पर बहुत परिश्रम किया जाता था, क्योंकि जितने भी क्रिया-कलाप किये जाते थे वे सभी हस्तलिखित ही होते थे।

साथ ही छात्रों को 'कुरान'  मे निष्णात किया जाता था। कुरान की आयतें कंठस्थ करायी तथा लिखायी जाती थी। इनमें से ही कुछ धर्मोंपचारक, धर्मोपदेशक एवं अन्य धार्मिक क्रियाओं को समाज मे रहते हुए संपन्न कराने योग्य बनाये थे। 

6. कुरान स्कूल 

हालांकि उपयुक्त विद्यालयों मे भी 'कुरान' को धर्मग्रंथ की तरह अध्ययन-अध्यापन कराया जाता था, पर कुछ मौलवीयों ने मस्जिदों के भीतर पृथक रूप से कुरान विद्यालयों की स्थापना की थी। इनका अंतिम लक्ष्य था कुरान के आदेशों का प्रचार-प्रसार करना। 

इन स्कूलों मे छात्रों को अरबी का कठिन अभ्यास कराने के बाद उन्हें कुरान की आयतों को कंठस्थ करा दिया जाता था, जिससे वे स्वतंत्र रूप से धर्मोपदेशक के रूप में कार्य कर सकें।

यह भी पढ़े; मध्यकालीन मुस्लिम शिक्षा के उद्देश्य, गुण, दोष

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