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8/16/2021

बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएं

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बौद्ध कालीन शिक्षा 

वैदिक काल के उपरान्त बौद्ध काल का उद्भव हुआ। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के नास्तिक सम्प्रदाय के आचार्यों मे महात्मा गौतम बुद्ध का नाम सबसे प्रमुख है। उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रवर्तन किया जो कालान्तर मे एक अन्तर्राष्ट्रीय धर्म बन गया। ईसी की छवी शताब्दी विश्व मे जागृति के युग के नाम से प्रसिद्ध है। इसी समय भारत मे दो धर्मो ने जन्म लिया बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म। महात्मा बुद्ध ने समसामयिक परिस्थितियों के अनुकूल सरल, सुबोध बौद्ध धर्म की स्थापना की। वैदिक काल के बाद ब्राह्मण काल आने तक धर्म का स्वरूप काफी विकृत हो चुका था। सामाजिक वर्ग व्यवस्था कठिन संत्रास काल से गुजर रही थी। धर्म 'कर्मकांड'  का पर्याय बन चुका था। शिक्षा विशेष वर्ग के लिए सीमित कर दी गई थी। ऐसे समय मे इन धर्मों की उत्पत्ति को इतिहासकार एक धार्मिक-सामाजिक एवं शैक्षिक प्रतिक्रिया का प्रतिफल मानते है। 

प्रारंभ मे बौद्ध शिक्षा सिर्फ बुद्ध अनुयायियों के लिए ही प्रदान की जाती थी, पर धीर-धीर इसमे सभी लोग शामिल होने लगे। इस तरह तात्कालिक शिक्षा के स्त्रोत बौद्ध मठ एवं अन्य बौद्ध मंदिर आदि बन चुके थे। बौद्ध धर्म सामाजिक संकीर्णताओं से परे प्रत्येक प्राणी मात्र के कल्याण के लिए व्यावहारिक धर्म का पालन करने के लिए बल देता है। बौद्ध धर्म मे मानव मुक्ति हेतु 'अष्ट मार्ग' की स्थापना की गई है, जो कि हर मानव के सुंदर आचरण की व्यावहारिक रूपरेखा प्रस्तुत करता है। 

डाॅ. एफ. ई. केई के अनुसार," बौद्ध शिक्षा पंद्रह सौ वर्ष से अधिक प्रचलित रही और उसने ऐसी शिक्षा पद्धति का विकास किया जो ब्राह्राणीय शिक्षा पद्धति की प्रतिद्वन्दी थी परन्तु अनेक बातों मे इसके सदृश थी।"

हालांकि बौद्ध शिक्षा अपने मे एक अनूठी योजना थी जो कि पूर्व प्रचलित वैदिक शिक्षा से पूर्ण भिन्न थी। पर गौर से देखने पर ज्ञात होता है कि यह वैदिक शिक्षा का ही एक परिवर्तित तथा परिवर्द्धिय स्वरूप मात्र है। 

डाॅ. राधाकृष्णन के अनुसार," भगवान बुद्ध ने वैदिक धर्म मे कुछ सुधार किए। वे धर्म को पूरा करने लिए आये थे न कि उसे नष्ट करने के लिए। भारत मे भगवान बुद्ध धार्मिक परम्पराओं के अनुपम प्रतिनिधि है। उन्होंने भारत की भूमि पर अपने पद-चिन्ह एवं देश की आत्मा, आदत एवं विश्वाओं पर अपना प्रभाव छोड़ा। उनकी शिक्षाएं हमारी संस्कृति का अंग बन गई इसलिए एक दृष्टि से भगवान बुद्ध वर्तमान हिन्दू धर्म के निर्माता थे।" 

बौद्ध काल मे न केवल भारत बल्कि तिब्बत, जावा, जापान के छात्रों द्वारा भारत मे शिक्षा प्राप्त की जाने लगी। इससे भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति ऊँची उठी।

बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएं 

बौद्ध काल मे बौद्ध भिक्षुओं द्वारा एक नई शिक्षा प्रणाली का विकास किया गया जिसे बौद्ध शिक्षा प्रणाली कहा जाता है। बौद्ध कालीन शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएं है-- 

1. पब्बज्जा संस्कार 

'पब्बज्जा' का शाब्दिक अर्थ है-- 'बाहर जाना'। इस संस्कार का तात्पर्य है कि बालक अपने परिवार तथा पहले की स्थिति का त्याग करके, संघ मे प्रवेश करता था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस संस्कार का संबंध सिर्फ उन व्यक्तियों से था, जिनके जीवन का उद्देश्य बौद्ध भिक्षु बनना था। यह संस्कार 8 वर्ष की आयु से पहले संपन्न नही हो सकता था। 

'वियन पिटक' में 'पब्बज्जा संस्कार' का वर्णन इस तरह किया गया है," बालक अपने सिर के बाल मुँड़ाता था, पीले वस्त्र धारण करता था, प्रवेश करने वाले मठ के भिक्षुओं के चरणों को अपने मस्तक से स्पर्श करता था तथा उनके सामने पालती मारकर भूमि पर बैठ जाता था। तदुपरांत, मठ का सबसे बड़ा भिक्षु उससे तीन बार यह शपथ लेने को कहता था-- "बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि।" 

जब बालक यह शपथ ले लेता था, तब भिक्षु उसको अग्रांकित 10 आदेश देता था-- 

1. चोरी नही करना, 

2. किसी जीव की हत्या नही करना, 

3. असत्य (झुठा) भाषण मत करना, 

4. अशुद्ध आचरण नही करना, 

5. वर्जित समय पर आहार नही करना, 

6. मादक (नशीली) वस्तुओं का प्रयोग नही करना,

7. श्रंगार की वस्तुओं का प्रयोग नही करना, 

8. बगैर दिये हुए किसी वस्तु को ग्रहण नही करना, 

9. सोना, चाँदी तथा बहुमूल्य वस्तुओं का दान नही लेना, 

10. नृत्य, संगीत, तमाशे आदि के पास जाने का प्रयत्न नही करना। 

इन आदर्शों के बाद बालक 'नव-शिष्य', 'श्रमण' या 'सामनेर' कहा जाता था तथा अपने द्वारा चुने जाने वाले भिक्षु से 12 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करता था। 

2. उपसंपदा संस्कार 

नवशिष्य के रूप में 12 वर्ष की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात छात्र हेतु मठ को छोड़ना अनिवार्य था। लेकिन वह उपसंपदा संस्कार संपादित करने पूर्ण भिक्षु की स्थिति प्राप्त कर सकता था तथा बौद्ध-संघ का स्थायी सदस्य बन सकता था। 

'उपसंपदा संस्कार'-- बौद्ध-संघ के कम-से-कम 10 भिक्षुओं की उपस्थित मे होता था। उसमें नवशिष्य का आचार्य भी होता था। वह अन्य भिक्षुओं को नवशिष्य का परिचय देता था। तत्पश्चात भिक्षु-नवशिष्य से कई तरह के प्रश्न पूछते थे। उसके उत्तरों को सुनने के बाद वे बहुमत से यह निर्णय करते थे कि नवशिष्य को 'उपसंपदा' ग्रहण करने का अधिकार है अथवा नही। इस तरह का निर्णय यह सिद्ध करता है कि 'उपसंपदा संस्कार' मे जनतंत्रीय प्रणाली का प्रयोग किया जाता था।

टिप्पणी

बालकों तथा पुरूषों के समान बालिकाओं एवं स्त्रियों को भी 'पब्बज्जा' तथा 'उपसंपदा' का अधिकार प्राप्त था। 

3. विद्यार्थीत्व 

बौद्ध-शिक्षा के द्वारा सभी धर्मों, वर्गों तथा जातियों के व्यक्तियों के लिए खुले हुए थे। सिर्फ चांडालों को इस शिक्षा से वंचित रखा गया था। छात्रों में राजाओं व्यापारियों, दर्जियों तथा मछली पकड़ने वालों के पुत्र थे। इनमें ज्यादातर संख्या-ब्राह्राण तथा क्षत्रिय जातियों के छात्रों की थी। 

4. विद्यार्थियों का चुनाव 

सिद्धांत रूप में, शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों को प्राप्त था। पर अग्रांकित 10 वर्गों के किसी व्यक्ति का विद्यार्थित्व हेतु चुनाव नही किया जाता था-- 

1. जो नपुंसक हो। 

2. जो दास अथवा ॠणी हो।

3. जो राजा की नौकरी में हो। 

4. जो डाकू घोषित किया गया हो। 

5. जो कारावास से भाग आया हो। 

6. जिसका कोई अंग भंग हो।

7. जिसके शरीर का कोई भाग विकृत हो। 

8. जिसको राज्य से कोई दण्ड मिला हो। 

9. जिसने अपने माता-पिता की आज्ञा प्राप्त न की हो। 

10. जिसको क्षय, कोढ़, खुजली आदि कोई छूत का रोग हो। 

5. शिक्षा शुरू करने की आयु 

डाॅ. ए. एस. अल्तेकर के अनुसार शिक्षा शुरू करने की न्यूनतम आयु 8 वर्ष की थी। यह आयु उन्ही बालकों हेतु निर्धारित की गई थी, जो संघ में प्रवेश करने का निश्चय कर लेते थे। संघ मे प्रवेश करने वाला बालक उसके किसी भिक्षु को अपने शिक्षक के रूप मे चुनता था। 

6. अध्ययन की अवधि 

'पब्बज्जा' के पश्चात अध्ययन की अवधि 12 वर्ष की तथा 'उपसंपदा' की 10 वर्ष की थी। 'पब्बज्जा संस्कार' 8 वर्ष की आयु में होता था। इस तरह शिक्षा की पूर्ण अवधि 30 वर्ष थी। 

7. शिक्षण विधियाँ 

बौद्ध का मे प्रमुख शिक्षण विधियों मे अनुकरण विधि, व्याख्यान विधि, वाद-विवाद विधि, तर्क विधि, प्रश्नोत्तर विधि, स्वाध्याय विधि, प्रदर्शन विधि, अभ्यास विधि, सम्मेलन एवं शास्त्रार्थ विधि प्रमुख थी। 

8. पाठ्यक्रम 

बौद्ध काल के पाठ्यक्रम मे संस्कृत, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष, गणित, न्यान आदि मुख्य विषय थे। इसके अतिरिक्त सैनिक शिक्षा, धनुर्विद्या, कला-कौशल आदि की शिक्षा का भी प्रबंध था। 

9. शिक्षा का माध्यम 

बौद्ध कालीन शिक्षा प्रणाली मे लोकभाषा 'पाली' के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती थी।

10. शिक्षा का प्रजातन्त्री आधार

महात्मा गौतम बुद्ध के आह्रवान पर बौद्धों ने शिक्षा को जनतन्त्रीय आधार प्रदान किया। बौद्ध शिक्षा केंद्र विभिन्न वर्गों, विभिन्न जातियों और विभिन्न प्रान्तों के सभी बालकों के साथ बिना किसी भेदभाव के पारिवारिक संपर्क स्थापित करते थे और उन्हें ज्ञान प्रदान करते थे। 

11. लोकभाषाओं को प्रोत्साहन 

बौद्ध काल मे महात्मा बुद्ध ने शिक्षा प्रदान करने के लिए लोकभाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कहा। उनके अनुसार भिक्षुओं को उनकी स्वयं की भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए।

डाॅ. आर. के. मुकर्जी ने लिखा है," बौद्ध धर्म ने देश की लोकभाषाओं को प्रोत्साहन प्रदान किया और बौद्ध शिक्षा संस्थाओं मे संस्कृत के बजाय लोकभाषाओं ने शिक्षा के माध्यम का स्थान ग्रहण किया।" 

12. सार्वजनिक प्रारंभिक शिक्षा 

बौद्ध काल मे शिक्षा को जनशिक्षा का रूप देने के लिए सार्वजनिक प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की गई। सभी वर्णों के बालकों को यह शिक्षा दी जाती थी। 

13. खेलकूद व शारीरिक व्यायाम 

बौद्ध काल में केवल छात्रों के मानसिक और नैतिक विकास को ही नही, बल्कि उनके शारीरिक विकास को भी महत्व दिया जाता था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के खेलकूद और शारीरिक व्यायाम निर्धारित थे। 'छल्लवग्ग' मे हमें एक विस्तृत सूची मिलती है। यथा-- कुश्ती लड़ना, मुक्केबाजी करना, भूमि जोतना, तीर चलाना, तुरही बजाना, रथों की दौड़ करना आदि। आई-सिंग ने नियमित रूप से टहलने जाने का उल्लेख किया है।

यह भी पढ़े; बौद्ध कालीन शिक्षा के उद्देश्य, गुण/महत्व, दोष

बौद्ध शिक्षा के अन्य स्वरूप 

बौद्ध शिक्षा को समाज के प्रत्येक वर्ग की आवश्यकता के अनुकूल ढालने के लिए कई नवीन प्रयोग किये गये। तात्कालिक इन शैक्षिक प्रयोगों के निम्न शैक्षिक स्वरूपों के रूप मे उदृधृत किया जा रहा है-- 

1. प्रारंभिक विद्यालय 

अलस मे देखा जाये तो प्रारंभिक शिक्षा के संप्रत्यय का भारत में सूत्रपात इन्हीं बौद्धकालीन प्रारंभिक विद्यालयों के रूप मे देखने को मिलता है। इन विद्यालयों मे शिक्षा का इस तरह आयोजन किया गया कि छात्रों को अपने परिवार में ही रहकर शिक्षा के सामान्य स्वरूप से अवगत कराया जाता था। यह बौद्ध शिक्षा की रूढ़िगत प्रक्रिया से हटकर एक नवीन संचेतना भी कही जा सकती है, क्योंकि उस समय घर-शिक्षा का पारस्परिक संयोग कल्पनातीत था। इस तरह ऐसे बालकों हेतु जो अपने माता-पिता से किन्ही कारणों वश अलग नही रह पाते थे, एक शैक्षिक आयोजन किया जाता था, जहाँ पर सभी सामान्य जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाती थी। 

2. स्त्री शिक्षा 

प्रारंभ में बौद्ध अनुशासन के कठोर नियमों के कारण स्त्रियों को पुरूष-सम शिक्षा ग्रहण करने का अधिकारी नही माना गया था, पर बाद में स्त्रियों को भी बौद्ध मठों मे उचित शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्थाएं की जाने लगी। इन पर भी बालकों की भाँति सभी संघ नियम लागू होते थे एवं उन्हें भिक्षुणी के रूप मे सभी आदेशों का पालन करना पड़ता था। कालातीत में स्त्रियों की शिक्षा के लिए अलग बौद्ध मठों की स्थापना की गयी। इनका संचालन भी वरिष्ठ योग्य बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा ही किया जाता था। इस तरह इस युग मे स्त्री शिक्षा का तीव्र गति से प्रचार-प्रसार होने लगा। 

स्त्रियोचित शैक्षिक जागरूकता पर अभी भी अभीष्ट अंकुश प्रतीत होता है, क्योंकि बौद्ध स्त्री मठों मे उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाली स्त्रियों मे प्रायः उच्च तथा कुलीन वर्गों को ही प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता था। इस तरह जनप्रतिनिधियों का क्रमिक रूप से बहिष्कार किया गया था। अतः बौद्ध शिक्षा कुलीन, प्रबुद्ध स्त्री वर्ग के लिए शिक्षा के पर्याय के रूप मे दृष्टिगोचर होती है। डाॅ. ए. एस. अल्तेकर ने इसे मूल रूप से व्यक्त करते हुए लिखा है," स्त्रियों हेतु संघ के प्रवेश द्वारा खुलने से सिर्फ कुलीन वर्गों की स्त्रियों को ही प्राथमिकता प्रदान की गयी। इससे कुलीन एवं व्यावसायिक स्त्री शिक्षा मे बहुत उन्नति हुई।" 

3. व्यावसायिक शिक्षा 

हालांकि बौद्ध शिक्षा पद्धति का केन्दीभूत बिन्दु ' धार्मिक शिक्षा' करना था, पर इसका यह अभिप्राय नही कि समाजगत सुविधाओं के लिए व्यावसायिक शिक्षा को अमान्य किया गया था। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ "महावग्गा"  मे ऐसा उल्लेख मिलता है कि उस समय मे कई व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था। 

ये पाठ्यक्रम इस तरह है-- 

1. वस्त्र विज्ञान; कताई, बुनाई, सिलाई।

2. भवन विज्ञान निर्माण कला के सभी तत्व।

3. मूर्ति कला। 

4. चित्र कला। 

5. युद्ध विज्ञान। 

6. ललित कलाएं। 

इस तरह भिक्षुक अपने जरूरी वस्त्रों की निर्माण कला में पारंगत होता था। बौद्ध मठ संचालक-भवन विज्ञान में निपुणता रखने का प्रमाण उनके द्वारा निर्मित भवन, मठों, स्तुपों से मिलता है। मूर्तिकला का प्रमाण उनके द्वारा सृजित बौद्ध प्रतिमाओं से मिलता है। ये लोग चित्रकला में भी प्रशिक्षित किये जाते थे। यही कारण है कि आज भी प्रसिद्ध बौद्ध मठों के भीतर सुंदरतम कलाओं के दर्शन किये जा सकते है। शारीरिक सौष्ठव, शक्तियों के संचय भगवान बुद्ध के जीवन संबंधी कई घटनाओं पर अपनी सृजनात्मक शक्तियों का परिचय ललित कलाओं के माध्यम से देते थे। इसके लिए ये लकड़ी, पत्थर, रंगों, प्रकृति के अन्य उपागमों का प्रयोग करते थे। 

इसके अलावा सामाजिक व्यवसायों में प्रवीणता प्रदान करने के लिए इन छात्रों को वाणिज्य, कुटीर उद्योग, गणनात्मक योग्यताओं, कृषि, पशुपालन आदि का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। राजा मिलिन्द द्वारा लिखित प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ "मिलिन्द पान्हा" मे निम्न "शिल्पों" का उल्लेख है, जो कि उस समय प्रचलित थे-- 

1. हस्ति विद्या, 

2. इन्द्र जाल, 

3. आखेट विद्या, 

4. पशु-पक्षियों की बोली विद्या, 

5. धनुर्विद्या, 

6. शारीरिक सांकेतिक भाषा, 

7. औषधि विज्ञान। 

इस तरह 16 शिप्पाओं (शिष्यों) का उल्लेख मिलता है। इससे ज्ञातव्य है कि बौद्ध शिक्षा में व्यावसायिक तथा प्राविधिक शिक्षा पाठ्यक्रमों को भी सामान्य शिक्षा के अनुकूल उपयुक्त स्थान प्राप्त था।

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