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8/29/2021

अध्यापक/शिक्षक शिक्षा का क्षेत्र, महत्व/आवश्यकता

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अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र (adhyapak shiksha ka kshera)

अध्यापक शिक्षा का क्षेत्र मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक फैला हुआ है। जन्म के समय ही बालक का प्रथम शिक्षक उसकी माता होती है, जो उसके भोजन एवं सुरक्षा से लेकर जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, उसके विकास मे सहयोगी होती है, उसे संस्कारवान बनाती है तथा परिवार, वातावरण एवं समाज से सामंजस्य सिखाती है तथा नैतिकता सहित सभी अच्छे गुणों को बालक मे भर देती है। 

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शिक्षा जन्म से मृत्यु तक लगातार चलती रहने वाली प्रक्रिया है। अतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे इसका दखल है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे समस्याएं है, उन समस्ताओं को हल करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता होती है जो व्यवहार परिवर्तन कर हमें सुमार्ग पर ले जाकर प्रकृति, वातावरण, समाज तक परिवार मे सामंजस्य स्थापित कर हमारी समस्याओं को सुलझाने मे मदद देती है। 

संक्षेप में अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र मे निम्न हो सकते है-- 

1. ज्ञानार्जन में।

2. समस्या सुलझाने में।

3. शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति करने में।

4. चरित्र निर्माण में। 

5. व्यक्तित्व निर्माण में। 

6. अच्छा नागरिक बनाने में। 

7. रूढ़िवादिता एवं परम्पराओं से अवगत कराने में।

8. सामाजिक चेतना जाग्रत करने में। 

9. सद्गुणों को संचरित करने में। 

10. संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने में। 

11. मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में। 

12. समाजशास्त्रीय क्षेत्र में। 

13. कला, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा के ज्ञानार्जन में। 

14. शोध कार्यों में।

15. व्यक्तियों, समाज, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीयता के समझने में।

16. मानवीय गुणों के बारे में। 

17. दर्शन एवं नैतिकता में।

18. भौतिक, व्यावहारिक, मूर्त एवं अमूर्त विषयों के संबंध के क्षेत्र में।

अध्यापक शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व (adhyapak shiksha ka mahatva)

अध्यापक शिक्षा या शिक्षक शिक्षा का महत्व एवं आवश्यकता निम्नलिखित है--

1. प्रत्येक अध्यापक विद्यार्थी है 

शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। अध्यापक को जीवन भर सीखते रहना चाहिए। वास्तव मे किसी भी व्यक्ति को तब तक शिक्षण कार्य करने का फैसला नही करना चाहिए जब तक स्वयं सीखते रहने का निश्चय न कर ले क्योंकि एक सच्चा अध्यापक अपने समूचे जीवन में विद्यार्थी बने रहता है। 

डाॅ. रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों मे," एक अध्यापक कभी भी वास्तविक अर्थों में नही पढ़ा सकता जब तक वह स्वयं अभी सीख न रहा हो। एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्जवलित नही कर सकता जब तक उसकी अपनी ज्योति जलती न रहे। 

सैकेण्डरी शिक्षा आयोग के शब्दों मे," अध्यापक प्रशिक्षण का कार्यक्रम ही उत्कृष्ट क्यों न हो, लेकिन केवल इसी से उत्कृष्ट अध्यापक का निर्माण नही होता। परिवर्द्धित कौशल आलोचनात्मक रूप से विश्लेषण किए गए अनुभव तथा विकास के व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्नों से प्राप्त होता है।" 

कोठारी आयोग के अनुसार," शिक्षा के सभी स्त्रोतों में तेजी से हो रही उन्नति के कारण तथा अध्यापक के सिद्धांतों और प्रयोगों मे लगातार हो रहे विकास के कारण सेवाकालीन शिक्षा की आवश्यकता बहुत ही अनिवार्य है।" 

2. शिक्षा के उद्देश्यों को समझने के लिए 

शिक्षा की आवश्यकता शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करना होता है। अतः शिक्षा एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। शिक्षक को जब तक शिक्षा के उद्देश्य नही पता होगें तब तक वह इस क्रिया को अच्छे ढंग से क्रियान्वित नही कर सकता। शिक्षक शिक्षा के माध्यम से शिक्षकों के शिक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है जिसके द्वारा वे छात्रों को विधिवत् ढंग से उन्हें प्राप्त कराने मे सहायता करते है। 

3. शिक्षा गतिशील है 

शिक्षा गतिशील होती है अर्थात् उसमे प्रत्येक समय परिवर्तन होता रहता है। जो सिद्धांत बीस साल पहले समझे जाते थे, आज उनका कोई मूल्य नही रहा। इसलिए यह स्पष्ट है कि जिस अध्यापक ने बीस वर्ष पहले प्रशिक्षण लिया था आज उसे नया प्रशिक्षण लेना चाहिए। उसे शिक्षा की नवीनतम वृत्तियों से अपना संबंध स्थापित रखना चाहिए। उसे नवीन समस्याओं, नवीन विधियों तथा शिक्षा की नवीन शैलियों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।

4. आजीवन शिक्षा 

हाल ही के अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग ने सेवाकालीन प्रशिक्षण को 'आजीवन शिक्षा' का नारा देकर इसकी जरूरत पर बल दिया है। 

5. सुरक्षा की भावना 

सेमिनारों और कार्यशालाओं मे जब अध्यापक एक दूसरे के साथ मिलते है, तो उनमें सरंक्षण समवृत्ति, सामूहिक वृत्ति तथा अपनत्व की भावना पैदा होती है। 

6. व्यावसायिक विकास के लिए 

अध्यापक के व्यावसायिक विकास हेतु सेवाकालीन प्रशिक्षण बहुत ही जरूरी है। इसे इस बात की आवश्यकता होती है कि वह अपने अनुभव मे नवीनता प्राप्त करे, नया ज्ञान हासिल करे, अपने दृष्टिकोण का विस्तार करे, दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाए, नई सूचनाएं प्राप्त करे। इस प्रकार अपने आप का नवीनीकरण करे। 

7. बौद्धक परम्पराओं और कार्य कौशलों के हस्तांतरण के लिए 

अध्यापक छात्रों की शिक्षण प्रक्रिया तक ही सीमित नही रहता वरन् वह छात्रों मे बौद्धक परम्पराओं और कार्य कौशलों का हस्तांतरण भी करता है। वह पाठ्यचर्या के आधीन विषयों के साथ-साथ अन्य ज्ञान एवं परम्पराएँ भी सीखने के लिए प्रदान करता है। इस प्रकार शिक्षक शिक्षा के द्वारा समाज की सभ्यता-संस्कृति एवं परम्पराओं का कैसे एक पीढ़ी से दूसरी में हस्तांतरण हो, इसका ज्ञान कराया जाता है। 

8. उत्तरदायित्वों को कुशलतापूर्वक निर्वाह करने के लिए 

एक शिक्षक शिक्षण के क्षेत्र मे मात्र बौद्धक ज्ञान और कुशलताओं को ही नही प्रदान करति है बल्कि वह छात्रों को विचार करने, सोचने तथा नवीन कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। शिक्षक का कार्य शिक्षण प्रदान करना ही नही होता बल्कि उसका सर्वांगीण विकास करना भी होता है। शिक्षक शिक्षण के द्वारा अद्यतन तकनीकियों, शिक्षण विधियों एवं रणनीतियों से शिक्षक को परिचित कराया जाता है। इसका उपयोग करके अध्यापक छात्रों को रूचिपूर्वक अध्ययन एवं अध्ययन कराने मे सफलता प्राप्त करते है। 

9. शिक्षा का पुनर्गठन 

अंत मे, स्वतंत्र भारत की यह माँग है कि अध्यापकों को परिवर्तनशील भारतवर्ष के नवीनतम विकास कार्यों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। विशेषकर जब कोठारी आयोग के सुझावों पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का निर्माण हो चुका है। अध्यापकों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे सभी स्तरों पर शिक्षा के पुनर्गठन की तरफ ध्यान दें।

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