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8/04/2021

पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धांत

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पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धांत 

pathyakram nirman ke siddhant;पाठ्यक्रम निर्माण में दार्शनिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक प्रवृत्तियों के महत्व के आधार पर निम्नलिखित सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना चाहिए-- 

1. जीवन से संबंधित होने का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम निर्माण का सबसे पहले सिद्धांत यह है कि पाठ्यक्रम में उन्हक विषयों, क्रियाओं एवं वस्तुओं को सम्मिलित करना चाहिए जिनका किसी-न-किसी रूप मे बालकों के वर्तमान जीवन से संबंध हो और साथ ही वे उनके भावी जीवन के लिए उपयोगी भी हों। ऐसे विषयों का अध्ययन करके ही बालक जीवन मे सफलता प्राप्त कर सकेंगे। परम्परागत संस्कृत पाठशालाओं एवं मकतबों का महत्व आज इसलिए कम गया है क्योंकी उनमे पढ़ाये जाने वाले विषयों का जीवन से बहुत कम संबंध होता है। 

2. शैक्षिक उद्देश्यों से अनुरूपता का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन है। इसलिए पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय शिक्षा के उद्देश्यों विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसीलिए पाठ्यक्रम मे उन्ही विषयों एवं क्रियाओं का समावेश करना चाहिए जो शिक्षा के उद्देश्यों के अनुकूल हों। वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य बालकों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं चरित्रिक विकास करने के साथ-साथ उन्हें किसी उद्योग अथवा उत्पादन कार्य मे निपुण करना है अर्थात् उन्हें व्यक्तिगत एवं सामाजिक हितों के संरक्षण के योग्य बनाना है। पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय हमे इन उद्देश्यों को सामने रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, शारीरिक विकास करने के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि शारीरिक विकास के किन-किन विषयों का ज्ञान एवं किन क्रियाओं का अभ्यास लाभदायक हो सकता है। अतः इसके लिए शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान एवं गृह विज्ञान के सामान्य सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ खेल-कूद एवं व्यायाम को पाठ्यक्रम मे सम्मिलित किया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत बालकों को दैनिक जीवन में स्वास्थ्यप्रद नियमों, जैसे-- प्रातः काल में सोकर जल्दी उठना, रोज स्नान करना, शरीर एवं उसके विभिन्न अंगो (आँख, कान, नाक, गला तथा दाँतों आदि) की सफाई करना, व्यायाम करना, सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन करना, दिनचर्या नियमित रखना, समय से सोना आदि का पालन करने की आदत विकसित की जानी चाहिए। 

इसी तरह उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी तदनुकूल विषयों एवं क्रियाओं का पाठ्यक्रम मे समावेश किया जाना चाहिए। इसके साथ ही विभिन्न स्तरों के लिए इन विषयों के ज्ञान के स्वरूप एवं सीमा का भी निर्धारिण किया जाना चाहिए। 

3. उपयोगिता का सिद्धांत 

यह सिद्धांत जीवन से संबंधित होने के सिद्धांत के लगभग अनुरूप ही है। इस सिद्धांत के अनुसार उन्ही विषयों को स्थान दिया जाना चाहिए जो बालकों के भावी जीवन में काम आ सके। नन (Nunn) का मानना है कि मनुष्य अपने बच्चों को केवल ज्ञान के प्रदर्शन के लिए व्यर्थ की बातें सिखाना नही चाहता है, वरन् वह यह चाहता है कि बालकों को ऐसी बातें सिखायी जायें जो जीवन के लिए उपयोगी हों। क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी, यह समय विशेष की विचारधार निश्चित करती है। उदाहरणार्थ-- लोकतांत्रीय देशों मे प्रत्येक बालक को अपनी मातृभाषा एवं राष्ट्रभाषा का ज्ञान होना चाहिए तथा वह सामाजिक व्यवहार में निपुण होना चाहिए। अतः इसके लिए पाठ्यक्रम में मातृभाषा, राष्ट्रभाषा तथा सामाजिक विज्ञान एवं सामाजिक क्रियाओं को स्थान दिया जाना चाहिए। उपयोगिता की दृष्टि से ही विषयों के क्रम का निर्धारण किया जाना चाहिए अर्थात् सबसे अधिक उपयोगी विषय को प्रथम स्थान पर रखना चाहिए।

4. बाल-केन्द्रियता का सिद्धांत 

मनोविज्ञान बाल-केन्द्रित शिक्षा पर सबसे अधिक बल देता है। अतः इसके अनुसार पाठ्यक्रम भी बाल-केन्द्रित होना है। इसका आशय यह है कि पाठ्यक्रम बालकों की रूचियों, आवश्यकताओं, क्षमताओं, योग्यताओं एवं मनोवृत्तियों तथा बुद्धि एवं आयु के अनुकूल होना चाहिए। बच्चों को उनकी रूचि, रूझान एवं योग्यता के अनुसार कुछ वर्गों में रखा जा सकता है, जैसे-- साहित्यिक प्रवृत्त वाले छात्र, विज्ञान में रूचि रखने वाले छात्र, रचनात्मक कार्यों एवं हस्तकला में रूचि लेने वाले छात्र आदि। इसके लिए पाठ्यक्रम का नियोजन विभिन्न वर्गों मे किया जा सकता है, किन्तु इन वर्गों मे भी अनेक विषयों का समावेश होना चाहिए जिससे बालकों को अपनी रूचि के अनुसार विषय एवं क्रियायें चुनने का अवसर प्राप्त हो सके।

5. रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों के उपयोग का सिद्धांत 

बालकों में रचनात्मक प्रवृत्ति बहुत अधिक होती है। इसीलिए पाठ्यक्रम में ऐसे अवसर प्रदान किये जाने चाहिए जिससे उनकी रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके। इसके लिए बालकों को प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए तथा उचित निर्देशन प्रदान करना चाहिए। इस सिद्धांत के महत्व के संबंध में रेमाण्ट ने लिखा है--," जो पाठ्यक्रम, वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त है, उसमे निश्चित रूप से रचनात्मक विषयों के प्रति निश्चित सुझाव होना चाहिए। 

6. खेल एवं कार्य की क्रियाओं के अन्तःसंबंध का सिद्धांत 

बालक खेल की क्रियाओं मे बहुत अधिक रूचि रखता है किन्तु कार्य के प्रति वैसी रूचि प्रदर्शित नही करता है। इसका कारण यह है कि खेल से उसे आनंद की अनुभूति होती है। अतः पाठ्यक्रम निर्माण में इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि ज्ञान संबंधी क्रियाओं से भी बालकों को खेल की क्रियाओं के समान ही आनंद प्राप्त हो सके। इसका अर्थ यह नही है कि ज्ञान एवं खेल की क्रियाओं को एक जैसा समझा जाये, बल्कि इसका आशय यह है कि ज्ञान की क्रियाओं को रूचिकर बनाने के लिए उन्हें खेल की क्रियाओं से संबंधित करने का प्रयास किया जाये। इस संबंध मे क्रो एवं क्रो का कथन महत्वपूर्ण लगता है," जो लोग सीखने की प्रक्रिया को निर्देशित करते है, उनका उद्देश्य यह होना चाहिए कि ज्ञानात्मक क्रियाओं की ऐसी योजना बनायें जिसमे खेल के दृष्टिकोण को स्थान प्राप्त हो।" 

7. संस्कृति एवं सभ्यता के ज्ञान का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम के निर्माण के समय इस बात को भी ध्यान मे रखना चाहिए कि इसमें उन विषयों, वस्तुओं एवं क्रियाओं को जरूर सम्मिलित किया जाये जिससे बालकों को अपनी संस्कृति एवं सभ्यता का ज्ञान प्राप्त हो सके। शिक्षा का एक उद्देश्य संस्कृति एवं सभ्यता का संरक्षण एवं विकास करना है। अतः पाठ्यक्रम इस उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक होना चाहिए।

8. व्यक्तिगत भिन्नता एवं लचीलेपन का सिद्धांत 

मनोविज्ञान के विकास से पूर्व सभी के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम उपयुक्त समझा जाता था, परन्तु मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक बालक की रूचियाँ, आवश्यकतायें, क्षमतायें, योग्यतायें, मनोवृत्तियाँ एवं बुद्धि एक-दूसरे से पृथक होती है तथा उनका अपना विशिष्ट व्यक्तित्व होता है। इसलिए सभी के लिए एक समान पाठ्यक्रम की अवधारण उपयुक्त नही है। अतः पाठ्यक्रम में विविधता एवं लचीलापन का होना अति आवश्यक है। इससे पाठ्यक्रम में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है। इसके लिए शिक्षक एवं शिक्षण संस्थाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे पाठ्यक्रम में आवश्यकता के अनुरूप संशोधन एवं सुधार कर सकें। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भी इस संबंध में अपना विचार व्यक्त किया है। आयोग के अनुसार," व्यक्तिगत भिन्नताओं की दृष्टि से तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं एवं रूचियों के अनुकूलन के लिए पाठ्यक्रम में पर्याप्त विविधता एवं लचीलापन होना चाहिए।"

9. अग्रदर्शिता का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम निर्माण के प्रथम सिद्धांत के अनुसार पाठ्यक्रम मे उन्हीं विषयों एवं क्रियाओं को समाविष्ट करना चाहिए जो बालक के जीवन से संबंधित हों, किन्तु सफल जीवनयापन के लिए वर्तमान के साथ-साथ भावी जीवन मे अनुकूलीकरण की दृष्टि से पाठ्यक्रम मे ऐसे विषयों, वस्तुओं एवं क्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए जो बालकों के जीवन में आने वाली समस्याओं एवं परिस्थितियों को समझने एवं उनका समाधान करने मे सहायक सिद्ध हो सकें। इस संबंध में रायबर्न से कहा है," बालक जो कुछ विद्यालय से सीखता है, उसके द्वारा उसमें ऐसी योग्यता आनी चाहिए कि वह जीवन की परिस्थितियों से अनुकूलन कर सके तथा आवश्यकता पड़ने पर परिस्थितियों में परिवर्तन ला सकें। 

10. अनुभवों की पूर्णता का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम के अंतर्गत मानव जाति के अनुभवों की पूर्णता निहित होनी चाहिए। इससे आश्य यह है कि पाठ्यक्रम में परम्परागत ढंग से पढ़ाये जाने सैद्धांतिक विषयों के साथ-साथ उन सभी अनुभवों को भी स्थान दिया जाना चाहिए जिनको बालक विभिन्न क्रियाओं द्वारा प्राप्त करता है। ये क्रियायें विद्यालय, खेल के मैदान, कक्षाकक्ष, प्रयोगशाला, पुस्तकालय तथा छात्र एवं शिक्षकों के अनौपचारिक संपर्कों में निरन्तर गतिशील रहती है। इस दृष्टि से विद्यालय का संपूर्ण जीवन ही पाठ्यक्रम है। माध्यमिक शिक्षा आयोग का भी यही विचार है। माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार," पाठ्यक्रम का अर्थ केवल सैद्धांतिक विषयों से नही है, बल्कि इसमें अनुभवों की सम्पूर्णता निहित होती है।" 

11. उत्तम आचरण के आदर्शों की प्राप्ति का सिद्धांत 

बालक के समाजीकरण तथा सफल एवं व्यवहार कुशल भावी जीवन के लिए उसमें उत्तम आचरण का विकास करना जरूरी होता है। अतः पाठ्यक्रम मे उन विषयों, वस्तुओं एवं क्रियाओं का समावेश किया जाना चाहिए, जिससे बालकों को उत्तम आचरण के आदर्शो की शिक्षा मिल सके तथा उसका अनुसरण करके उसमें समाज हित, देशहित तथा परोपकार की भावना का विकास हो सके। इस संबंध में क्रो एवं क्रो का कथन है," पाठ्यक्रम का निर्माण इस प्रकार से किया जाना चाहिए, जिससे वह बालकों को उत्तम आचरण के आदर्शों की प्राप्ति में सहायता कर सके।" 

12. जीवन संबंधी क्रियाओं एवं अनुभवों के समावेश का सिद्धांत 

शिक्षा का उद्देश्य जीवन मे पूर्णता प्रदान करना है। इसलिए पाठ्यक्रम मे जीवन से संबंधित उन सभी क्रियाओं एवं अनुभवों को स्थान दिया जाना चाहिए जिससे बालक का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके। इसके लिए पाठ्यक्रम निर्माण करते समय ऐसे प्रयत्न किये जाने चाहिए कि उसमे वे सभी क्रियायें समाहित हो जायें जिनसे बालकों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, राजनीतिक, चरित्रिक, आध्यात्मिक विकास संभव हो सके। चूँकि हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया है, अतः पाठ्यक्रम का निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे प्रारंभ से ही बालक अपने जीवन में लोकतांत्रिक पद्धति को ग्रहण एवं धारण कर सके। इसके लिए पाठ्यक्रम में ऐसी क्रियाओं एवं अनुभवों को स्थान दिया जाना चाहिए जो लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को अधिक-से-अधिक विकसित कर सकें। 

13. विकास की सतत् प्रक्रिया का सिद्धांत 

किसी भी देश की शिक्षा पर उसके दर्शन, समाज, राजनीतिक स्थिति, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिक प्रगति आदि का प्रभाव पड़ता रहता है। अतः किसी भी पाठ्यक्रम को स्थायी रूप से सदैव के लिए निर्मित नही किया जा सकता है। समय एवं परिस्थितिजन्य आवश्यकताओं के अनुसार उसमें परिवर्तन करना आवश्यक होता है। अतः पाठ्यक्रम निर्माण में विकास की सतत् प्रक्रिया का ध्यान रखना अनिवार्य होता है। 

14. सामुदायिक जीवन से संबंध का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन सभी सामाजिक प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, मूल्यों एवं समस्याओं को स्थान दिया जाना चाहिए, जिनसे बालक सामुदायिक जीवन की प्रमुख बातों से परिचित हो सके। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भी इस सिद्धांत पर बल देते हुए कहा है," पाठ्यक्रम सामुदायिक जीवन से सजीव एवं अनिवार्य अंग के रूप में संबंधित होना चाहिए।" 

15. अवकाश के लिए प्रशिक्षण का सिद्धांत 

वर्तमान समय में अवकाश के सदुपयोग की भी समस्या है। यदि अवकाश के उपयोग का बालक को सही प्रशिक्षण नही दिया जाता है तब उसके गलत दिशा मे जाने की सम्भावना अधिक रहती है। अतः पाठ्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए जो बालको को कार्य एवं अवकाश दोनों के लिए प्रशिक्षित कर सके। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भी इस संबंध में अपने प्रतिवेदन में कहा है," पाठ्यक्रम इस ढंग से नियोजित किया जाना चाहिए कि वह छात्रों को न केवल कार्य के लिए, अपितु अवकाश के लिए भी प्रशिक्षित करें।"

इसलिए पाठ्यक्रम में अध्ययन के विषयों के साथ-साथ खेल-कूद, सामुदायिक कार्य, सामाजिक क्रियाओं तथा अन्य उपयोगी क्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।

16. जनतन्त्रीय भावना के विकास का सिद्धांत 

वर्तमान भारत ने लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था को स्वीकार किया है। लोकतन्त्रीय व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण हेतु नागरिकों में जनतन्त्रीय भावना का अधिकाधिक विकास होना चाहिए। अतः शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बालकों में जनतन्त्रीय भावना का विकास करना है। इसलिए पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो जनतंत्र की भावना एवं आदर्शों का पोषक हो। इसके लिए विद्यालय के सभी कार्यों-प्रवेश, चयन, अध्ययन-अध्यापन, खेल-कूद, मूल्यांकन आदि में जनतंत्रीय भावना का समावेश होना चाहिए।

17. सह-संबंध का सिद्धांत 

पाठ्यक्रम के निर्धारण मे इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसमे सम्मिलित किये जाने वाले विभिन्न विषय एक-दूसरे से संबंधित हों। इसका तात्पर्य यह है कि एक एक विषय की शिक्षा दूसरे विषय की शिक्षा का आधार बन सके। वर्तमान समय में सभी शिक्षाशास्त्री इस सिद्धांत पर विशेष बल दे रहे है तथा इसी के आधार पर एकीकृत सुसम्बद्ध पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है। विषयों के संबंधित न होने पर पाठ्यक्रम की प्रभावशीलता समाप्ता हो जाती है। अतः पाठ्यक्रम के निर्माण मे सह-संबंध का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है।

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