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7/28/2021

पाठ्यक्रम का अर्थ, परिभाषा, महत्व/आवश्यकता

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पाठ्यक्रम का अर्थ (pathyakram kya hai)

pathyakram arth paribhasha avashyakta mahatva;पाठ्यक्रम का अर्थ 'उन सभी क्रियाओं और परिस्थियों से है जिनका नियोजन और संपादन विद्यालय बच्चों के विकास के लिए करता है।' यह बात सभी लोग जानते है कि समय-समय पर समाज के लोगों के दृष्टिकोण बदलते रहते है। इन्ही बदलते विचारों के साथ शिक्षा के उद्देश्य भी बदलते है। शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति पाठ्यक्रम द्वार ही होती है। अतः पाठ्यक्रम का बदलते रहना स्वाभाविक है। पहले पाठ्यक्रम को संकुचित अर्थ मे लिया जाता रहा है लेकिन वर्तमान मे पाठ्यक्रम को बहुत अधिक व्यापक रूप मे लिया जाता है। आज बालक को भावी जीवन के लिये तैयार करना पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जाने लगा है।

शिक्षक की दृष्टि से पाठ्यक्रम एक दिशा एवं साधन है जिसका अनुसरण करके शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है। पाठ्यक्रम एक दिशा एवं साधन है जिसका अनुसरण करके शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है। पाठ्यक्रम के व्यवस्थित रूप को पाठ्यक्रम की संज्ञा देते है। जो छात्रों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए तैयार किया जाता है। 

पाठ्यक्रम के अर्थ को स्पष्ट करने का प्रयास दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों तथा मनोवैज्ञानिकों ने भी किया है। समाजशास्त्री पाठ्यक्रम का अर्थ अधिक व्यापक लगाते है। समाजशास्त्रियों के अनुसार," पाठ्यक्रम शब्द का अर्थ- उन सभी क्रियाओं एवं परिस्थितियों से होता है जिनका नियोजन एवं सम्पादन विद्यालय द्वार बालकों के विकास के लिए किया जाता है। 

विद्यालयों का प्रमुख कार्य बालकों को शिक्षा प्रदान करना होता और इसको पूर्ण करने के लिए वहाँ पर जो कुछ किया जाता उसे पाठ्यक्रम का नाम दिया गया है। इसीलिए पाठ्यक्रम को परिभाषित करते हुए एक विद्वान ने इसे ह्राट ऑफ एजूकेशन (What of Education) कहा है। यह परिभाषा बहुत ही अधिक सरल और स्पष्ट लगती है, परन्तु इस ह्राट की व्याख्या करना तथा कोई निश्चित उत्तर प्राप्त करना बहुत कठिन कार्य है। इस संबंध मे अमेरिका के 'नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन' ने अपनी टिप्पणी इस प्रकार की है-- 

"विद्यालयों का कार्य क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर कई बार अनेक ढंग से दिया जा चुका है, फिर भी बार-बार उठाया जाता है। कारण स्पष्ट है, यह एक ऐसा शाशवत प्रश्न है जिसका उत्तर अन्तिम रूप से कभी दिया भी नही जा सकता है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर प्रत्येक समाज एवं प्रत्येक पीढ़ी की बदलती हुई प्रकृति एवं आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहता है।"

अतः शिक्षा के उद्देश्य बदलते रहे इसलिये पाठ्यक्रम का अर्थ भी बदलता रहा है। अतीत में पाठ्यक्रम का अर्थ संकुचित था। कुछ विषयों में शिक्षा के प्रारूप को ही पाठ्यक्रम कहते थे परन्तु आज के संदर्भ मे इसका अधिक व्यापक अर्थ है। बालक को भावी जीवन के लिए तैयार कर सकें ऐसा पाठ्यक्रम होना चाहिए यह केवल ज्ञान देने तक सीमित नही है। पाठ्यक्रम विकास सदैव भविष्य के लिए किया जाता है। 

पाठ्यक्रम की परिभाषा (pathyakram ki paribhasha)

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार,"  पाठ्यक्रम का अर्थ रूढ़िवादी ढंग से पढ़ाये जाने वाले बौद्धिक विषयों से नही है परन्तु उसके अंदर वे सभी क्रिया-कलाप आ जाते है जो बालकों को कक्षा के बाहर तथा भीतर प्राप्त होते है।"

ब्लांडस के शिक्षा कोष के अनुसार," पाठ्यक्रम को क्रिया एवं अनुभव के परिणाम के रूप मे समझा जाना चाहिए न कि अर्जित किये जाने वाले ज्ञान और संकलित किये जिने वाले तथ्यों के रूप मे। विद्यालय जीवन के अंतर्गत विविध प्रकार के कलात्मक, शारीरिक एवं बौद्धिक अनुभव तथा प्रयोग सम्मिलित रहते है।" 

हार्न के अनुसार," पाठ्यक्रम वह है जो बालकों को पढ़ाया जाता है। यह शान्तिपूर्ण पढ़ने या सीखने से अधिक है। इसमें उद्योग, व्यवसाय, ज्ञानोपार्जन, अभ्यास और क्रियायें सम्मिलित है।" 

कनिंघम के अनुसार," कलाकार (शिक्षक) के हाथ में यह (पाठ्यक्रम) एक साधन है जिससे वह पदार्थ (शिक्षार्थी) को अपने आदर्श उद्देश्य के अनुसार स्टूडियों (स्कूल) में डाल सके।"

फ्रोबेल के अनुसार," पाठ्यक्रम को मानव जाति के सम्पूर्ण ज्ञान तथा अनुभवों का सार समझना चाहिए।"

मुनरों के मतानुसार," पाठ्यक्रम में वे सब क्रियायें सम्मिलित है जिनका हम शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु विद्यालय में उपयोग करते है।" 

कैसबैल के अनुसार," पाठ्यक्रम में वे सभी वस्तुयें आती है जो बालकों के, उनके माता-पिता एवं शिक्षकों के जीवन से होकर गुजरती है। पाठ्यक्रम उस सभी चीजों से बनता है जो सीखने वालों को काम करने के घण्टों में घेरे रहती है। वास्तव में पाठ्यक्रम को गतिमान वातावरण कहा जाता है।" 

वेण्ट और क्रोनेबर्ग के अनुसार," पाठ्यक्रम पाठ्यवस्तु का सुव्यवस्थित रूप है जो बालकों की आवशकताओं की पूर्ति हेतु तैयार किया जाता है।" 

जाॅन. एफ. कर्र के अनुसार," विद्यालय द्वार सभी प्रकार के अधिगम तथा निर्देशन का नियोजन किया जाता है चाहे वह व्यक्तिगत रूप से हो या सामूहिक रूप में, विद्यालय के अंदर एवं बाहर व्यवस्थित की जायें वे सभी पाठ्यक्रम का प्रारूप होती है।" 

फिलिप एच. टेलर के अनुसार," पाठ्यक्रम के अंतर्गत, पाठ्यक्रम, शिक्षण, शिक्षण विधियाँ तथा उद्देश्यों को सम्मिलित किया जाता है तथा इन क्रियाओं को कैसे आरंभ किया जाये। इन तीनों पक्षों की अन्तःप्रक्रिया को पाठ्यक्रम कहते है।" 

बबिट के अनुसार," उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चौबीस घण्टे की जा रही समस्त क्रियायें पाठ्यक्रम के अन्तर्गत आ जाती है।"

पाल हिस्ट के अनुसार," उन सभी क्रियाओं का प्रारूप जिनके द्वार छात्र शैक्षिक लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों को प्राप्त कर लेंगे उन्हें पाठ्यक्रम की संज्ञा दी जाती है।" 

सैमुअल के अनुसार," पाठ्यक्रम में शिक्षार्थी के वे समस्त अनुभव समाहित होते हैं जिन्हें वह कक्षाकक्ष मे, प्रयोगशाला में, पुस्तकालय में, खेल में मैदान में, विद्यालय में सम्पन्न होने वाली अन्य पाठ्येतर क्रियाओं द्वारा तथा अपने अध्यापकों एवं साथियों के साथ विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से प्राप्त करता है।"

रडयार्ड एवं हेनरी के अनुसार," विस्तृत अर्थ में पाठ्यक्रम के अंतर्गत समस्त विद्यालय का वातावरण आता है जिसमे विद्यालय मे प्राप्त सभी तरह के संपर्क, पठन, क्रियाएं तथा विषय शामिल है। 

ड्यूवी के अनुसार," पाठ्यक्रम सिर्फ अध्ययन की योजना अथवा विषय-सूची ही नही, वरन् कार्य तथा अनुभव की श्रृंखला है। पाठ्यक्रम समाज में कलात्मक ढंग से परस्पर रहने हेतु बच्चों के प्रशिक्षण का शिक्षकों के पास एक साधन है।" 

उपयुक्त दी गयी पाठ्यक्रम की परिभाषाओं के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है कि, पाठ्यक्रम विद्यालय में पढ़ायें जाने वाले विषयों तक ही सीमित नही है, बल्कि विद्यालय में नियोजित और सम्पादित होने वाली सभी क्रियाओं से संबंधित है। ये सभी क्रियायें बालक के विकास में सहायक होती है। अन्य शब्दों में पाठ्यक्रम में वे सभी क्रियायें आती है जो बालक के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन करती है।

पाठ्यक्रम की शब्दावली 

पाठ्यक्रम शब्द को कई अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है उनमें से प्रमुख शब्दों के अर्थ इस प्रकार है-- 

1. पाठ्य-वस्तु 

किसी विषय-वस्तु का विवरण शिक्षण के लिए तैयार किया जाता है जिसे शिक्षक छात्रों को पढ़ाता है उसे पाठ्यवस्तु कहते है।

2. प्रकरण 

शिक्षक अपने शिक्षण हेतु जिस पाठ्यक्रम को तैयार करता और उसका आन्तरिक स्वरूप विकसित करता है उसे प्रकरण की संज्ञा दी जाती है। 

3. अध्ययन का क्षेत्र 

शिक्षक शिक्षण हेतु जिस पाठ्यक्रम का शिक्षण करता है उसका संबंध प्राकृतिक, भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक तथ्यों से संबंधित होता है। यह अध्ययन क्षेत्र कहा जाता है। मानव व्यवहारों का अध्ययन मनोविज्ञान के अंतर्गत किया जाता है। यह छात्र का अध्ययन क्षेत्र माना जाता है, जिसे अनुशासन की भी संज्ञा दी जाती है। 

4. रूचि का केन्द्र

शिक्षण में छात्रों की रूचियों को भी ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है। जैसे किसी छात्र को शिक्षण में रूचि या कलात्मक कार्यों में अधिक रूचि है। यदि छात्रों को उनकी रूचियों के अनुसार शिक्षण दिया जाये तो उसे रूचि का केंद्र कहते है। 

5. समन्वित अधिगम 

शिक्षक अपने शिक्षण द्वार छात्र को ऐसे अनुभव प्रदान करता है जिसमे जीवन की समस्याओं के समाधान के साथ विषयों का भी ज्ञान दिया जाता है तब उसे समन्वित अधिगम की संज्ञा दी जाती है। 

6. शैक्षिक अनुभव 

विद्यालय के अंतर्गत जो छात्र को अनुभव प्रदान किए जाते है उनका संबंध बालकों के विकास से होता है। पाठ्यवस्तु के अतिरिक्त अन्य सहगामी क्रियायें भी पाठ्यक्रम का अंग होती है। पाठ्यवस्तु तथा अन्य सहगामी क्रियाओं द्वार जो अनुभव छात्र को दिए जाते हैं, उन्हें शैक्षिक अनुभव कहते है। पाठ्यक्रम के व्यापक अर्थ में शैक्षिक अनुभव अधिक समीप है जबकि अन्य शब्दों में पाठ्यवस्तु को ही महत्व दिया जाता है।

पाठ्यक्रम का महत्व अथवा आवश्यकता

pathyakram ka mahatva;पाठ्यक्रम के द्वार ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है अतः शिक्षा नियोजन के लिए पाठ्यक्रम आवश्यक है। इसकी आवश्यकता अथवा महत्व अधोलिखित है-- 

1. शिक्षा के उद्देश्य की प्राप्ति 

शिक्षा की व्यवस्था पाठ्यक्रम पर आधारित होती है। जब तक पाठ्यक्रम का सही नियोजन नही किया जाता तब तक शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति नही हो सकती क्योंकि पाठ्यक्रम का स्वरूप शिक्षा के उद्देश्यों के अनुसार निर्मित होता है। 

2. शिक्षा प्रक्रिया का व्यवस्थीकरण 

पाठ्यक्रम एक ऐसा लेखा जोखा है जिसमें यह स्पष्ट रूप से अंकित किया जाता है कि शिक्षा के किस जीवन स्तर पर विद्यालयों में कौन-सी क्रियाओं की तथा कौन से विषयों की शिक्षा दी जायेगी। इस प्रकार पाठ्यक्रम विद्यालयी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाता है अथवा शिक्षा की प्रक्रिया को व्यवस्थित करता है। 

3. क्या और कैसा ज्ञान 

पाठ्यक्रम अध्यापकों के लिये अत्यन्त उपयोगी है। बिना इसके वे यह नही जान सकते कि उन्हें क्या और कितना ज्ञान बालकों को देना है। पाठ्यक्रम के आधार पर ही वे ठीक प्रकार से काम करते है और उन्हें यह मालूम रहता है कि एक निश्चित अवधि के अंदर उन्हें अमुक कक्षा में कितना कार्य समाप्त करना है।

4. समय एवं शक्ति का प्रयोग 

पाठ्यक्रम से अध्यापकों को यह ज्ञात रहता है की उन्हें क्या सिखाना है और कितने समय में सिखाना है? इसी प्रकार छात्रों को भी यह ज्ञान रहता है कि उन्हें क्या सीखना है और कितने समय में सीखना है। इस प्रकार शिक्षा और छात्रों दोनों ही एक निश्चित अवधि के अंदर कार्य पूरा करते है। अतः इसके द्वार समय एवं शक्ति का सदुपयोग होता है।

5. ज्ञानोपार्जन 

ज्ञानोपार्जन करने मे पाठ्यक्रम बालकों की सहायता करता है। यह सही है कि ज्ञान एक है, परन्तु मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिये उसके कई भाग कर लिये है। जैसे-- साहित्य, गणित, विज्ञान, सामाजिक विषय इत्यादि। ज्ञान के इन विभिन्न भागों के ज्ञानार्थ पाठ्यक्रम की रचना की जाती है। 

6. चारित्रिक विकास 

चारित्रिक विकास की दृष्टि से शिक्षा इस बात पर बल देती है कि बालकों के अंदर मानवीय गुण, जैसे-- सत्य, सेवा, त्याग, परोपकार, सद्भावना, इत्यादि उत्पन्न किये जायें। यह कार्य पाठ्यक्रम के द्वार ही पूर्ण होता है। इन गुणों को विकसित करके इन्हीं के अनुसार बालकों से आचरण करवाना पाठ्यक्रम का उद्देश्य है।

7. चरित्र का विकास 

बालकों के व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से भी पाठ्यक्रम एक उपयोग वस्तु है। बालक के नैसर्गिक गुणों तथा शक्तियों को समुचित तथा उपयुक्त दिशा में विकसित करना पाठ्यक्रम का ही कार्य है। बिना नैसर्गिक गुणों एवं शक्तियों के विकास के व्यक्ति का समुचित विकास संभव नही है।

8. पाठ्यपुस्तकों का निर्माण 

पाठ्यक्रम के आधार पर ही पाठ्यपुस्तकों की रचना की जाती है। पाठ्य पुस्तकों में वही समग्री रखी जाती है जो किसी स्तर के पाठ्यक्रम के अनुकूल हो। पाठ्यक्रम न होने पर पुस्तकों में अनावश्यक बातें भी सम्मिलित हो सकती है। पाठ्यक्रम इस स्थिति से हमारी रक्षा करता है।

9. मूल्यांकन में सरलता 

किसी कक्षा स्तर के पाठ्यक्रम के आधार पर ही उस कक्षा के छात्रों की योग्यता का मूल्यांकन संभव होता है। पाठ्यक्रम के अभाव में मूल्यांकन कठिन होगा।

10. नागरिकों का निर्माण 

शिक्षा का उद्देश्य उपयोगी एवं आदर्श नागरिकों का निर्माण करना है। आदर्श एवं उपयोगी नागरिक वही है जिसकी शक्तियाँ पूर्णरूप से विकसित हों, जो कानून का पालन करे, न्यायानुकूल आचरण करें और जिसमें स्वतंत्र कचिन्तन और निर्माण की शक्तियाँ शामिल हों, इन बातों की क्षमता एवं योग्यता उत्पन्न करने के लिये ही पाठ्यक्रम का निर्माण होता है।

11. अन्वेषकों की उत्पत्ति 

पाठ्यक्रम ऐसे ज्ञान पिपासुओं तथा विद्वानों को जन्म देता है जो अध्ययन, उद्योग एवं शोधकार्य, ज्ञान में वृद्धि करते है। सामाजिक परिवर्तन के साथ समस्याओं के लिए शोध अध्ययनों की आवश्यकता है।

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