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8/04/2021

पाठ्यचर्या/पाठ्यक्रम निर्माण के आधार

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पाठ्यचर्या/पाठ्यक्रम निर्माण के आधार 

pathyacharya nirman ke aadhar;किसी समाज की शिक्षा के स्वरूप को निश्चित करने मे सबसे अधिक भूमिका उस समाज के जीवन दर्शन की होती है। इस सब की व्याख्या शिक्षा दर्शन मे की जाती है। इसके साथ-साथ उस समाज विशेष की संरचना, उसकी सभ्यता एवं संस्कृति तथा धार्मिक स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। इस सबका अध्ययन शैक्षिक समाजशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है। समाज की राजनैतिक एवं आर्थिक स्थिति भी शिक्षा के स्वरूप को प्रभावित करती है। इनका अध्ययन क्रमशः राज्य और शिक्षा के अर्थशास्त्र में किया जाता है। मानव की स्वयं की प्रकृति भी उसकी शिक्षा के स्वरूप को प्रभावित करती है। इसका अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान में किया जाता है। आज विज्ञान का युग है। युग के प्रभाव से शिक्षा कैसे अप्रभावित रह सकती है। मूल रूप से ये सब ही शिक्षा के स्वरूप अर्थात् उसके उद्देश्य एवं पाठ्यचर्या को किस प्रकार प्रभावित करते है, इस पर थोड़ा विचार करना आवश्यक है। 

1. दार्शनिक आधार 

हमारे जीवन अथवा शिक्षा के उद्देश्य मूलतः हमारे जीवन दर्शन पर आधारित होते है। तब शिक्षा की पाठ्यचर्या भी दर्शन से प्रभावित होनी चाहिए और होती भी है। उदाहरण के लिए अध्यात्मवादी मानव जाति के आध्यात्मिक अनुभवों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देते है इसलिए वे पाठ्यचर्या में भाषा, साहित्य, धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र को विशेष और अन्य विषयों एवं क्रियाओं को गौण स्थान देते है। इसके विपरीत भौतिकवादी भौतिक जगत् को ही सत्य मानते है और भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु पाठ्यचर्या में भौतिक विज्ञानों को प्रमुख और भाषा, साहित्य तथा कला को गौण स्थान देते है। धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र को तो वे स्थान ही नही देते। प्रयोजनवादी न तो शिक्षा के उद्देश्य निश्चित करते है और न पाठ्यचर्या। उनका स्पष्टीकरण है कि मनुष्य की परिस्थियाँ सदैव बदलती रहती है इसलिए शिक्षा के द्वारा मनुष्य को इस योग्य बनाया जाना चाहिए कि वह बदलती हुई परिस्थितियों को समझ सके और उनमें समायोजन कर सके। इसलिए वे पाठ्यचर्या में सामाजिक विषयों एवं क्रियाओं को उनकी तत्कालीन उपयोगिता की दृष्टि से स्थान देते है। पाठ्यचर्या नियोजन के लिए उन्होंने चार सिद्धांतो का प्रतिपादन किया है-- उपयोगिता का सिद्धांत, रूचि का सिद्धांत, क्रिया एवं अनुभव का सिद्धांत और एकीकरण सिद्धांत। अब जो समाज जिस दर्शन से प्रभावित होता है, उसकी पाठ्यचर्या उससे ही प्रभावित होती है। इस प्रकार दर्शन पाठ्यचर्या निर्माण का मुख्य आधार होता है।

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2. समाजशास्त्रीय आधार 

शिक्षा की पाठ्यचर्या निश्चित करने में दर्शन के बाद समाज विशेष की संरचना, उसकी संस्कृति तथा धार्मिक, राजनैतिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए जिस समाज मे पुरूष और स्त्रियों का कार्यक्षेत्र भिन्न होता है, उसमें स्त्रियों की शिक्षा की पाठ्यचर्या पुरूषों की शिक्षा की पाठ्यचर्या से भिन्न होती है और जिन समाजों मे पुरूष और स्त्रियों मे इस प्रकार का कोई भेद नही होता उनमें दोनों के लिए समान पाठ्यचर्या होती है। समाज की संस्कृति तो उसकी शिक्षा का मूल आधार होती है। हर समाज की अपने रहन-सहन और खान-पान की विधियाँ होती है, रीति-रिवाज होते है, भाषा-साहित्य, कला-कौशल, संगीत-नृत्य, धर्म-दर्शन, आदर्श-विश्वास और मूल्य होते है। इसी को समाज की संस्कृति कहते है। प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए शिक्षा का सहारा लेता है और अपनी शिक्षा की पाठ्यचर्या में अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों का समावेश करता है। समाज की धार्मिक स्थिति भी उसकी शिक्षा की पाठ्यचर्या को प्रभावित करती है।

3. राजनैतिक आधार 

वर्तमान में किसी भी देश मे शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य का उत्तरदायित्व माना जाता है, तब उसके उद्देश्य एवं पाठ्यचर्या का राज्य द्वारा प्रभावित होना स्वाभाविक है। उदाहरणार्थ साम्यवादी समाजों की शिक्षा की पाठ्यचर्या की अपेक्षा लोकतंत्रीय समाजों की शिक्षा की पाठ्यचर्या अधिक विस्तृत और लचीली होती है।

4. आर्थिक आधार 

समाज की अर्थव्यवस्था और आर्थिक स्थिति भी शिक्षा की पाठ्यचर्या को प्रभावित करती है। देश-विदेश की शिक्षा की पाठ्यचर्या पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देशों की शिक्षा की पाठ्यचर्या विस्तृत होती है और उसमें तकनीकी और प्रशासनिक शिक्षा की विशेष व्यवस्था होती है जबकि आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशो की शिक्षा मे ऐसी व्यवस्था करना संभव नही होता। धन के अभाव मे वे सामान्य शिक्षा की व्यवस्था भी अनिवार्य रूप से नही कर पाते। समाज की आर्थिक नीतियां भी शिक्षा और शिक्षा की पाठ्यचर्या को प्रभावित करती है।

5. मनोवैज्ञानिक आधार 

शिक्षा के किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किन विषयों का ज्ञान और किन क्रियाओं का प्रशिक्षण आवश्यक है, यह तो दर्शनशास्त्री और समाजशास्त्री निश्चित कर सकते है लेकिन किस स्तर के बच्चे उसे किस सीमा तक ग्रहण कर सकेंगे यह मनोवैज्ञानिक ही बता सकते है। मनोविज्ञान में बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन के अभाव मे हम यह निश्चित नही कर सकते कि किस स्तर के बच्चों को क्या सिखाया जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि बच्चे वह सब शीघ्रता से सीखते है, जिसमें उनकी रूचि एवं रूझान होती है और जिसको सीखने की उनमें शारीरिक एवं मानसिक क्षमता होती है। वर्तमान में शिक्षा के किसी भी स्तर की पाठ्यचर्या की निर्माण करते समय उस स्तर के बच्चों की रूचि, रूझान और योग्यता का ध्यान रखा जाता है और इसके लिए मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है। बिना मनोविज्ञान के स्पष्ट ज्ञान के हम सैद्धांतिक बात चाहे जितनी कर लें लेकिन उचित पाठ्यचर्या का निर्माण नही कर सकते। आज मनोविज्ञान शिक्षा की पाठ्यचर्या निर्माण का मुख्य आधार माना जाता है।

6. वैज्ञानिक आधार 

आज विज्ञान का युग है। मनुष्य का पूरा जीवन विज्ञान से प्रभावित है। उसके प्रत्येक कार्य में विज्ञान की दखल है। विज्ञान ने उसको कम श्रम से अधिक उत्पादन करने में समर्थ किया है। विज्ञान ने हमें निरीक्षण, परीक्षण और प्रयोग की विधियां दी है, आज हम बिना प्रयोग की कसौटी पर कसे किसी तथ्य को सत्य नही मानते। हमारी शिक्षा की पाठ्यचर्या भी आज इससे प्रभावित है। हम उसमें ऐसे तथ्यों को स्थान नही देते जिन्हें बिना अनुभव के स्वीकार करना पड़े। इस तरह आज विज्ञान भी पाठ्यचर्या निर्माण का आधार माना जाता है।

7. समय की माँग 

हम जानते है कि समाज परिवर्तनशील है, उसके चिन्तन एवं स्वरूप मे परिवर्तन होता रहता है, उसके शासनतंत्र और अर्थतन्त्र मे परिवर्तन होता रहता है और तदनुकूल उसकी माँगों में परिवर्तन होता रहता है। इतना ही नही अपितु किसी भी समाज के सामने सदैव नई-नई समस्याएं उपस्थित होती रहती है जिनका उसे समाधान करना होता है और इस सबके लिए उसे शिक्षा का सहारा लेना पड़ता है, उसके उद्देश्यों एवं पाठ्यचर्या में तदनुकूल परिवर्तन करते होते है। उदाहरण के लिए अपने भारतीय समाज को ही लीजिए। कल तक इसमें आध्यात्मिक चिन्तन प्रबल था आज भौतिक चिन्तन प्रबल है। कल तक यह वर्णव्यवस्था की जंजीरों में जकड़ा था आज वर्ण बन्धक ढीले पड़ गए है। कल तक यहाँ धर्म अन्धविश्वासों पर आधारित था अब वह विवेक पर आधारित होता जा रहा है। कल तक हम राष्ट्रीयता की बात करते थे, आज राष्ट्रीयता के साथ-साथ अन्तरराष्ट्रीय अवबोध की भी बात करते है। जहाँ तक समस्याओं की बात है कल तक हमारे सामने खाद्यान्न की समस्या मुख्य थी आज जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण प्रदूषण की समस्याएं मुख्य है। इत्यादि। तब कहना न होगा कि किसी भी समाज की किसी भी स्तर की शिक्षा की पाठ्यचर्या के निर्माण का एक आधार समय की माँग होना चाहिए, वह ऐसी होनी चाहिए कि समय की माँगों की पूर्ति कर सकें।

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