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8/01/2021

पाठ्यचर्या निर्माण के सिद्धांत

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पाठ्यचर्या निर्माण के सिद्धांत 

pathyacharya nirman ke siddhant;पाठ्यचर्या निर्माण में विभिन्न प्रवृत्तियों, विधियों, अभिक्रियाओं आदि के आधार पर कुछ सिद्धांतों की उत्पत्ति हुई है। पाठ्यचर्या निर्माण में सिद्धांत शिक्षा की आवश्यकताओं तथा लक्ष्यों की पूर्ति करते है। पाठ्यचर्या निर्माण के सिद्धांत निम्नलिखित है-- 

1. शैक्षिक उद्देश्यों से अनुरूपता का सिद्धांत 

पाठ्यचर्या शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन है। अतः पाठ्यचर्या का निर्माण करते समय शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान मे रखना चाहिए। पाठ्यचर्या मे उन्ही विषयों और क्रियाओं का समावेश किया जाना चाहिए जो शिक्षा के उद्देश्यों के अनुकूल हों।

2. बाल-केन्द्रियता का सिद्धांत 

मनोविज्ञान के अनुसार पाठ्यचर्या बाल-केन्द्रित होनी चाहिए। पाठ्यचर्या-निर्माण मे बालक की रूचियों, आवश्यकताओं, क्षमताओं, योग्यताओं, मनोवृत्तियों, बुद्धि एवं आयु का ध्यान रखना चाहिए। इसके लिये पाठ्यचर्या का नियोजन विभिन्न वर्गों मे किया जाना चाहिए। उन वर्गों मे उनके विषयों का समावेश हो जिससे छात्र अपनी रूचि के अनुसार विषय एवं क्रियाओं का चुनाव कर सके।

3. रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों के उपयोग का सिद्धांत 

पाठ्यचर्या मे ऐसे अवसर प्रदान किये जाने चाहिए जिससे बालकों की रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों का अधिकाधिक मात्रा में उपयोग किया जा सके। इसके लिये बालको को कार्यों के प्रति अभिप्रेरित कर उन्हें उचित निर्देशन प्रदान करना चाहिए।

4. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धांत 

सभी व्यक्ति क्षमता की दृष्टि से एक-दूसरे से पृथक होते है। अर्थात् पाठ्यचर्या-निर्माण में वैयक्तिक भिन्नता, रूचि, क्षमता आदि का ध्यान रखना चाहिए।

5. मनोविज्ञानिकता का सिद्धांत 

मनोवैज्ञानिकता के सिद्धांत से यहाँ पर आशय है कि बालको के मनोविज्ञान को समझना जरूरी है। बालको के मनोविज्ञान को समझ कर उनके व्यवहार के विषय मे जानकारी प्राप्त करके, पाठ्यचर्या निर्माण प्रारंभ करना चाहिए। इसके लिए अभिभावकों एवं शिक्षकों से एवं स्वयं छात्रों से उनकी आवश्यकताओं तथा अधिगम मे आने वाली समस्याओं को ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार प्रचलित पाठ्यचर्या मे प्रश्नावली, समाजमीति, निरीक्षण, साक्षात्कार, मौखिक परीक्षण, लिखित परीक्षण आदि द्वारा उपयुक्त आँकड़े प्राप्त करके औचित्यपूर्णता के साथ उपयोगी सुधार किए जा सकते है जिनका लाभ छात्रों तथा शिक्षकों को प्राप्त होगा। 

6. खेल तथा क्रिया का सिद्धांत 

शिक्षा जीवन का पर्याय है अतः बालक के जीवन में आने वाली क्रियाओं एवं प्रवृत्तियों, खेल-कूद, लेखन तथा नवीन सृजन के अवसर दिये जाने चाहिए।

7. संस्कृति एवं सभ्यता के ज्ञान का सिद्धांत 

शिक्षा का एक उद्देश्य संस्कृति एवं सभ्यता का संरक्षण एवं विकास करना है। अतः पाठ्यचर्या में संस्कृति एवं सभ्यता से संबंधित विषयों वस्तुओं एवं क्रियाओं को शामिल किया जाना चाहिए जिससे बालकों को अपनी सभ्यता तथा संस्कृति की जानकारी प्राप्त हो सके।

8. लचीलेपन का सिद्धांत 

पठ्यचर्या मे लचीलापन होना चाहिए जिससे आवश्यकतानुकूल पाठ्यचर्या मे परिवर्तन किया जा सके। इसके लिये शिक्षक व शिक्षण संस्थाओं को एक अधिकार होना चाहिए कि वे पाठ्यचर्या में आवश्यकता के अनुरूप सुधार कर सकें।

9. सामुदायिक जीवन से संबंध का सिद्धांत 

माध्यमिक शिक्षा आयोग ने इस संबंध मे कहा है कि," पाठ्यचर्या सामुदायिक जीवन से सजीव एवं अनिवार्य अंग के रूप से संबंधित होनी चाहिए।" यह जरूरी है कि पाठ्यचर्या का निर्माण करते समय सामाजिक प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वाओं, मूल्यों एवं समस्याओं को ध्यान मे रखा जाना चाहिए। 

10. अवकाश के लिए प्रशिक्षण का सिद्धांत 

पाठ्यचर्या इस प्रकार की हो जो बालक को कार्य एवं अवकाश दोनों के लिए प्रशिक्षित कर सके। जिससे छात्र गलत दिशा की ओर न मुड़े। इसीलिए पाठ्यचर्या में अध्ययन-विषयों के अलावा खेल-कूद, सामुदायिक कार्य एवं अन्य उपयोगी क्रियाओं को शामिल किया जाना चाहिए।

11. सामाजिकता का सिद्धांत

पाठ्यचर्या के निर्माण के समय पाठ्यचर्या निर्माताओं एवं विशेषज्ञों को सामाजिक परिस्थितियों एवं स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए। वे सभी मान्यताओं आदर्शों, समस्याओं एवं आवश्यकताओं को पाठ्यचर्या में स्थान दे। सामाजिकता के सिद्धांत के संदर्भ में कोठारी आयोग, मुदालियर आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, नई शिक्षा नीति की हमेशा ही सकारात्मक संस्तुति हमारे समक्ष उपस्थित है। उपरोक्त सभी आयोगों एवं शिक्षा नीतियों की अनुशंसा से पाठ्यचर्या में कई उचित सुधार किए गए है। 

12. जनतंत्रीय भावना के विकास का सिद्धांत 

भारत एक लोकतंत्रात्मक देश है अतः इस व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण हेतु नागरिकों में जनतान्त्रिक मूल्यों का विकास किया जाना चाहिए। इसके लिये जरूरी है कि पाठ्यचर्या में जनतंत्रीय भावना एवं आदर्शों का समन्वय किया जाये।

13. अनुभवों पर आधारित सिद्धांत 

शिक्षा जगत के अलावा भी अन्य क्षेत्रों के व्यक्तियों के अनुभव अति मूल्यवान होते है। इसी प्रकार पाठ्यचर्या के विषय में मनुष्यों के अनुभवों का विश्लेषण जरूरी है अथवा यह कहा जाना चाहिए कि पाठ्यचर्या में अनुभवों को स्थान मिलना जरूरी है। आधुनिक समय में परम्परागत विषयों की महत्ता कम हुई है चूँकि इनका स्थान नवीन, विषयों ने ले लिया है किन्तु इसका यह अर्थ नही है कि उन विषयों के महत्व को विस्मृत कर दिया जाए। विद्यालय की क्रियाएँ, व्यावहारिकताएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालयों, छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों के साथ औपचारिक एवं अनौपचारिक संबंध बनाए रखना एवं उनके अनुभवों को पाठ्यचर्या में स्थान देना चाहिए जिससे कि भविष्य के छात्रों को आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त हो सके।

14. सह-संबंध का सिद्धांत

पाठ्यचर्या-निर्माण मे इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि एक विषय की शिक्षा दूसरे विषय की शिक्षा का आधार बने। वर्तमान समय में सभी शिक्षाशास्त्री इस सिद्धांत पर विशेष बल देते है।

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