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7/29/2021

पाठ्यक्रम के उद्देश्य, प्रभावित करने वाले घटक/कारक

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पाठ्यक्रम के उद्देश्य (pathyakram)

शिक्षा की प्रक्रिया के तीन मुख्य घटक होते है-- 

(अ) शिक्षक, (ब) शिक्षार्थी तथा (स) पाठ्यक्रम।

शिक्षण में शिक्षक तथा छात्र के मध्य अन्तःक्रिया पाठ्यक्रम के माध्यम से होती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षण की क्रियाओं को दिशा प्रदान करते है। 

इन तीनों घटकों की पारस्परिक अन्तःप्रक्रिया बालक का विकास किया जाता है। शिक्षण में तीनों घटकों का विशेष महत्व होता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षा का महत्वपूर्ण साधन है, शिक्षक साध्य तथा छात्र साधक होता है। पाठ्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है-- 

1. पाठ्यक्रम बालक के संपूर्ण विकास हेतु साधन प्रदान करता है, जिसकी सहायता से शिक्षण की क्रिया को संपादित किया जाता है।

2. पाठ्यक्रम को मानव जाति के अनुभवों को सम्मिलित रूप से स्पष्ट करके संस्कृति तथा सभ्यता का हस्तांतरण एवं विकास करना।

3. पाठ्यक्रम को बालक में मित्रता, ईमानदारी, निष्कपटता, सहयोग, सहनशीलता, सहानुभूति एवं अनुशासन आदि गुणों को विकसित करके नैतिक चरित्र का निर्माण करना।

4. पाठ्यक्रम को बालक की चिन्तन, मनन, तर्क तथा विवेक एवं निर्णय आदि सभी मानसिक शक्तियों का विकास करना।

5. पाठ्यक्रम को बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं से संबंधित सभी आवश्यकताओं, मनोवृत्तियों तथा क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार नाना प्रकार की सर्जनात्मक तथा रचनात्मक शक्तियों का विकास करना।

6. पाठ्यक्रम को सामाजिक तथा प्राकृतिक विज्ञानों एवं कलाओं तथा धर्मों के आवश्यक ज्ञान द्वार ऐसे गतिशील तथा लचीले मस्तिष्क का निर्माण करना चाहिए जो प्रत्येक परिस्थित में साधनपूर्ण तथा साहसपूर्ण बनकर नवीन मूल्यों का निर्माण करे।

7. पाठ्यक्रम को ज्ञान तथा खोज की सीमाओं को बढ़ाने के लिए अन्वेषकों का सृजन करना।

8. पाठ्यक्रम को विषयों तथा क्रियाओं के बीच की खाई को पाटकर बालक के सामने ऐसी क्रियाओं को प्रस्तुत करना जो उसके वर्तमान तथा भावी जीवन के लिये उपयोगी हों।

9. पाठ्यक्रम का उद्देश्य बालक में जनतंत्रीय भावना का विकास करना है।

10. पाठ्यक्रम का उद्देश्य शिक्षण क्रियाओं तथा शिक्षक तथा छात्र के मध्य अन्तःप्रक्रिया के स्वरूप निर्धारित करना है। 

पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटक/कारक 

pathyakram ko prabhavit karne wale karak;पाठ्यक्रम का सम्पादन शैक्षिक तथा सामाजिक परिस्तियों में किया जाता है। इसीलिए शैक्षिक तथा सामाजिक घटक पाठ्यक्रम को प्रभावित करते है। पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटको का विवेचन निम्नलिखित है-- 

1. शिक्षा व्यवस्था 

शिक्षा के इतिहास से यह विदित होता है कि अतीत काल से ही शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम का गहन संबंध रहा है और ये एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे है। पाठ्यक्रम का प्रारूप लचीला तथा परिवर्तनशील रहा है। छोटे बालकों का पाठ्यक्रम अनुभव केन्द्रित रहा है। माध्यमिक स्तर का विषय-केन्द्रित रहा है। शिक्षा व्यवस्था के बदलने के साथ पाठ्यक्रम का प्रारूप भी बदल जाता है। 

2. परीक्षा प्रणाली 

परीक्षा प्रणाली पाठ्यक्रम को प्रभावित करती है। निबन्धात्मक परीक्षा के पाठ्यक्रम का स्वरूप वस्तुनिष्ठ परीक्षा से बिल्कुल ही भिन्न प्रकार होता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षा में पाठ्यक्रम के सूक्ष्म पाठ्यक्रम पर ही प्रश्न पूछे जाते है। जबकि निबन्धात्मक परीक्षा में पाठ्यक्रम के व्यापक-स्वरूप पर प्रश्न पूछे जाते है। निबन्धात्मक परीक्षा से उच्च उद्देश्यों का मापन किया जाता है जबकि वस्तुनिष्ठ से निम्न उद्देश्यों का ही मापन किया जा सकता है। 

4. शासन पद्धति 

शिक्षा द्वार राष्ट्र तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। शासन प्रणाली बदलने से पाठ्यक्रम के प्रारूप को बदलना होता है। केन्द्र तथा राज्य स्तर पर पार्टी की सत्ता बदलने से भी पाठ्यक्रम के प्रारूप पर प्रभाव पड़ता है। पाठ्यक्रम के विशिष्ट प्रारूप केन्द्रीय सरकार प्रभावित करती है। भारत में शिक्षा राज्य या प्रदेश द्वार व्यवस्थित की जाती है। इसीलिए शिक्षा का राष्ट्रीय प्रारूप नही है। सभी प्रदेशों के पाठ्यक्रम के प्रारूप विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग है।

4. अध्ययन समिति

पाठ्यक्रम के प्रारूप का निर्माण अध्ययन समितियों द्वार किया जाता है। विभिन्न स्तरों पर अध्ययन समितियों के द्वार पाठ्यक्रम का निर्माण तथा सुधार किया जाता है। अध्ययन समिति के सदस्य सूझ-बूझ तथा अनुभवों द्वार ही पाठ्यक्रम के प्रारूप को विकसित करते है। इसलिए इन सदस्यों की अभिरूचियों, अभिवृत्तियों तथा मानसिक क्षमताओं का सीधा प्रभाव पड़ता है। साधारणतः अध्ययन समिति के अध्यक्ष ही पाठ्यक्रम का प्रारूप बनाते है और बदलते है। अन्य सदस्य मात्र अनुमोदन ही करते है।

5. राष्ट्रीय आयोग तथा समितियाँ 

शिक्षा सुधार और विकास हेतु राष्ट्रीय स्तर के आयोग तथा समितियाँ गठित की जाती है। भारत में स्वतंत्रता के बाद से अनेक आयोग तथा समितियाँ गठित की गई है। उन्होंने विश्वविद्यालय, माध्यमिक शिक्षा, प्राथमिक स्तर पर सुधार के लिये सुझाव दिये और उन सुझावों को लागू करने का प्रयास किया गया जिससे पाठ्यक्रम के प्रारूप को भी बदलना पड़ा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में व्यावसायिक शिक्षा को अधिक महत्व दिया है। इसलिए माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रारूप विकसित किया गया है। शिक्षा के आयोगों तथा समितियों के सुझाव के आधार पर भी पाठ्यक्रम का प्रारूप प्रभावित होता है।

6. सामाजिक परिवर्तन 

सामाजिक परिवर्तन से आर्थिक परिवर्तन की गति अधिक तीव्र होती है  इसलिए ये आर्थिक तथा भौतिक परिवर्तन भी पाठ्यक्रम को प्रभावित करते है। पाठ्यक्रमों के साथ तकनीकी के प्रशिक्षण (कम्प्यूटर) आदि संबंधी नये पाठ्यक्रम विकसित किये जा रहे है। शिक्षा के अंतर्गत दूरवर्ती शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ है जिसमें माध्यमों तथा सम्प्रेषण विधियों को विशेष महत्व दिया जाता है।

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