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7/29/2021

पाठ्यक्रम के प्रकार

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पाठ्यक्रम के प्रकार 

pathyakram ke prakar;पाठ्यक्रम का संगठन भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है। विभिन्न दृष्टिकोण के कारण ही विद्वानों ने पाठ्यक्रम के अनेक प्रतिमान विकसित किये है। इसी के आधार पर पाठ्यक्रम के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित है-- 

1. विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम 

विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते है जिसमें बालकों की अपेक्षा विषयों को अधिक महत्व दिया जाता है। चूँकि इस प्रकार के पाठ्यक्रम मे पुस्तकों कि विशेष महत्व है इसलिए इस पाठ्यक्रम को पुस्तक केन्द्रित पाठ्यक्रम के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार के पाठ्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न विषयों के ज्ञान को अलग-अलग रूपे में प्रदान करना होता है। इस पाठ्यक्रम मे सभी विषयों के ज्ञान को अलग-अलग निश्चित कर लिया जाता है तथा उसी के अनुसार पुस्तके तैयार कर ली जाती है। इन्ही पुस्तकों से बालक विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करते है। इसमे बालको की अपेक्षा विषय-ज्ञान को अधिक महत्व दिया जाता है। 

विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम के गुण 

विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम के निम्न गुण है--

1. यह परम्परागत ज्ञान को आगे बढ़ाने का सुविधाजनक तथा सबसे अच्छा साधन है।

2. इस पाठ्यक्रम से छात्र को ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ उसे सुदृढ करने तथा जीवन की विभिन्न स्थितियों मे प्रयुक्त कर सकने की सुविधा होती है। 

3. इस प्रकार के संगठन से पाठ्यक्रम से संबंधित सभी पक्ष (शिक्षक, छात्र, विषय विशेषज्ञ, अभिभावक, सामान्य नागरिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता इत्यादि) भली-भाँति परिचित होते है। अतः वे सभी पाठ्यक्रम नियोजन, संवर्धन एवं संशोधन आदि हेतु उचित सहयोग प्रदान कर सकते है। 

5. इस पाठ्यक्रम में अध्ययन-अध्यापन में सुनिश्चित होती है।

6. इस प्रकार के पाठ्यक्रम मे कार्य करने, परिवर्तन करने तथा संशोधन करने की पर्याप्त सुविधा और क्षमता होती है। 

7. इस प्रकार के पाठ्यक्रम को शिक्षक एवं छात्र दोनों पसंद करते है। 

8. इसमे नवीन ज्ञान की खोज करने तथा तथ्यों को उपयोगी क्रम में व्यवस्थित करने में भी सुविधा होती है।

9. इस पाठ्यक्रम में अध्ययन-अध्यापन में सुनिश्चितता होती है।

विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम की सीमाएं अथवा दोष 

विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम की निम्न सीमाएं है--

1. यह अपेक्षित व्यवहारगत उद्देश्यों को सीमित कर देता है। 

2. इस प्रकार के पाठ्यक्रम में ज्ञान को अंशों में बाँट दिया जाता है। अतः ज्ञान के छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट जाने से उसका समुचित उपयोग कर पाना कठिन हो जाता है। 

3. इसमें अधिगम अनुभवों का विस्तार क्षेत्र सीमित हो जाता है। 

4.  यह छात्रों को, विशेष रूप से अपरिपक्व तथा मंद गति से सीखने वालों को सार्थक एवं महत्वपूर्ण अधिगम अनुभव उपलब्ध नही करा पाता।

5. इस पाठ्यक्रम मे छात्रों से अध्ययन विषयों के प्रति बहुत अधिक निष्ठावान होने की अपेक्षा की जाती है। 

6. इससे अधिगम का स्थानांतरण सरलता से तथा प्रभावी रूप से संभव नही हो पाता है।

7. इसमे प्रत्येक विषय के लिए समय-सीमा का निर्धारत होना अधिगण के बाधक होता है। 

8. इसमें किसी नवीन अन्तर्वस्तु को समाविष्ट करना कठिन होता है।

9. इस प्रकार के पाठ्यक्रम में अमूर्तीकरण एवं तार्कि विवेचन पर अधिक बल दिया जाता है जो अनुकूलन मे बाधक भी सिद्ध होते है। 

10. इसमे लचीला एवं कल्पनापूर्ण शिक्षण असंभव नही तो कठिन जरूर होता है। 

11. चूँकि प्राथमिक शिक्षक सामान्य शिक्षकों के रूप में तैयार किये जाते है, विषय-विशेषज्ञों के रूप में नही। अतः प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इस उपागम में विशेष कठिनाई होती है।

12. मानव ज्ञान के बढ़ते हुए विशाल भण्डार के परिणामस्वरूप विषय आधारित पाठ्यक्रमों का संगठन बहुत जटिल होता जा रहा है।

2. परम्परागत या शास्त्रीय पाठ्यक्रम 

परम्परागत या शास्त्रीय पाठ्यक्रम मे शिक्षा के प्रति परम्परागत दृष्टिकोण देखने को मिलता है। इस पाठ्यक्रम मे आध्यात्मिक एवं नैतिक जीवन के विकास पर बल दिया जाता है। इस पाठ्यक्रम के उदाहरण प्राचीन यूनान के विद्यालय तथा भारतीय गुरूकुल है। इसके अंतर्गत शास्त्रीय भाषाओं, दर्शन, ज्योतिष, गणित, व्याकरण, अध्यात्मशास्त्र, धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यह पाठ्यक्रम विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम का ही एक रूप है। वर्तमान समय में सामान्य विद्यालयों मे इस पाठ्यक्रम की कोई उपयोगिता नही मानी जाती है। कुछ विशिष्ट विद्यालयों (गुरूकुलों, संस्कृत पाठशालाओं, अरबी मदरसों आदि) में इस प्रकार के पाठ्यक्रम का अभी भी प्रचलन है, किन्तु दिन-प्रतिदिन इसकी उपयुक्तता पर प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है। अतः इस पाठ्यक्रम का प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। 

3. बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम 

बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहा जाता है जिसमें विषयों की अपेक्षा बालक को अधिक महत्व दिया जाता है। ऐसे पाठ्यक्रम का निर्माण बालक की विभिन्न अवस्थाओं की रूचियों, आवश्यकताओं, क्षमताओं तथा योग्यताओं के अनुसार किया जाता है जिससे व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता रहे। जेम्स एम. ली ने बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम को इस प्रकार परिभाषित किया है," छात्र-केन्द्रित पाठ्यक्रम वह है जो पूर्णतः और समग्र रूप में सीखने वाले में निहित है।" मान्टेसरी, किन्डरगार्टन तथा योजना पद्धतियाँ बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम के उदाहरण है।

4. कार्य-केन्द्रित पाठ्यक्रम 

कार्य केन्द्रित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहा जाता है जिसमें विषयों के विभिन्न कार्यों को विशेष स्थान दिया जाता है। जाॅन डीवी का मत है कि कार्य-केन्द्रित पाठ्यक्रम द्वार बालक समाज उपयोगी कार्यों को करने में रूचि लेने लगता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होना निश्चित है।

5. जीवन की स्थायी स्थितियों पर आधारित पाठ्यक्रम 

जेम्स एम. ली के अनुसार," जीवन की स्थायी स्थितियों पर आधारित पाठ्यक्रम उन अनवरत रूप से चलने वाली स्थितियों में निहित है जिनमें प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को अपने विकास के प्रत्येक स्तर पर समाज में पाता है।" जेम्स एम. ली ने जीवन की इन स्थितियों को तीन भागों में विभाजित किया है-- 

1. वैयक्तिक क्षमताओं के विकास से संबंधित स्थितियाँ 

इसके अंतर्गत स्वास्थ्य, बौद्धिक शक्ति, सौन्दर्यत्मक अभिव्यक्ति, मूल्यांकन तथा नैतिक शक्तियों के विकास से संबंधित स्थितियों को स्थान दिया जाता है। 

2. सामाजिक सहभागिता के विकास से संबंधित स्थितियाँ 

इसके अंतर्गत व्यक्ति, व्यक्ति के संबंधों, सामूहिक संबंधों तथा अन्तः सामूहिक संबंधों के विकास से संबंधित स्थितियों को सम्मिलित किया जाता है।

3. वातावरण से संबंधित कारकों एवं शक्तियों के प्रति प्रतिक्रिया क्षमता से संबंधित स्थितियाँ 

इस प्रकार की स्थितियों में प्राकृतिक घटनाओं, प्रौद्योगिक से प्राप्त साधनों, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थितियों को स्थान दिया जाता है।

इस प्रकार के पाठ्यक्रम का सूत्रपात एफ. बी. स्ट्रेटमेयर (F.B. Stratemeye) के विचारों से हुआ। यह पाठ्यक्रम बालकों की तात्कालिक आवशयकताओं एवं हितों पर आधारित होता है। ये आवश्यकतायें एवं हित जीवन की स्थायी स्थितियों के क्षेत्र में निहित है। यह पाठ्यक्रम बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम से बहुत समानता रखता है।

6. जीवन समायोजन पाठ्यक्रम 

विद्यालयों की सामान्यतः इस बात को लेकर आलोचना की जाती है कि उनमें प्रदान की जाने वाली शिक्षा का वास्तविक जीवन से कोई संबंध नही होता है, जिसके कारण बालकों को सामाजिक जीवन में समायोजित होनें में कठिनाई होती है। अन्य देशों की तरह अमेरिकी विद्यालयों को भी ऐसी आलोचना का केन्द्र बनना पड़ा। अमेरिकी विद्यालयों के बारे में दूसरी बात यह भी कही गयी कि पचलित व्यवस्था में विद्यालयों एवं समुदाय दोनों के उपलब्ध साधनों का समुचित उपयोग नही हो पाता है।

अतः विद्यालयों एवं स्थानीय समुदाय में घनिष्ठ संबंध स्थापित करने तथा उन्हें उपलब्ध साधनों का पारस्परिक रूप से अधिकतम उपयोग करने पर बल प्रदान किया गया तथा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सामुदायिक विद्यालयों (Community Schools) की स्थापना की गयी। ऐसे विद्यालयों के दो रूप विकसित हुए-- 

एक-- विद्यालयी प्रबंध, सामुदायिक स्त्रोतों तथा सामुदायिक प्रयोजनाओं के द्वार सामुदायिक जीवन की शिक्षा देने वाले विद्यालय।

दो-- अपने साधनों, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों, सामुदायिक जीवन में सक्रिय रहने वाले शिक्षकों की सहायता से सामुदायिक केंद्र के रूप में कार्य करने वाले विद्यालय अर्थात् बालकों के साथ-साथ पूरे समुदाय की सेवा करने वाले विद्यालय।

जीवन समायोजन पाठ्यक्रम के अंतर्गत स्वास्थ्य, नागरिकता, व्यावसायिक ज्ञान, गृह सदस्यता तथा अवकाशकालीन क्रियाओं को विशेष महत्व दिया गया। इस प्रकार के पाठ्यक्रम 1940 के बाद विकसित हुए तथा एक दशक के अंदर 1950 ही लुप्तप्राय भी हो गये। क्रग के अनुसार," जीवन समायोजन पाठ्यक्रम के शीघ्र लुप्त होने का प्रमुख कारण उसके आलोचकों द्वार उसे बौद्धिकता विरोधी घोषित करना था। 

7. सुसम्बध्द पाठ्यक्रम

सुसम्बद्ध पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को का जाता है  जिसमें विभिन्न विषयों को अलग-अलग न पढ़ा कर एक दूसरे से संबंधित करके पढ़ाने की व्यवस्था होती है। वस्तुस्थिति यह है कि ज्ञान एक इकाई है। अतः सुसम्बद्ध पाठ्यक्रम इस बात पर बल देता है कि बालक के सामने ज्ञान को विभिन्न विषयों में अलग-अलग न बांट कर संबंधित रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 

8. आवश्यकता-विकास पाठ्यक्रम 

आवश्यकता-विकास पाठ्यक्रम के अंतर्गत सर्वप्रथम बालकों की मूलभूत आवश्यकताओं को निर्धारित किया जाता है तथा उसके बाद इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयुक्त क्रियाओं एवं अनुभवों का आयोजन किया जाता है। इन आवश्यकताओं में प्रमुख रूप से शारीरिक, मानसिक, भवात्मक तथा सामाजिक आवश्यकतायें सम्मिलित होती है। बालकों की इन आवश्यकताओं को कुछ विद्वान विकास-प्रक्रिया का अंग मानते है। इनके अनुसार बालक विकास के कई क्रमिक चरणों से होकर गुजरते है। इस योजना के अंतर्गत बालकों की आवश्यकताओं को उसी क्रम में पूर्ण करने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए इस योजना को आवश्यकता विकास का पाठ्यक्रम का नाम दिया गया है। 

9. मूल पाठ्यक्रम 

कोर-पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते है जिसमें कुछ विषय तो अनिवार्य होते है तथा अधिक विषय ऐच्छिक। अनिवार्य विषयों का अध्ययन करना प्रत्येक बालक के लिए अनिवार्य होता है तथा ऐच्छिक विषयों को व्यक्तिगत रूचियों तथा क्षमताओं अनुसार चुना जा सकता है। यह पाठ्यक्रम अमरीका की देन है। इसके अंतर्गत प्रत्येक बालक को व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की समस्याओं के संबंध मे ऐसे अनुभव प्रदान किये जाते है जिनके द्वार अपने भावी जीवन मे आने वाली प्रत्येक समस्या को सरलतापूर्वक सुलझाते हुए कुशल तथा समाजोयोगी एवं उत्तम नागरिक बन जाए। इस पाठ्यक्रम का लक्ष्य व्यक्ति तथा समाज दोनों का अधिक से अधिक विकास करना है। 

मूल पाठ्यक्रम की विशेषताएं 

1. इसके अंतर्गत कई विषयों को एक साथ पढ़ाया जाता है।

2. इस पाठ्यक्रम मे विभिन्न विषयों को पढ़ाने का समय निश्चित होता है। 

3. यह पाठ्यक्रम बाल-केन्द्रित है।

4. इस पाठ्यक्रम द्वार बालकों को कार्यों के द्वार सामाजिक समस्याओं के सुलझाने का अभ्यास कराया जाता है।

10. नियंत्रित समस्या-आधारित पाठ्यक्रम 

आवश्यकता आधारित पाठ्यक्रम की बहुत अधिक कमियों के कारण उसे अपनाने में बहुत कम रूचि दिखलाई गयी। इन कमियों को दूर करने के उद्देश्य से बालकों की समस्याओं को नियंत्रित करने की योजना बनायी गयी। इस योजना के अंतर्गत सम्बन्धित छात्रों द्वार अनुभूत समस्याओं को नियन्त्रित करके, उसके आधार पर पाठ्यक्रम को नियोजित करने के प्रयास किये जाते है। इसीलिए इसे नियंत्रित समस्या आधारित पाठ्यक्रम कहा जाता है।

11. व्यवसाय-केन्द्रित पाठ्यक्रम 

कुछ विद्यालयों में बालकों को व्यावसायिक एवं तकनीकी कार्य भी सिखाये जाते है। इस प्रकार के कार्यों से संबंधित पाठ्यवस्तु को व्यवसाय केन्द्रित पाठ्यक्रम अथवा व्यावसायिक एवं तकनीकी पाठ्यक्रम कहा जाता है। इसमें प्रमुख रूप से कौशल का विकास किया जाता है। वर्तमान समय की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तथा रोजगार की गारण्टी होने से इस प्रकार के पाठ्यक्रमों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। विशिष्ट विद्यालयों के अतिरिक्त सामान्य विद्यालयों में भी इस प्रकार के पाठ्यक्रम लागू किये जा रहे है।

12.  शिल्पकला-केन्द्रित पाठ्यक्रम 

शिल्पकला-केन्द्रित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते हैं जिसमें विभिन्न प्रकार की शिल्प-कलाओं जैसे-- कताई, बुनाई, चमड़े तथा लकड़ी के काम आदि को केन्द्र मानकर दूसरे विषयों की शिक्षा दी जाये। हमारे देश की वर्तमान 'बेसिक शिक्षा' में इस प्रकार के पाठ्यक्रम का विशेष महत्व है।

13. पूर्णतया मुक्त पाठ्यक्रम 

पाठ्यक्रम का सबसे अधिक लचीला उपागम एमर्जिंग करीक्यूलम अथवा पूर्णतया मुक्त पाठ्यक्रम के रूप में प्रकाश में आया है। ऐसे पाठ्यक्रम की कोई संगठनात्मक संरचना नही होती है। वास्तव में मानव जीवन की क्रियाओं अर्थात् जीवन प्रवृत्तियों पर आधारित पाठ्यक्रम के विभिन्न रूप विकसित हुए है। इनमें अनुभव पाठ्यक्रम के नाम से प्रचारित पूर्णतया संरचनाविहीन पाठ्यक्रम से लेकर आवश्यकता पाठ्यक्रम के नाम से प्रचलित संरचित पाठ्यक्रम तक सम्मिलित है। इस प्रकार संरचनात्मक पाठ्यक्रम क्रिया-आधारित पाठ्यक्रम का ही एक रूप है। 

14. एकीकृत पाठ्यक्रम 

पूर्ण अर्थ देने वाले विचार ही मस्तिष्क में टिकते है। कोई विचार या क्रिया तभी प्रभावशाली और उपयोगी होती है जब उसके विभिन्न भागों या पक्षों में एकता होती है। इसमें विभिन्न विषयों के ज्ञान को अलग-अलग खंडों में न प्रस्तुत करके सब विषयों को मिलाकर ज्ञान की एक इकाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हैण्डरसन के अनुसार," एकीकृत पाठ्यक्रम वह है जिसमें विषयों के बीच कोई अवरोध रूकावट या दीवार नही होती।

15. अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम 

अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते है, जिसमें बालक के विकास के लिए अनुभवों को विशेष महत्व दिया जाता है। दूसरे शब्दों में अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम विषयों की बजाय अनुभवों पर आधारित होता है।

अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम के गुण 

अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम के निम्न गुण है-- 

1. यह मनोवैज्ञानिक है अर्थात् एक पाठ्यक्रम का बालकों की रूचियों, आवश्यकताओं, एवं योग्यताओं से संबंध होता है।

2. यह लचीला एवं प्रगतिशील होता है।

3. इसके द्वार बालक का सर्वांगीण विकास संभव है।

4. यह भौतिक एवं सामाजिक वातावरण का अधिक से अधिक प्रयोग करता है।

5. इसका आधार भी जनतान्त्रिक होता है।

6. अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम द्वार स्कूल तथा समाज में संबंध स्थापित किया जाता है।

7. यह बालकों की मानसिक तथा सार्वजनिक योग्यताओं को विकसित कर, उनमें नेतृत्व तथा स्वानुशासन का विकास करता है।

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