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7/29/2021

पाठ्यक्रम की प्रकृति, क्षेत्र

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पाठ्यक्रम की प्रकृति 

pathyakram ki prakriti;पाठ्यक्रम के स्वरूप को अच्छी तरह से समझने के लिए हमें अपना दृष्टिकोण शिक्षा के विकास की ओर करना होगा प्राचीन काल में शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह से अनौपचारिक होता था यानी कि शिक्षा किसी विधि एवं क्रम में बँधी हुई नही होती है। 

छात्रों की शिक्षा उनके परिवार एवं समाज की जीवनचर्या के मध्य चलती रहती थी तथा छात्र उसमे सहभागी बनकर प्रत्यक्ष अनुभव तथा निरीक्षण के माध्यम से तथा अपने बड़ो एवं पूर्वजों के अनुभव को सुनकर शिक्षा प्राप्त करते है। पाठ्यक्रम का अर्थ पाठ्यवस्तु से लिया जाता था। अतः इस प्रकार पाठ्यवस्तु को विद्यालय विषयों तक ही सीमित कर दिया जाता था। कक्षा-कक्ष के बाहर ग्रहण किये गये अनुभवों को पाठ्यक्रम का अंग नही माना जाता था, किन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव के ज्ञानराशि के संचित कोष मे निरंतर वृद्धि होती गई साथ ही साथ मानव के जीवन मे जटिलताएँ एवं विविधताएं भी आती है। जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के पास समय एवं साधन का अभाव होने लगा और उसकी शिक्षा अपूर्ण होने लगी। अतः सभी विकासशील समाजों ने अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से इसे विधिवत् एवं क्रमबद्ध बनाने के प्रयास शुरू कर दिए। विद्यालयों का विकास तथा उनकी स्थापान इसी के फलस्वरूप हुई। इस प्रकार समाज जो उपयोगी एवं महत्वपूर्ण ज्ञान अपने बालको को समुचित ढंग से नही दे पा रहा था उसने उसकी जिम्मेदारी योग्य एवं अनुभवी विद्वानों को दे दी। इन विद्यालयों द्वार बालकों को जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने तथा उन्हें समुचित ढंग से शिक्षा प्रदान करने के लिए जो ज्ञानराशि निश्चित एवं निर्धारित की गई अथवा वर्तमान मे की जाती है उसी को पाठ्यक्रम कहा जाता है। 

अतः इस प्रकार हम कह सकते है कि पाठ्यक्रम अध्ययन का ही एक क्रम है जिसके अनुसार चलकर छात्र अपना विकास करता है। अतः यदि शिक्षा की तुलना दौड़ से की जाए तो पाठ्यक्रम उस दौड़ के मैदान के समान है जिसे पार करके दौड़ने वाले अपने निश्चित लक्ष्य को प्राप्त कर लेते है। 

आधुनिक समय मे पाठ्यक्रम के स्वरूप में काफी परिवर्तन हो गये है। जहाँ प्राचीन अवधारण के अनुसार पाठ्यक्रम का अर्थ पाठ्यवस्तु की एक सूची के रूप में लगाया जाता था और पाठ्यवस्तु को अध्ययन विषय के नाम से जाना जाता था और पाठ्यवस्तु को विद्यालयी विषयों तक ही सीमित कर दिया गया था पर आज वर्तमान मे ऐसा नही रहा अब पाठ्यक्रम की परिभाषाएं काफी व्यापक हो चुकी है। इसमे केवल विद्यालयी विषयों को ही समाहित नही किया जाता वरन् बालक की अन्य सभी क्रियाओं तथा उसके अनुभवों को भी सम्मिलित किया जाता है जिनके लिए विद्यालय मार्गदर्शन करता है। आधुनिक समय मे पाठ्यक्रम को बहुत व्यापक रूप में देखा जाने लगा है और इसके अंतर्गत वे सभी क्रियाएं आ जाती है जो अतिरिक्ति पाठ्यक्रम क्रियाओं के नाम से प्रचलित थी। विद्यालयों का प्रमुख कार्य बालको को शिक्षा प्रदान करना होता है और इसको पूर्ण करने के लिए वहाँ पर जो कुछ भी किया जाता है उसे पाठ्यक्रम का नाम दिया जाता है। इसीलिए ‘पाठ्यक्रम’ को परिभाषित करते हुए एक विद्वान ने इसे हृाट ऑफ एजूकेशन (What of Education) कहा है। प्रथम दृष्टि में यह परिभाषा बहुत अधिक सरल एवं स्पष्ट प्रतीत होती है, परन्तु इस ‘हृाट’ की व्याख्या करना तथा कोई निश्चित उत्तर प्राप्त करना बहुत कठिन कार्य है। इस संदर्भ में अमेरिका के नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन (National Education Association) ने अपनी टिप्पणी निम्न प्रकार की है-- 

"विद्यालयों का कार्य क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर कई बार अनेक ढंग से दिया जा चुका है फिर भी बार-बार उठाया जाता है। कारण स्पष्ट है यह एक ऐसा शाश्वत प्रश्न है जिसका उत्तर अन्तिम रूप से कभी दिया ही नही जा सकता है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर प्रत्येक समाज एवं प्रत्येक पीढ़ी की बदलती हुई प्रकृति एवं आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहता है।"

इस प्रकार शिक्षा के इतिहास से भी इस बात की पुष्टि होती है कि समय के साथ-साथ पाठ्यक्रम मे भी परिवर्तन होते रहे है तथा इसमें कभी व्यापकता तथा कभी संकीर्णता आती रही है, परन्तु शिक्षाविदों को जब इस बात का आभास मिला कि विद्यालयों में शिक्षित युवक सदैव अपने भावी जीवन मे सफल नही हो पाते है तब यह निष्कर्ष निकाला गया कि जीवन की तैयारी के लिए पढ़ना-लिखना ही सब कुछ नही है। मनोविज्ञान के विकास ने भी इस धारणा को बल प्रदान किया कि केवल अध्ययन-अध्यापन पर ही पूरा ध्यान रखना बालकों के विकास की दृष्टि से न केवल एकांकी है, बल्कि अन्य प्रवृत्तियों के समुचित विकास के अभाव मे हानिप्रद भी हो सकता है। इस दृष्टिकोण का प्रभाव विद्यालयों के कार्यक्रमों पर पड़ा और उनमें व्यापकता आनी प्रारंभ हुई। अतः विद्यालयों मे पाठ्य-विषयो के साथ-साथ ऐसी प्रवृत्तियों का भी समावेश किया जाने लगा, जिनसे बालकों में बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ स्वास्थ्य, सौंदर्यबोध, सृजनात्मक तथा अन्य मानवीय एवं सामाजिक गुणों का समुचित विकास हो सके।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र 

pathyakram ka kshetra;समाज मे परिवर्तन तथा समय के साथ शिक्षा के उद्देश्यों मे भी परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार समय समाज तथा समय मे परिवर्तन होने के कारण पाठ्यक्रम मे परिवर्तन होना भी स्वभाविक है। शिक्षा के पाठ्यक्रम मे कभी विस्तार तो कभी संकुचन होता रहता है। पाठ्यक्रम का अर्थ उसके क्षेत्र पर निर्भर करता है और उसका क्षेत्र शिक्षा के लक्ष्य अथवा उद्देश्यों पर निर्भर रहता है। यदि शिक्षा का उद्देश्य सर्वांगीण विकास, सन्तुलित व्यक्तित्व या एकीकृत व्यक्तित्व का विकास मानते है तो हमें इस लक्ष्य की प्राप्ति इन विषयों या तथ्यों की जानकारी से न होगी, इसके लिये मानव-व्यवहार के ज्ञानात्मक, भावनात्मक और क्रियात्मक तीनों पक्षों का विकास करने के लिये परिस्थितियों का निर्माण करना होगा और उसकी क्रमबद्ध एवं निश्चित व्यवस्था करनी होगी। इसलिए सन्तुलित एवं एकीकृत व्यक्तित्व के निर्माण को दृष्टि मे रखकर पाठ्यक्रम का क्षेत्र ज्ञानात्मक विषयों सहित उन समस्त क्रिया-कलापों तक बढ़ा दिया गया है जो इस व्यापक लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकते है। 

अनेक ऐसे उदाहरण है जिनसे यह पता चलता है कि समय के साथ-साथ शिक्षा के उद्देश्य भी बदलते रहे और उद्देश्यों के साथ-साथ पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन होते रहे है। भारत के उदाहरण मे यदि हम वैदिक काल की शिक्षा को देखे तो यह पाते है कि शिक्षा का उद्देश्य ईश्वर-भक्ति और धार्मिक भावना को सुदृढ करना, बच्चों का चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करना और सामाजिक कुशलतायें लाना था। इसी कारण उस समय का पाठ्यक्रम भी अत्यंत व्यापक था। इस काल में लौकिक और सांसारिक दोनो प्रकार के ज्ञान दिये जाते थे। गुरूकुल शिक्षा प्रणाली प्रचलित थी। छात्र पूरे जीवन भर गुरू के परिवार मे रहता था। गुरू के ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही साथ शिष्य गुरू पत्नि एवं गुरू की सेवा मे लगा रहता था। गुरूकुल की सफाई, भोजन के लिए जंगल से लकड़ी लाना, पशुओं की सेवा करना तथा भिक्षाटन करना उसकी दैनिक क्रिया के अंतर्गत था। पठन-पाठन के साथ व्यावहारिक अनुभव भी कराये जाते थे। पठन-पाठन का समय कक्षा के घंटो तक ही सीमित नही था।

यदि हम भारतीय शिक्षा के इतिहास को देखें तो उससे यह पता चलता है कि शिक्षा के पाठ्यक्रम में कभी व्यापकता रही है तो कभी संकुचन रहा है। इसका प्रमाण हमें खेल-कूद की प्रवृत्ति में हुए परिवर्तन को देखने से पता लगता है। पहले खेल-कूद को अध्ययन के विषय से एक बिल्कुल पृथक माना जाता था। लेकिन खेल-कूद की उपयोगिता जीवन में कितनी है इसके महत्व का अनुभव होने पर यह कहा गया था कि विभिन्न विषयों को पढ़ना-लिखना ही सब कुछ नही है, खेल-कूद का भी महत्व है और आगे चलकर खेल-कूद को भी पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा मान लिया गया। इस सभी कारणों से पाठ्यक्रम मे ऐसी प्रवृत्तयों को भी सम्मिलित किया जाने लगा जिनसे ज्ञान के साथ ही स्वास्थय, सौन्दर्यबोध एवं सृजनशीलता जैसे गुणों का विकास हो।

हमने देखा कि पहले पाठ्यक्रम की विचारधार में निरंतर परिवर्तन होते रहे। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दौर से इसमें व्यापकता आने लगी और विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास होने लगा। आगे चलकर वर्तमान में तो विस्तार की गति और भी तीव्र हो गई है। 

पूर्व के पाठ्यक्रमों मे विषयों की एक निश्चित सीमा होती थी और शिक्षा का उद्देश्य केवल लक्ष्यों की सूचना मात्र देना होता था। लेकिन वर्तमान में शिक्षा-मनोविज्ञान, शिक्षा समाजशास्त्र और शिक्षा-दर्शन आदि व्यावहारिक विज्ञानों के विकसित हो जाने के कारण पाठ्यक्रम में अत्यंत परिवर्तन आ गया है। पाठ्यक्रम पर शिक्षण-अधिगम क्षेत्रों मे आये विचारगत परिवर्तनों का भी प्रभाव पड़े बिना नही रहा। पहले समझा जाता था कि शिक्षक जितना अधिक विद्वान होगा उसके छात्र भी उतने ही ज्ञानी अथवा विद्वान होंगे। परन्तु अब यह भी बात रही। वर्तमान मे हुए अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि नवीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिये बालक तैयार नही होता और उस ज्ञान को पूर्णरूप से ग्रहण कर उसे व्यवहार में लाने योग्य भी नही हो पाता। 

वर्तमान मे माना जाता है कि अधिगम परिक्वता से संबंधित होता है। अधिगम पर व्यक्तिगत भेद और प्रत्यक्ष अनुभवों की विशेष भूमिका होती है। बालकों को ज्ञान देना अब विद्यालयों का कार्य नही है बल्कि अब ऐसी परिस्थतियों का निर्माण करना अब उनका कार्य है जिसमें छात्र स्वयं अनुभव करके सीख सके। अतः अब पाठ्यक्रम क्रिया-आधारित हो गया है। 

अनुभव और क्रिया पर आधारित पाठ्यक्रम निर्माण में सबसे प्रथम प्रयास संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्जीनिया ने किया। इस राज्य के शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के ज्ञान से सूचना को निकाल कर संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना शिक्षा का लक्ष्य माना और वहाँ के पाठ्यक्रम में ऐसी व्यवस्था की गयी। यहाँ के शिक्षाशास्त्रियों के सामने प्रमुख दो प्रश्न थे-- पहला यह कि बालक को किस प्रकार का व्यक्ति बनाना चाहिए और दूसरा यह कि उसे सामाजिक प्राणी होने के कारण कैसा व्यवहार करना चाहिए? इन्ही प्रश्नों को सामने रखकर वहाँ के पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया। वहाँ पाठ्यक्रम को ऐसे कार्यों पर आधारित करने का निश्चय किया गया जिसके परिणामस्वरूप विषय-वस्तु के रूप में प्रतिष्ठित पाठ्यक्रम का स्थान ऐसी अभिवृत्तियों, अवबोधनी, योग्यताओं और क्षमताओं आदि ने ग्रहण कर लिया जो सामान्य सामाजिक जीवन के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकें। अब पाठ्यक्रम पाठ्य-सामग्री की सूची के स्थान पर अधिगम अनुभवों के रूप में परिभाषित किया जाने लगा है। 

वर्तमान मे विद्यालयों के कार्यक्रम और कार्यक्षेत्र समय के बँधे हुए सीमित क्षेत्र से निकलकर व्यापक रूप धारण कर चुका है और इसमें बराबर वृद्धि भी हो रही है। अतः पाठ्यक्रम की सीमा का निश्चय कर पाना कठिन होगा। विद्यालयों में जो नई प्रवृत्तियाँ, कार्यक्रम तथा योजनायें आयोजित की जा रही है वे सभी पाठ्यक्रम के ही अंग है। इस कारण पाठ्यक्रम के क्षेत्र का निर्धारण एक कठिन कार्य है। लेकिन शिक्षाशास्त्रियों और शिक्षाविदों ने पाठ्यक्रम की सीमा में होने वाले कार्यों के आधार पर इसके क्षेत्र का निर्धारण किया है। 

इन कार्यों को पूरा करने के लिए विद्यालयों में जो कार्य किये जाते है उनको निम्नलिखित मुख्य तीन भागों में बाँटा गया है--

1. शैक्षिक प्रवृत्तियाँ या क्रियायें 

विद्यालय में होने वाली वे क्रियायें जिनके कुछ उद्देश्य होते हैं जिनको पूरा करने के लिए विद्यालय में पढ़ाई होती है। वर्तमान समय में पाठ्यक्रमों में व्यवहारिक क्रियाओं पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है। इसलिए प्रयोगशाला, कार्यशाला और पुस्तकालय आदि शिक्षा देने के प्रमुख स्थान माने जाते हैं। आज छात्रों को वास्तविक परिस्थितियों में ज्ञान दे दिए जाने पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है। व्यवहारिक ज्ञान देने के लिए छात्रों को विभिन्न विषयों से संबंधित भ्रमण, सर्वेक्षण, अवलोकन के लिए भ्रमार तथा यात्राओं में ले जाया जाता है। इन भ्रमणों से छात्र वास्तविक परिस्थितियों में अनुभव प्राप्त करते हैं।

2. पाठ्यसहगामी क्रियायें 

पहले पाठ्यक्रम के मुख्य विषयों की शिक्षा कक्षा में ही दे दी जाती थी लेकिन विकास संबंधित क्रियाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। खेलकूद व सांस्कृतिक क्रियाकलाप इन सभी को पाठ्यक्रम के बाहर ही पर्याप्त समझकर इन पर वस्तुतः ध्यान नहीं दिया जाता था। परंतु वर्तमान पाठ्यक्रम की व्यापकता के कारण इन सभी क्रियाकलापों को पाठ्यक्रम की सहगामी क्रियाएं माना जाता है। शिक्षक अब विभिन्न क्रियाकलापों का आयोजन करते हैं और छात्रों का उस में भाग लेना जरूरी माना जाता है यह क्रियाएं निम्नलिखित है--

1. शारीरिक विकास से संबंधित क्रियायें।

2. साहित्यिक क्रियायें।

3. सांस्कृतिक क्रियायें।

4. सृजन-संबंधी क्रियायें।

5. सामाजिक क्रियायें।

6. राजनैतिक क्रिया-कलाप।

7. पर्यावरण को सन्तुलित बनाये रखने वाले क्रिया-कपाल।

8. मूल्यों के वर्धन और अनुपालन संबंधी कार्य।

9. राष्ट्रीय क्रिया-कलाप।

3. बच्चों के रूचि के अनुसार कार्यों को बढ़ावा देना 

बालकों की सूचियों को ध्यान में रखकर भी विद्यालयों में क्रियाकलापों का आयोजन किया जाता है। जैसे कुछ बच्चों की रुचि होती है टिकट, पत्थर एवं सिक्के आदि का संग्रह करना कुछ बच्चे चित्र और कार्टून बनाने में रुचि रखते हैं, कुछ बच्चों को फोटोग्राफी में आनंद आता है, कुछ बच्चे बेकार पड़ी हुई वस्तु का प्रयोग करके नई उपयोगी वस्तुएं बनाने में रुचि रखते हैं। इसी प्रकार चित्र, एल्बम, संगीत एवं अभिनय आदि बच्चों के रुचि संबंधी कार्य है। इन सभी रूपों के संवर्धन के लिए इनसे संबंधित कार्यों को कराए जाने की व्यवस्था की जाती है।

इस प्रकार पाठ्यक्रम के क्षेत्र में आने वाली और भी बहुत से कार्य है जिन की एक लंबी सूची बनाई जा सकती है। वास्तविकता तो यह है कि पाठ्यक्रम के विकास का इतिहास मानव जीवन के विकास की प्रक्रिया का ही परिणाम है। पहले शिक्षा कुछ विशेष वर्ग के लिए हो जाने के कारण अनेक प्रकार के विषय और उनके पाठ्यक्रम का विकास होने लगा मानव के जीवन से संबंधित प्रत्येक पक्ष का प्रभाव पाठ्यक्रम पर पड़ता है। पाठ्यक्रम में परिवर्तन परिवर्ध्दन वा संशोधन मानव जीवन की विकास की प्रक्रियाओं के ही कारण होता है। यह प्रक्रिया बहुत पहले से प्रारंभ हुई है और अंन्ततः काल तक निर्वात चलती रहेगी।

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