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8/27/2021

माध्यमिक शिक्षा आयोग के गुण, दोष

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माध्यमिक शिक्षा आयोग के गुण (madhyamik shiksha aayog)

माध्यमिक शिक्षा आयोग के निम्नलिखित गुण है-- 

1. अनुकूल उद्देश्यों का निर्माण 

माध्यमिक शिक्षा आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के जो उद्देश्य निर्धारित किए उनमें छात्रों के शरीरिक, सामाजिक, नैतिक, मानसिक,चरित्रिक, व्यावसायिक तथा अच्छे नागरिक बनाने के सभी गुण है। 

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2. शिक्षा का स्तर सुधारने संबंधी उपयुक्त सुझाव 

आयोग ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए प्रत्येक राज्य मे प्रान्तीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड तथा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के गठन का सुझाव दिया। विद्यालयों का समय-समय पर निरीक्षण का भी सुझाव दिया। ये सभी सुझाव अत्यंत लाभदायी सिद्ध हुए। 

3. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा 

आयोग ने माध्यमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को बनने पर बल दिया है, जो यथार्थ के धरातल पर लिया गया निर्णय है व हमारे देश के लिए हितकर है। 

4. चरित्र निर्माण और अनुशासन पर बल 

आयोग ने चरित्र निर्माण और अनुशासन पर बल दिया और इनकी प्राप्ति के ठोस सुझाव भी दिये। इस तरह एक लम्बे समय से चली आ रही अनुशासनहीनता की समस्या को सुलझाने का प्रयास किया। 

5. रूचिकर शिक्षण विधियों का निर्माण 

आयोग ने नीरस शिक्षण विधियों की जगह पर रूचिकर शिक्षण विधियों के प्रयोग का सुझाव दिया जिससे छात्र शिक्षण मे रूचि ले। इससे छात्रों मे शिक्षण के प्रति रूचि का विकास हुआ। 

6. उपयोगी पाठ्य-पुस्तकों के लिए सुझाव 

आयोग ने पाठ्य-पुस्तकों के संबंध में जो सुझाव दिए उनसे अच्छी गुणवत्ता व उपयोगी पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण करने मे सहायता मिली। 

7. अन्य उपयोगी सुझाव 

आयोग ने छात्रों के अनुशासन, धार्मिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा, स्त्री शिक्षा, निर्देशन व परामर्श के संबंध मे भी उपयोगी सुझाव दिए। 

8. शिक्षकों के संबंध मे उचित सुझाव 

आयोग ने अध्यापकों की योग्यता, वेतन तथा सेवा दशाओं मे सुधार करने का सुझाव दिया जिससे वह समाज में सम्मान पा सके। साथ ही शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों के विषय में भी ठोस सुझाव दिए जो आगे चलकर शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के लिए उपयोगी हुए। 

9. परीक्षा प्रणाली व मूल्यांकन में सुधार 

आयोग ने परीक्षाओं तथा मूल्यांकन से संबंधित ठोस सिफारिशें पेश की, जिनका यदि सख्ती से पालन किया जाए, तो इसके परिणाम उत्कृष्ट होंगे। सबसे महत्वपूर्ण सुझाव निबन्धात्मक परीक्षाओं के दोषों को देखते हुए, निबन्धात्मक प्रश्नों की रचना करते समय विचारप्रधान प्रश्न पूछना तथा निबन्धात्मक परीक्षाओं के साथ-साथ वस्तुनिष्ठ परीक्षा की भी व्यवस्था करना था। वर्तमान मे भी हम देखते है कि इन सुझावों को स्वीकार करने से परीक्षा प्रणाली में अपेक्षित सुधार हुआ है। वह वस्तुनिष्ठ होने के साथ-साथ विश्वसनीय भी बन गई है।

माध्यमिक शिक्षा आयोग के दोष (madhyamik shiksha aayog ke dosh)

माध्यमिक शिक्षा आयोग के निम्नलिखित दोष है-- 

1. अस्पष्ट सुझाव 

आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के संगठन के संबंध मे अस्पष्ट सुझाव दिए जिसके कारण उन्हें लागू करने के बाद दोबारा से उन पर विचार करना पड़ा। इन सबसे परेशानियाँ ही उत्पन्न हुई।

2. बोझिल पाठ्यचर्या 

माध्यमिक स्तर पर तीन भाषाओं और कुल मिलाकर आठ विषयों के अध्ययन से माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या बोझिल बन गई थी। 

3. भ्रामक भाषा नीति 

ऐसा प्रतीत होता था कि आयोग स्वयं भाषा नीति के प्रति सशंकित था कोई निश्चय कर पाने की स्थिति मे नही था। आयोग के सभी सदस्यों मे एक भी हिन्दी भाषा का समर्थक नही था। अतः उसने अंग्रेजी के अध्ययन के विषय मे कुछ उलझे हुए सुझाव दिये तथा एक ओर तो उसे अनिवार्य विषयों की सूची मे रखा वहीं दूसरी ओर दो वर्गों के ऐच्छिक विषयों की सूची मे अतः इस भ्रामक भाषा नीति द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी की जो हानि हुई उसकी भरपाई आज तक न हो सकी।

4. बहुउद्देशीय स्कूलो की स्थापना अव्यावहारिक 

आयोग ने माध्यमिक विद्यालयों को बहुउद्देशीय माध्यमिक विद्यालयों मे बदलने का सुझाव दिया और सभी स्कूलों मे एक साथ अनेक हस्तकौशलों और व्यवसायों की शिक्षा की व्यवस्था का सुझाव दिया, परन्तु इस पर होने वाले खर्च का अनुमान नही लगाया जो इसमें प्राप्त लाभों की तुलना में कही अधिक था। अतः आयोग की यह संस्तुति अव्यावहारिक होने के कारण इन स्कूलों को बाद मे बंद करना पड़ा। 

5. अंग्रजी के विषय मे अनुचित सुझाव 

अंग्रजी को अनिवार्य विषय मे भी स्थान दिया गया तथा वैकल्पिक विषयों मे भी, ये समझ से परे है कि आयोग आखिर अंग्रेजी के विषय मे क्या कहना चाहता था? 

6. गैर-सरकारी स्कूलों के संबंध मे सुझाव हास्यास्पद 

आयोग ने गैर-सरकारी माध्यमिक स्कूलों के संबंध मे जो सुझाव दिए वे उपयुक्त थे परन्तु बिना सरकारी सहायता दिए इन विद्यालयों मे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराना हास्यास्पद सुझाव नही था तो और क्या था? 

7. धार्मिक और नैतिक शिक्षा के संबंध मे अनुपयुक्त सुझाव 

आयोग ने धार्मिक और नैतिक शिक्षा की व्यवस्था उसी दशा मे करने के लिए कहा जब अभिभावक इसे अपने बच्चों को दिलाना चाहे। यह सुझाव उपयुक्त नही था। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। इसमें सभी धर्मों की शिक्षा समान रूप से देने की आवश्यकता है।

आयोग के सुझावों का कार्यान्वयन 

आयोग के अधिकांश सुझावों को केंद्रीय सरकार द्वारा स्वीकार करके कार्यान्वित कर दिया गया है। हम उनका संक्षिप्त विवरण आगे दे रहे है-- 

1. वर्तमान स्कूलों को बहुउद्देशीय स्कूलो मे बदलकर नया रूप दिया जाना। 

2. कृषि शिक्षा का विस्तार करने के लिए 'ग्रामीण उच्च शिक्षा समिति' और  ग्रामीण क्षेत्रों मे उच्च शिक्षा के लिए 'राष्ट्रीय परिषद्' की स्थापना।

3. प्राविधिक शिक्षा के लिए इंजीनियरिंग के काॅलेजों तथा प्राविधिक विद्यालयों (pholytechnics) का निर्माण।

4. माध्यमिक स्तर पर अनिवार्य रूप से तीन भाषाओं का अध्यापन। 

5. छात्रों के शरीरिक कल्याण के लिए   'अखिल भारतीय क्रीड़ा-परिषद्' की स्थापना और केंद्रीय सरकार द्वारा कैम्पों तथा सन्तरण-तड़ागों (Swimming pools) आदि के लिए सहायता-अनुदान।

6. विज्ञान आदि विषयों के अध्यापन मे सुधार, मिडिल स्कूलों मे दस्तकारी की शिक्षा देने तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करने की सुविधाओं का आयोजन।

7. माध्यमिक शिक्षा के संबंध मे केंद्रीय तथा राज्य सरकारों को परामर्श देने के लिए 'अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद्' की स्थापना।

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