7/31/2021

पाठ्यचर्या के उद्देश्य, आवश्यकता/महत्व

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पाठ्यचर्या के उद्देश्य (pathyacharya ke uddeshya)

पाठ्यचर्या के निम्न उद्देश्य है-- 

1. शिक्षा के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना 

शिक्षा के द्वारा ही मानवीय गुणों एवं क्षमताओं का विकास होता है एवं शिक्षा द्वार ही वह जीवन के लक्ष्यों को निर्धारित करता है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति में अनेक प्रयास छात्र तथा शिक्षक द्वारा किए जाते हैं। इसी प्रकार पाठ्यचर्या एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है।

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2. आवश्यक एवं उपयोगी ज्ञान प्रदान करना 

पाठ्यचर्या एक उद्देश्य आवश्यक तथा उपयोगी ज्ञान प्रदान करना है। उदाहरण के लिए भारत का नागरिक होने के नाते छात्र भारत की भौगोलिक स्थिति की जानकारी होना जरूरी है। इसीलिए पाठ्यचर्या मे भारत देश की भौगोलिक स्थिति को स्थान दिया जा सकता है तथा इससे संबंधित सामग्री छात्रों हेतु उपयोगी सिद्ध होगी।

3. ज्ञान को क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित रूप में प्रदान करना 

पाठ्यचर्या का एक उद्देश्य ज्ञान को छात्रों तक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध स्वरूप मे पहुंचाना भी है। क्रमबद्ध से आशय प्रारंभिक शिक्षा मे यदि बालकों को गणना सिखाना है तो 01 से प्रारंभ करते हुए 100 तक का ज्ञान दिया जाए। उसी प्रकार भाषा सिखाते समय पहले अक्षरों से, फिर शब्दों से परिचय करवाया जाए। व्यवस्थित रूप में पाठ्यचर्या मे पाठ्यवस्तु सरल से कठिन की ओर रखी जाती है। जैसे-- किस विद्वान के जीवनी मे सबसे पहले उनका जन्म स्थान, जन्म तिथि, माता-पिता का नाम आदि होगा बाद मे उनके जीवन में हो चुकी घटनाओं और अंत मे उनकी मृत्यु का विवरण दिया जाएगा।

4. पाठ्यचर्या उपलब्धि का आधार 

पाठ्यचर्या एक निश्चित ज्ञान के अध्ययन हेतु शिक्षकों तथा छात्रों को दिया जाता है जिसके आधार पर ही उन्हें उपलब्धि प्राप्त होती है। इसी उपलब्धि के अनुसार ही मूल्यांकन किया जाता है। अतः पाठ्यचर्या का उद्देश्य छात्रों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना है।

5. सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना

पाठ्यचर्या मे इस प्रकार की पाठ्यवस्तु सम्मिलित की जाती है जो समाज से संबंध रखती है जिससे बालकों मे सामाजिकता की समझ विकसित होती एवं बालक एक सामाजिक प्राणी बनता है। इस तरह से पाठ्यचर्या सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु दिशा-निर्देश देता है। अतः पाठ्यचर्या का एक उद्देश्य सामाजिक आवश्यकताओं को पूर्ण करना है। 

6. संस्कृति एवं सभ्यता को हस्तान्तरिक करना 

पाठ्यचर्या एक ऐसा साधन है जिससे शिक्षक बालकों को भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता से परिचित कराता है। संस्कृति एवं सभ्यता को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य भी पाठ्यचर्या की पाठ्यवस्तु के द्वारा ही किया जाता है। पाठ्यचर्या में त्यौहरों की जानकारी, त्यौहार मनाने के कारण, परम्पराओं की जानकारी, भाषा का ज्ञान, ऐतिहासिक संस्कृतियों का ज्ञान आदि तत्वों को सम्मिलित किया जाता है।

7. पर्यावरणीय जागरूकता में वृद्धि करना 

वर्तमान मे पर्यावरण एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। तेजी से बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से आज सारी दुनिया जूझ रही है। इसीलिए बालकों, शिक्षको एवं अभिभावकों मे पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलान बहुत जरूरी हो गया है। पाठ्यचर्या के माध्यम से छात्रों को पर्यावरण प्रदूषण व उसके प्रकारों, कारणों, प्रभावों एवं प्रदूषण को कम करने के उपायों की जानकारी दी जाती है। इस प्रकार से पाठ्यचर्या का एक उद्देश्य पर्यावरण जागरूकता में वृद्धि करना भी है।

8. व्यवसायपरक पाठ्य-सामग्री प्रदान करना 

पाठ्यचर्या के ही माध्यम से छात्रों को ऐसी पाठ्य-सामग्री प्रदान की जा सकती है जो कि छात्रों हेतु भविष्य मे उपयोगी हो एवं व्यवसाय के लिए एक ठोस आधार का निर्माण करे। ऐसी शिक्षा छात्रों को उनका व्यवसाय चुनने में सहायता करेगी एवं छात्रों की व्यावसायिक रूचि को भी पहचाना जा सके जिससे छात्रों को उचित निर्देशन प्राप्त होगा। 

9. अध्यापक को स्पष्टता प्रदान करना 

पाठ्यचर्या का एक मुख्य उद्देश्य अध्यापक को स्पष्टता प्रदान करना भी है। पाठ्यचर्या मे ऐसी पाठ्यवस्तु को सम्मिलित किया जाता है जो शिक्षक के लिए स्पष्ट हो एवं वह ज्ञान को छात्रों तक पहुंचाती हो। शिक्षक विभिन्न शिक्षण विधायों के माध्यम से निर्धारित पाठ्यवस्तु तथा प्रकरण को छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है। इस प्रकार वह नवीनता, रोचकता एवं स्पष्टता के साथ अध्यापन करता है। 

10. रूचिकर ज्ञान प्रदान करना 

पाठ्यचर्या का उद्देश्य बाल-केन्द्रित शिक्षा प्रदान करना है। इसके अंतर्गत छात्रों की व्यक्तिगत एवं शैक्षिक रूचियों, योग्यताओं व क्षमताओं को दृष्टिगत रखते हुए छात्रों को शिक्षा प्रदान करना है। इससे लाभ यह है कि सर्वप्रथम तो बालक विद्यालय आने मे रूचि लेने लगेगा एवं इस प्रकार वह अपनी रूचि अनुसार ज्ञान प्राप्त करेगा।

11. सामाजिक एवं शैक्षिक समस्याओं का निवारण 

पाठ्यचर्या एक उद्देश्य यह भी है कि इसके माध्यम से सामाजिक एवं शैक्षिक समस्याओं का समाधान हो सके। सामाजिक समस्याएँ, जैसे-- गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि, भ्रष्टाचार, पर्यावरण क्षति आदि के विषयों से छात्रों को अवगत करवाया जा सकता है। शैक्षिक समस्या जैसे-- अध्ययन में अरूचि, अपव्यय एवं अवरोधन, में कमी सामान्जस्य आदि की समस्याओं का समाधान भी विद्यालय मे ही पाठ्यचर्या की पाठ्यवस्तु के माध्यम से किया जा सकता है।

12. लोकतंत्र की स्थापना करना 

पाठ्यचर्या का उद्देश्य बालको की विचारधार को लोकतन्त्रत्मक बनाना है। यही कारण है की विद्यालय मे आने वाला प्रत्येक बालक अलग-अलग वातावरण एवं परिवेश से आता है एवं उसकी विचारधारा भिन्न-भिन्न होती है। इसीलिए उसमें लोकतंत्रात्मक गुणों एवं विचारों को विकसित करने के लिए पाठ्यचर्या की पाठ्यवस्तु बहुत प्रभावी कारक है।

13. अधिकारों एवं कर्तव्यों से परिचित करना 

पाठ्यचर्या मे देश के संविधान की जानकारी व मानव अधिकारों की शिक्षा पाठ्यचर्या मे सम्मिलित की जाती है ताकि छात्रों को अपने जीवन के अधिकारों एवं कर्तव्यों की भली-भाँति जानकारी हो, जिससे वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो एवं अपने परिवार, समाज एवं देश के प्रति कर्तव्यों को पहचान सके और उनका पालन भी करें।

पाठ्यचर्या की आवश्यकता अथवा महत्व 

pathyacharya ki avashyakta;हर व्यक्ति की अपनी कुछ आवश्यकतायें होती है। व्यक्ति की भाँति समाज और राष्ट्र की भी अपनी-अपनी आवश्यकतायें होती है।आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित किये जाते है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति विषयों के ज्ञान और क्रियाओं के माध्यम से होती है। उन विषयों और क्रियाओं को पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाता है। पाठ्यचर्या से ज्ञात होता है कि क्या पढ़ना है? पढ़ाना है? किन क्रियाओं मे भाग लेना है? इसलिए छात्र और अध्यापक दोनों के लिये पाठ्यचर्या की आवश्यकता है। 

छात्र के व्यक्तित्व-विकास के लिये शिक्षा एक साधन है। व्यक्तित्व विकास के उद्देश्य से पाठ्यचर्या मे अनेक बौद्धिक विषयों को सम्मिलित किया जाता है, अनेक क्रियाओं और खेल-कूदों का आयोजन होता है, अनेक कौशलों को सिखाया जाता है, पुस्तकालय, वाचनालय, प्रयोगशाला आदि की समुचित व्यवस्था की जाती है," इस प्रकार से बालक की सुप्त शक्तियों को जगाने और उनके विकास के निमित्त पाठ्यचर्या आवश्यक प्रतीत होती है।" 

जब बालक विभिन्न विषयों को पढ़ता है, विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है, विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है तो इन सबके द्वार उसे अपने समाज की, अपने देश की परम्परा और संस्कृति से परिचय होता है। संस्कृति की रक्षा के साथ-साथ बालक अपनी सृजनात्मक शक्ति द्वारा उस संस्कृति मे जरूरी परिवर्तन, परिवर्धन एवं परिष्कार करता है। समाजीकरण की इस प्रक्रिया में प्रभावी ढंग से भाग लेने के लिये पाठ्यचर्या की बहुत आवश्यकता होती है।

पाठ्यचर्या विद्यालयी कार्यक्रम की एक निश्चित योजना प्रस्तुत करती है। विभिन्न स्तरों के विद्यालयों में बालकों के मानसिक स्तरानुकूल किन क्रियाओं को सिखाया जायेगा और किन विषयों को पढ़या जायेगा, यह पाठ्यचर्या द्वारा ही निश्चित हो पाता है।

पाठ्यचर्या मे पुस्तकें संस्तुत रहती है, पाठ्यचर्या के आधार पर मूल्यांकन कार्य सरल हो जाता है। पाठ्यचर्या विशेषकर प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर समाजोपयोगी उत्पादन कार्य एवं कार्यानुभव पर बल देकर शिक्षा को जीवन से जोड़ती है। इन सब कारणो से पाठ्यचर्या आवश्यक है।

जो आवश्यक है वह उपयोगी होगा और उसका महत्व भी जरूर होगा। पाठ्यचर्या की उपयोगिता और उसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है-- 

पाठ्यचर्या के माध्यम से शिक्षा की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। शिक्षा के किस स्तर (पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च) पर किन पाठ्य-विषयों को पढ़ना है, किन क्रियाओं को सिखाना है और किन अनुभवों को देना है-- ये सारी बातें पाठ्यचर्या में स्पष्ट रूप से दी रहती है। एक प्रकार से विद्यालयी जीवन के कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा पाठ्यचर्यां में मिलती है।

पाठ्यचर्या के उपलब्ध हो जाने से जरूरी एवं वांछनीय पाठ्य-सामग्री को पुस्तक की रचना के समय ध्यान मे रखा जाता है। इसमे उपयुक्त एवं स्तरानुकूल पुस्तकों का निर्माण हो पाता है जिनसे बालक के विकास मे सहायता मिलता है। पाठ्यचर्या विद्यार्थी और अध्यापक दोनों को ही सही दिशाबोध कराती है। इससे समय और शक्ति का अपव्यय नही होता। दोनों लक्ष्य की ओर बढ़ते है और समय पर वहाँ पहुँच जाते है। इस प्रकार पाठ्यचर्या द्वारा लक्ष्य-प्राप्ति संभव हो पाती है।

एक निश्चित स्तर के लिये एक निश्चित पाठ्यचर्या होने से पूरे प्रदेश अथवा देश में शैक्षिक-स्तर समानता और एकरूपता बनी रहती है। जब किसी नये विषय की पढ़ाई किसी शिक्षा संस्था में प्रारंभ की जाती है अथवा कोई नई योजना लागू की जाती है तो सबसे पहले पाठ्यचर्या निर्धारण का प्रश्न उठता है। पाठ्यचर्या के अभाव मे मूल्यांकन करना कैसे संभव होगा? मूल्यांकन पाठ्यचर्या के आधार पर ही किया जाता है।

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