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7/30/2021

पाठ्यचर्या की प्रकृति, क्षेत्र

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पाठ्यचर्या की प्रकृति (pathyacharya ki prakriti)

यदि हम शिक्षा के इतिहास को देखे तो हम पाते है कि सकता स्वरूप या प्रकृति सदैव परिवर्तित होती रही है।  कभी पठ्यचर्या संकीर्ण रही है तो कभी पाठ्यचर्या व्यापक रही है। पाठ्यचर्या किसी विद्वान का विचार हो सकता है, किसी देश का भविष्य हो सकता है या पाठ्यचर्या आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार पाठ्यचर्या स्वयं मे कई तत्वों को समेट लेती है। पाठ्यचर्या ने समय के साथ-साथ स्वयं मे परिवर्तन किया है। प्राचीन काल मे पाठ्यचर्या की प्रकृति सामान्यतः संकीर्ण थी जिसमे कुछ विशेष वर्गों को उनकी जाति अथवा धर्म के अनुसार शिक्षा दी जाती थी।

मध्यकाल मे पाठ्यचर्या और भी संकीर्ण हो गयी मध्यकाल मे पाठ्यचर्या एक गौण वस्तु थी। कुछ धार्मिक पाठ्यवस्तु के अतिरिक्त शिक्षा शुन्य थी किन्तु वर्तमान मे पठ्यचर्या में विराट और आमूल-चूल परिवर्तन हुए अथव् हो रहे है। ब्रिटिश सत्ता ने पाठ्यचर्या मे बहुत अधिक सीमा तक परिवर्तन किया तथा हमारे भारतीय शिक्षाविदों, महापुरूषों आदि ने पठ्यचर्या को एक सुन्दर एवं नवीन तथा आवश्यकतानुकूल रूप प्रदान किया। इसे उपयोगी तथा परिणाम प्रदाता बनाया। इसमें ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान, आधुनिकता, तकनीकी आदि को सम्मिलित किया गया। पाठ्यचर्या की प्रकृति परिवर्तनशील रही है। आजकल इसमें समाजोपयोगी तत्व शामिल रहते है। वर्तमान मे पठ्यचर्या का स्वरूप और अधिक विस्तृत रूप मे सामने आया है। इसमे व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की क्रियाओं का चिन्तन तथा मनन किया गया है।

वर्तमान में पठ्यचर्या के स्वरूप मे परिवर्तन होने की वजह से इसकी उपयोगिता तथा आवश्यकता काफी बढ़ गई है। वर्तमान मे पाठ्यचर्या में केवल विद्यालयी विषयों को ही सम्मिलित नही किया जाता है बल्कि शिक्षकों तथा छात्रों के अनुभव तथा अभिक्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाता है जिसका मार्गदर्शन विशेषज्ञों के विचारों तथा विद्यालयों द्वारा किया जाता है। आज पाठ्यचर्या का व्यापक एवं नवीन स्वरूप तथा संस्करण हमारे समक्ष प्रस्तुत है। वर्तमान मे पाठ्यचर्या मे पाठ्य सहगामी क्रियाओं को भी विशेष स्थान दिया गया है। इसी संदर्भ में विद्यालय केवल शिक्षा प्रदान करने का स्थान नही रह गया है बल्कि विद्यालय एक मानव के जीवन के समस्त पक्षों का अध्ययन व विश्लेषण करके लक्ष्यों की पूर्ति करता है और विद्यालय में होने वाली समस्त क्रियाएँ पठ्यचर्या के ही अंतर्गत आती है।

पाठ्यचर्या का क्षेत्र (pathyacharya ka kshetra)

वर्तमान मे विद्यालय का कार्यक्षेत्र सम्बद्ध पठन-पाठन के सीमित दायरे से निकलकर एक व्यापक रूप धारण कर चुका है साथ ही इसमे निरंतर वृद्धि भी होती जा रही है जिसके परिणामस्वरूप इसकी सीमाओं को निश्चित करना आसान नही है। चूँकि विद्यालयों मे आयोजित की जाने वाली सभी क्रियाएँ पाठ्यचर्या का ही अंग होती है। इसीलिए पाठ्यचर्या के क्षेत्र का निर्धारण करना अत्यंत कठिन कार्य हो गया है फिर भी विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने पाठ्यचर्या को उसके अंतर्गत सम्पादित किए जाने वाले कार्यों के आधार पर सीमांकित करने का प्रयास किया है जो इस प्रकार है-- 

1. लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का निर्धारण 

जिस प्रकार शिक्षा के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने के पाठ्यचर्या का निर्माण किया जाता है ठीक उसी प्रकार पाठ्यचर्या छात्रों के लिए कुछ निश्चित उद्देश्यों का निर्धारण भी करता है एवं उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बालकों को प्रेरित करता है।

2. बालकों के संज्ञानात्म विकास का पोषण 

पाठ्यचर्या का उद्देश्य बालकों का सर्वांगीण विकास एवं ज्ञानवर्द्धन करना भी होता है एवं वह बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करके उनका संज्ञानात्मक विकास करता है।

3. बालकों के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य संवर्द्धन 

एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव को समाज में रहते हुए कुछ अधिकारों का उपयोग तथा कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। इसके अलावा एक बालक पूर्ण रूप से स्वस्थ तभी माना जाता है जब वह मानसिक तथा मनोवैज्ञानिक रूप से सुदृढ हो।

4. शैक्षाणिक स्त्रोतों का उपयोग 

पाठ्यचर्या मात्र बालकों को अधिगम के लिए व्यवस्था ही नही प्रदान करता बल्कि बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करने हेतु अनेकों शैक्षणिक स्त्रोतों का भी उपयोग करता है तथा अनेकों पुरातन शैक्षिक अभिलेखों मे से बालकों के लिए उपयोगी विषय-वस्तु प्रदान करता है।

5. अधिगम हेतु व्यवस्था 

अधिगम एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। जिस तरह ठहरे हुए पानी में विभिन्न प्रकार की बीमारियां एवं गन्दगी पनपने लगती है, उसी प्रकार जब व्यक्ति अधिगम कार्य बंद कर देता है तो उसमें भी रूढ़िबद्धता आ जाती है। इस प्रकार पाठ्यचर्या समय-समय पर बालकों को नवीन तथा विभिन्न प्रकार के अधिगम हेतु सुविधा प्रदान करता है।

6. नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य 

पाठ्यचर्या एक व्यापक अवधारण का रूप लेती जा रही है। अतः वर्तमान समय में प्रचलन में आने वाली अनेक नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य भी इसके क्षेत्र में आता है।

7. समस्त कार्यक्रमों एवं बालकों को कार्यों का मूल्यांकन 

जैसा कि हमे पाता है कि पाठ्यचर्या विषय-वस्तुओं का समावेश मात्र न होकर विभिन्न क्रियाओं एवं कार्यकलापों का भी समन्वय है। पाठ्यचर्या बालकों को ज्ञान प्रदान करने के साथ ही साथ उनके कार्यों तथा अन्य समस्त कार्यक्रमों का मूल्यांकन भी करता है।

8. छात्रों का व्यक्तिगत बोध एवं उनके अनुरूप शिक्षण 

पाठ्यचर्या द्वारा बालकों का वैयक्तिक विकास तथा ज्ञानवर्द्धन किया जाता है। प्रत्येक बालक की अभिरूचियाँ व क्षमतएँ भिन्न-भिन्न होती है तथा पाठ्यचर्या प्रत्येक छात्र के व्यक्तिगत बोध के अनुरूप ही शिक्षण व्यवस्था प्रदान करता है।

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