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4/22/2021

नादिरशाह का आक्रमण भारत पर आक्रमण

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 भारत पर नादिरशाह का आक्रमण 

nadir shah ka bharat pr aakraman;नादिरशाह का बालावस्‍था का नाम नादिर कुली था। इसका जन्‍म मध्‍य एशिया के खुरासान नामक स्‍थान पर सन् 1688 ई. हुआ था। इसके बचपन का समय संघर्षों के साथ व्‍यतीत हुआ था। उसके आंरभिक जीवन की कठिनाइयों तथा अभावों ने उसमें आश्‍चर्य-जनक स्‍फूर्ति और साहस का संचार कर दिया था। उसने खुरासान में अपना एक गिरोह संगठित करके आस-पास के स्‍थानों में लूटमार करना शुरू कर दिया। फारस पर आक्रमण करके राजधानी इस्‍फहान पर अधिकार कर लिया। फारस की दुर्बलता का लाभ उठाकर 1722 ई. में अफगानों में फारस पर अधिकार किया लेकिन नादिर ने अफगानों से डटकर मुकाबला किया तथा थोड़े समय में ही फारस पर अधिकार किया लेकिन थोड़े समय मे ही फारस को अफगानों से खाली करा लिया। 1730 ई तक उसने गिजलई अफगानों को फारस से मार भगाया तथा साथ ही खुरासान में उजबेकों को भी बुरी तरह हराया। इस तरह उसने एक सुयोग्‍य सेनापति के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त कर ली। ऐसी स्थिति में उसने फारस के शाह तहमास्‍प को सिंहासन त्‍यागने पर विवश कर दिया तथा 1732 में शाह के अल्‍पवयस्‍क पुत्र अब्‍बास को गद्दी पर बिठा कर उसका संरक्षक बन गया। 1736 ई. में नादिरशाह ने अपने आप को फारस का बादशाह घोषित कर दिया। 

नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के कारण

नादिर शाह के भारत पर आक्रमण के निम्न कारण थे--

1. महत्‍वाकांक्षा 

नादिरशाह एक महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति था। साम्राज्‍य विस्‍तार और धन की प्राप्ति उसके प्रधान लक्ष्‍य थे। तुर्को, रूसियों और अरबों से भी उसने कई प्रदेश छीन लिए थे। कन्‍धार को जीत कर 1738 ई. नादिरशाह ने ईरानियों की परम्‍परागत इच्‍छा की पूर्ति तो कर ही दी, इससे भारत पर आक्रमण का रास्‍ता भी तैयार हो गया। 

2. अफगान भगोड़ों को शरण ईरानी दूत की हत्‍या 

कन्‍धार पर आक्रमण के पूर्व नादिरशाह ने मुगल सम्राट मुहम्‍मद शाह से यह वादा ले लिया था कि कन्‍धार से भागने वाले अफगान सरदारों को मुगल साम्राज्‍य की सीमाओं में शरण नहीं दी जायेगी। परन्‍तु 1738 ई. जब नादिरशाह ने कन्‍धार जीता तो कुछ प्रमुख अफगान सरदारों ने भागकर गजनी और काबुल में शरण ले ली। इस बारें में बात करने के लिए नादिरशाह ने एक दूत दिल्‍ली के लिए रवाना किया लेकिन मुगल सैनिक ने जलालाबाद में ही दूत की हत्‍या कर दी। ईरानी दूतों के साथ मुगलों का यह व्‍यवहार नादिरशाह के भारत पर आक्रमण का एक प्रमुख कारण बना। 

3. नादिरशाह को आमंत्रण 

कुछ प्रमाणों के आधार पर कुछ इतिहासकारों का यह मत रहा है कि मराठों के दिल्‍ली तक धावों और उनकी उत्तर में बढ़ती शक्ति से घबराकर मुगलदरबार के निजाम-उल-मुल्‍क तथा सआदतखां जैस प्रमुख व्‍यक्तियों ने ईरान के शाह नादिर शाह को भारत आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था। नादिरशाह ने भी मुगल सम्राट मुहम्‍मद शाह को लिखा था कि अटक के पार में सिर्फ इसलिए आया हूं कि जब काफिर हिन्‍दूस्‍तान की तरफ बढ़ें तो मैं बिजली फौज को लेकर उन्‍हें जहन्‍नूम भेज दूं। 

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण और करनाल युद्ध

सन् 1739 ई. नादिरशाह ने बिना किसी प्रति‍रोध के गजनी, काबुल, जलालाबाद और पेशावर पर अधिकार कर लिया और पंजाब के सूबेदार जकरियाखां ने भी आत्‍म-समर्पण कर दिया। नादिरशाह पंजाब से दिल्‍ली की और बढ़ा। मुगल सम्राट बहादुरशाह की सेना और नादिरशाह की सेना में पानीपत से लगभग 32 किमी दूर करनाल में परस्‍पर युद्ध हुआ। इसमें नादिरशाह विजयी हुआ। उसने मुगल सम्राट को बन्‍दी बना लिया और उससे बीस करोड़ रुपये की मांग की। 

नादिरशाह द्वारा दिल्‍ली में कत्‍लें आम और निर्मम लूट 

नादिरशाह ने दिल्‍ली में प्रवेश कर दुर्ग में दिवाने-खास के समीप राजप्रसाद पर अधिाकार कर लिया। इसी बीच कुछ असामाजिक शरारती तत्‍वों ने नादिरशाह की मृत्‍यु की अफवाह फैला दी और नादिरशाह के सैनिक  और गल्‍ले में व्‍यापारियों में परस्‍पर झगड़ा भी करवा दिया। इसमें नादिरशाह के कुछ सिपाई मारे गये। इससे क्रोधित होकर प्रतिशोध के लिये नादिरशाह ने दिल्‍ली में कत्‍ले-आम की आज्ञा दे दी। फलतः निर्ममता से घरों में आग लगा दी गयी और वे लूटे गये, अनेका लोग का कत्‍ल कर दिया गया, कई स्त्रियों और बच्‍चों को बलपूर्वक दास बना लिया गया। ग्रामो को लूटने और वहां हत्‍या करने के लियें भी फौजी टुकडि़याँ भेजी गयी। आठ सप्‍ताह तक आगजनी, नरसंहार और लूट नृशंसता से चलती रही। अंत में मोहम्‍मदशाह की व्‍यग्र अपील पर नादिरशाह ने यह बन्‍द करवा दिया। लगभग बीस हजार लोगों का बर्बरता से कत्‍ल कर दिये पश्चिम के समस्‍त मुगल प्रदेश नादिरशाह को दे दिये गये। इनमें संधि की जिसके अनुसार सिंधु नदी के पश्चिम के समस्‍त मुगल प्रदेश नादिरशाह को दे दिये गये। इनमें सिंध, पंजाब और काबुल के भाग और खैबर व बोलन के दर्रे भी थे। नादिरशाह ने दिल्‍ली में पन्‍द्रह करोड़ रुपये ऐंठे तथा शाही राजकोष और राजप्रसाद से अत्‍यधिक मात्रा में हीरे, जवाहरत, सोना-चांदी तथा अन्‍य विविध प्रकार की बहुमूल्‍य सामग्री प्राप्‍त की। उसने मुगल सम्राट के राजमुकुट में लगे हीरों और रत्‍नों को भी ले लिया जिनमें विश्‍व-विख्‍यात कोहिनूर हीरा भी था। उसने शाहजहां का प्रसिद्ध बहुमुल्‍य मयूर सिंहासन भी प्राप्‍त कर लिया। इन सबकों यह हाथियों और ऊटों पर लादकर ईरान ले गया। 

नादिरशाह का लौटना व वध 

दिल्‍ली से अपार धन लेकर नादिरशाह सन् 1739 ई. में भारत से लौट गया। पर भारत से जाने के बाद उसके विरूद्ध विद्रोह हुये और अन्‍त से सन् 1757 ई. में उसका वध कर दिया गया। 

नादिरशाह के आक्रमण के प्रभाव 

नादिरशाह के आक्रमण से मुगल साम्राज्‍य की अवशिष्‍ट प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान धूल में मिल गया और मुगल साम्राज्‍य का पतन स्‍पष्‍ट हो गया। पंजाब, सिंध और अफगानिस्‍तान के प्रदेश मुगल साम्राज्‍य से पृथक कर ईरानी साम्राज्‍य में मिला लिये गये। दिल्‍ली के लूट के धन के अतिरिक्‍त 15 करोड़ रुपये, मयूर सिंहासन, बहुमूल्‍य हीरे, रत्‍न, सेाना-चांदी और संचित राजकोष भी नादिरशाह ईरान ले गया। इससे मुगल राजकोष रिक्‍त हो गया। खैबर दर्रा और पेशावर पर ईरानियों का अधिकार हो जाने से दिल्‍ली पर विदेशी आक्रमण का भय सदा के लिये बना रहा। अहमदशाह अब्‍दाली ने इससे लाभ उठाया और भारत पर आक्रमण किये। मुगल साम्राज्‍य ‘‘रक्‍त से लथ-पथ होकर धराशयी‘‘ कर दिया गया जिसके फलस्‍वरूप उत्तर-पश्चिम में अफगानों, पंजाब में सिक्‍खों और दक्षिण में मराठों को आक्रमणों के लिये प्रोत्‍साहन मिला। मुगल दरबार में ईरानी, तूरानी, और हिन्‍दूस्‍तानी अमीरों और सरदारों की गुटबंदी और संघर्ष प्रांरभ हो गये। इससे मुगल साम्राज्‍य के पतन का मार्ग प्रशस्‍त हो गया।

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