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2/16/2021

सीमान्त लागत क्या है? परिभाषा, विशेषताएं

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सीमान्त लागत क्या है? (seemant lagat ka arth)

seemant lagat arth paribhasha visheshta;सीमान्त लागत साधारणतया उस अतिरिक्त को कहते है जो एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने के लिए आवश्यक होती है। जो लागत एक निश्चित लागत होती है तथा जो लागत उत्पादन मे एक और इकाई जोड़कर उत्पादन करने मे आती है, इन दोनों लागतों का अंतर सीमांत लागत कहलाता है। 

सीमान्त लागत की परिभाषा (seemant lagat ki paribhasha)

सीमांत लागत पद्धति की प्रमुख परिभाषाएं इस प्रकार है--

डी. जोसेफ के अनुसार," सीमान्त लागत वर्तमान स्तर से एक इकाई अधिक के उत्पादन के कारण कुल लागत मे हुए परिवर्तन की निर्धारित करने की तकनीक है।"

आय. डब्ल्यू. सी. ए. लन्दन के अनुसार," सीमान्त लागत विधि किसी उत्पादन की सीमान्त लागतों के निर्धारण एवं स्थिर एवं परिवर्तनशील व्ययों मे विभेद करने से उत्पादन की मात्रा एवं प्रकार का लाभों पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन की तकनीक है।" 

एच. जे. ह्रेलडन के अनुसार," सीमावर्ती लागत कार्य विधि लागत और संचालन लागत विधि नही है बल्कि यह एक कला है जिसका संबंध स्थायी विशेषकर खर्चों के प्रभाव को चालू व्यापार मे दर्शाना होता है।" 

इन्स्टीट्यूट ऑफ काॅस्ट एण्ड वक्र्स एकाउन्टेन्स के अनुसार," सीमान्त लागत ' शब्द का अर्थ उत्पादन के किसी निश्चित परिणाम के लिए उस राशि से है जिससे कुल लागत मे परिवर्तन होता है, यदि उत्पादन का परिणाम एक इकाई से कम या अधिक हो जाये।" 

उपरोक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है, कि वस्तु के उत्पादन की मात्रा मे एक इकाई की वृद्धि अथवा कमी किये जाने पर कुल लागत मे जो परिवर्तन होता है, उसी को सीमान्त लागत कहते है। वास्तविकता मे उत्पादन स्तर मे परिवर्तन से केवल परिवर्तनशील लागतें ही प्रभावित होती है। अर्थात् लागत लेखांकन के अंतर्गत सीमान्त लागत का आशय कुल परिवर्तनशील लागत से होता है। सीमान्त लागत मे प्रत्यक्ष सामग्री, प्रत्यक्ष श्रम, प्रत्यक्ष व्यय एवं सभी परिवर्तनशील उपरिव्ययों को सम्मिलित किया जाता है। सीमांत लागत मे स्थायी लागतों को सम्मिलित नही किया जाता है।

सीमांत लागत लेखांकन की विशेषताएं (seemant lagat ki visheshta)

सीमान्त लागत की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. इस पद्धति मे लागत के सभी तत्वों को मुख्य रूप से स्थायी एवं परिवर्तनशील दो भागों मे विभाजित किया जाता है।

2. इस पद्धति मे उत्पादन लागतों की गणना करने मे केवल परिवर्तनशील लागतों अर्थात् सिमान्त लागतों को ही सम्मिलित किया जाता है।

3. इस विधि मे निर्मित माल के स्कन्ध तथा चालू कार्य का मूल्यांकन सीमान्त लागत के आधार पर किया जाता है।

4. यह पद्धति इस मान्यता पर आधारित है कि कुल स्थिर लागत उत्पादन मात्रा के घटने या बढ़ने पर एक समान होती है तथा उसमे कोई परिवर्तन नही होता। जैसे-जैसे उत्पादन मे वृद्धि होती चली जाती है, प्रति इकाई स्थिर लागत कम होती जाती है।

5. कुल परिवर्तनीय लागत उत्पादन मे वृद्धि के साथ-साथ आनुपातिक रूप मे बढ़ती है तथा उत्पादन मे कमी होने पर आनुपातिक रूप से कम होती है। प्रति इकाई परिवर्तनीय लागत पर उत्पादन मे कमी या वृद्धि का कोई प्रभाव नही पड़ता। यह सदैव एक समान रहती है। 

6. वर्तमान स्तर से अधिक जितनी भी इकाइयां उत्पादिय की जायेंगी उनके उत्पादन के लिए केवल परिवर्तनीय लागत अतिरिक्त रूप से लगेगी। इसी को सीमान्त लागत के नाम से पुकारा जाता है।

7.  सीमान्त लागत मे अंशदान की गणना प्रमुख रूप से की जाती है जो विक्रय मूल्य व सीमान्त लागत का अंतर होता है। इसका उपयोग स्थिर लागतों की पूर्ति एवं लाभ नियोजन हेतु किया जाता है।

8. सीमान्त लागत लेखांकन का प्रयोग लागतों की सूचना देने तथा लागतों का लेखा रखने हुए किया जाता है।

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