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2/16/2021

लीवरेज क्या है? परिभाषा, महत्व, सीमाएं

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लीवरेज (उत्तोलक) क्या है? 

लिवरेज शब्द की उत्पत्ति लीवर शब्द से हुई है। लीवर से आशय उस स्थिति से है जिसके द्वारा कम से कम बल लगाकर अधिक से अधिक कार्य किया जा सके। वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत लिवरेज से आशय वित्तीय लिवरेज से है अर्थात् वित्तीय मामलों से संबंधित अध्ययन किया जाता है, वित्तीय लिवरेज कहलाता है। पूंजी संरचना निर्णयों मे अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

उत्तोलक संस्था की लाभ अर्जन क्षमता एवं वित्तीय सुदृढ़ता दोनों को प्रभावित करता है। किसी भी कंपनी मे वित्तीय लिवरेज उस समय माना जाता है जब उस कंपनी मे समता पर व्यापार चल रहा हो। यदि कोई कंपनी क्षमता अंश पूंजी से कम तथा ऋण पूंजी से अधिक वित्त प्राप्त करती है तथा वित्त का अधिकतम प्रयोग करके लाभ को अधिकतम करती है तो यह कहा जाता है कि इस संस्था मे वित्तीय लिवरेज का प्रयोग हुआ है।

लीवरेज की परिभाषा 

प्रो. कुच्छल के अनुसार," लीवरेज का आशय वित्त प्रबंधन मे स्थायी लागत के सहन करने या स्थायी प्रत्याय का भुगतान करने से है।" 

सोलोमन इजरा के अनुसार," अंशधारियों को इक्विटी पर मिलने वाली प्रत्याय दर का कूल पूंजीकरण की प्रत्याय दर के साथ अनुपात को लीवरेज कहते है।

जे. ई. वाल्टर के अनुसार," सामान्य अंशधारियों को मिलने वाले प्रत्याय प्रतिशत तथा कुल पूंजीकरण की प्रत्याय प्रतिशत से पारस्परिक अनुपात लिवरेज कहलाता है।" 

वेस्टन हाल्ट के अनुसार," वित्तीय लिवरेज के या तो कुल ऋणों की शुद्ध राशि के साथ अनुपात के रूप मे या कुल ऋणों की कुल संपत्तियों के साथ अनुपात के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है।" 

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के बाद हम कह सकते है कि वित्तीय लिवरेज का आशय उस स्थिति से है जिसके अंतर्गत सामान्य पूंजी कम मात्रा मे प्रयोग की जाती है तथा ऋण पूंजी व पूर्वाधिकार पूंजी अधिक मात्रा मे प्रयोग की जाती है। सामान्यतः यदि संस्था की आय पूर्वाधिकार अंश पूंजी एवं सामान्य अंश पूंजी लागत से अधिक होती है तो संस्था की पूंजी दंतीकरण अनुपात अवमूलतम कहलाता है। दंतीकरण अनुपात जितना ऊंचा होगा सामान्य अंशधारियों को प्राप्त होने वाला लाभांश उतना ही अधिक होगा।

व्यवसाय में लिवरेज दो प्रकार का हेाता है--

1. परिचालन उत्तोलक 

यदि संस्‍था को स्‍थायी व्‍यय वहन सहन करने पड़ते है जिनका उत्‍पादन के स्‍तर पर कोई प्रभाव न हो तब हम कहेंगे कि संस्‍था में परिचालन उत्तोलक विद्यमान है। संस्‍था की लागतों को दो भागों में विभक्‍त करते है--

(अ) स्‍थायी परिवर्तनशील लागतें  

(ब) अर्द्ध परिवर्तनशील लागते। 

प्राय: स्‍थायी परिवर्तनशील लागतें ही महत्‍वपूर्ण होती है। वेसे परिचालन उत्तोलक ब्‍याज एंव कर घटाने से पूर्ण लाभ में हुए प्रतिशत परिवर्तन तथा विक्रय की प्रतिशत में हुए परिवर्तन के पारस्‍परिक संबंध को प्रदर्शित करता है।

2. वित्तीय उत्तोलक

सालोमन के अनुसार,''वित्तीय उत्तोलक संस्‍था की गतिविधियों में प्रयुक्‍त ऋण तथा सामान्‍य कोषों के मिश्रण को बताता है।''

बार्न हार्न के अनुसार,'' वित्तीय उत्तोलक में स्‍थायी लागत कोषों का प्रयोग साधारण अंशधारियों के प्रत्‍याय बढा़ने की आशा में किया जाता है।''

अत: स्‍पष्‍ट है कि वित्तीय उत्तोलक संस्‍था में वित्त के साधनों के सम्मिश्रण अर्थात् स्‍थायी लागत साधनों से वित्त पूंजी एंव परिवर्तनशील लागत साधनों से वित्त पूर्ति के अनुपात पर प्रभाव डालता है। 

उत्तोलक का स्‍तर भी दो प्रकार का होता है --

उच्‍च स्‍तर एवं निम्‍न स्‍तर। यदि संस्‍था में स्‍थायी लागतें पूंजी परिवर्तनशील लागत पूंजी से अधिक है तब हम कहेंगे कि संस्‍था में उच्‍च स्‍तर का वित्तीय उत्‍तोलक विद्यमान है। इसके विपरीत यदि परिवर्तनशील लागत पूंजी का अनुपात स्‍थायी लागत पूंजी से अधिक है तब निम्‍न स्‍तर का वित्तीय उत्तोलक होगा। इस प्रकार के उत्तोलक को सामान्‍य दर व्‍यापार के नाम से जाना जाता है। जब कंपनी ऋण पूंजी एंव पूर्वाधिकार अंश पूंजी  से अधिक तथा सामान्‍य पूंजी से कम वित्त एकत्रित करती है। तो उसे वित्तीय उत्तोलक कहते है। वित्तीय लिवरेज का प्रमुख उद्देश्‍य सामान्‍य अंशधारियेा को ऊंची दर पर लाभांश का भुगतान करता है।

लीवरेज का महत्व 

वित्तीय प्रबंधक के लिए लीवरेज अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा उपयोगी तकनीकी है। इसका सावधानी से प्रयोग करके समता अंशधारियों की प्रति अंश आय, प्रति अंश लाभांश और उनके विनियोगों के बाजार मूल्य को बढ़ाया जा सकता है। लीवरेज एक दो धार वाली तलवार है, जो बिक्री और परिचालन लाभ मे परिवर्तन का बढ़ा-चढ़ा प्रभाव (वृद्धि या कमी के रूप मे) कर से आय (EBT) या प्रति अंश आय (EPS) पर डालते है। जब ऋण-पूंजी की लागत अर्जन दर से कम हो, तो ऋण पूंजी का प्रयोग करके कर से पूर्व आय व प्रति अंश आय मे अधिक वृद्धि करके अंशधारियों के लिए यह वरदान साबित होता है, परन्तु जब ऋण पूंजी की लागत अर्जन दर से अधिक हो जाए तो यह व्यवसाय के लिए अभिशाप भी साबित हो सकता है। लीवरेज एक कंपनी की पूंजी संरचना निर्धारित करने, समता अंशधारियों को अधिकतम आय देने तथा कंपनी की औसत पूंजी लागत मे कमी करने हेतु एक महत्वपूर्ण उपकरण है। लीवरेज के महत्व का विवेचन इस प्रकार है--

1. वित्तीय प्रबंधन के निर्णयों मे इस तकनीक का बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। पूंजी संरचना के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप निर्धारण मे इस तकनीक की सहायता ली जा सकती है। इस तकनीक से पूंजी संरचना मे विभिन्न प्रतिभूतियों का वह अनुपात निर्धारित किया जा सकता है, जिस पर औसत पूंजी लागत न्यूनतम हो। पूंजी संरचना मे लीवरेज के समावेश से समता अंशधारियों को उपलब्ध लाभ मे होने वाले परिवर्तनों का विस्तार किया जा सकता है।

2. विनियोग निर्णय लेते समय भी इस तकनीक से बहुत मदद मिलती है। लीवरेज की नीति व्यापार विस्तार और सीमा पर प्रकाश डालती है तथा परामर्श देती है कि अगर व्यापार के भावी विस्तार कार्यक्रम मे लगाई गई पूंजी पर मिलने वाले आशान्वित प्रत्याय की दर उन पर होने वाले स्थिर लागत से कम है तो विस्तार योजना को लागू नही करना चाहिए। इससे विपरीत दशा मे विस्तार योजना को अपनाना चाहिए।

3. लीवरेज की सहायता से वित्तीय प्रबंधक ऐसी वित्तीय योजना व पूंजी संरचना का निर्माण कर सकता है ताकि समता अंशधारियों के लिए उपलब्ध आय अधिकतम हो सके। लीवरेज के प्रयोग से ऐसा इसलिए संभव हो पाता है कि पूंजी संरचना मे स्थिर लागत की मात्रा बढ़ाने से औसत पूंजी लागत मे कमी आती है। 

लीवरेज की सीमाएं

लीवरेज की सीमाएं इस प्रकार है--

1. इस तकनीक की गणना करते समय चल पूंजी की उस लागत को ध्यान मे रखा जाता है जो स्पष्ट होती है, अस्पष्ट लागतों की बिल्कुल भी ध्यान मे नही रखा जाता है। लीवरेज सिद्धांत के अनुसार, आवश्यक अतिरिक्त पूंजी को ऋण पूंजी से तब तक पूरा करना चाहिए जब तक संभावित प्रत्याय दर ऋण पूंजी की लागत से अधिक है, परन्तु इस प्रक्रिया से अंशधारियों के हितों की रक्षा नही पाती है। ऋण के सतत् प्रयोग से जोखिम की मात्रा बढ़ती है जिसका प्रभाव अंशों के मूल्यों पर कमी के रूप मे पड़ता है। अंशों के मूल्यों मे यह कमी ऋण पूंजी की अस्पष्ट लागत होती है और लीवरेज के प्रयोग में इसको भी ध्यान मे रखना चाहिए।

2. लीवरेज विश्लेषण मे यह मान्यता है कि ऋण पूंजी की लागत हमेशा एक समान रहती है, लेकिन व्यवहार मे ऐसा नही होता है। एक निश्चित सीमा के बाद अतिरिक्त ऋण प्राप्त करने मे कठिनाई होती है और प्रत्येक अगला ऋण ऊँची ब्याज दर पर मिलता है।

शायद यह जानकारी आपके लिए काफी उपयोगी सिद्ध होंगी

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