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12/20/2020

ब्रिटिश सरकार की अकाल नीति

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ब्रिटिश सरकार की अकाल नीति 

british sarkar ki akal niti;भारत के प्राचीन काल और मध्यकाल मे भी अकाल पड़ते थे परन्तु अकालों के समय किसानों और जनता की मदद के लिये शासन विशेष रूप से धन, अनाज एकत्रित करके रखता था और लगान आदि भी माफ करता था परन्तु ब्रिटिश काल 1857 से 1900 तक लगभग 24 अकाल पड़े और इनमे लगभग 2 करोड़ 85 लाख भारतीय मारे गये। इतने अधिक अकाल पड़ने और भारी संख्या मे मारे जाने वाले भारतीयों के क्या कारण थे? तथा इनके लिये कौन उत्तरदायी था? इन प्रश्नों का उत्तर अकाल नीति से था। 

कंपनी के अधीन अकाल नीति 

शुरूआत मे कंपनी ने अकाल संबंधी कोई नियमित नीति विकसित नही की। 1769-70 मे जब प्रथम गंभीर अकाल पड़ा तब कंपनी ने राहत कार्य हेतु कोई कदम नही उठाये। बल्कि चावल की खरीदी कर उसे अधिक कीमत पर बेच कर लाभ कमाया। पर 1792 के मद्रास-अकाल के समय जरूर कुछ किया गया। जब 1803 मे उत्तर-पश्चिम प्रांतो और अवध मे अकाल पड़ा तब लोगों को कर मे छूट दी गई तथा उन्हे ॠण दिये गये। परन्तु मोटे रूप मे यह कहा जा सकता है कि 18वीं सदी के अकालों के समय पर्याप्त आवश्यक कदम अंग्रेजों ने नही उठाये थे। 

हालाकि जब 1837 मे गंगा-यमुना क्षेत्र मे भीषण अकाल पड़ा था तब अधिकारियों ने परिस्थिति से निपटने के लिए विभिन्न राहत कार्य किये थे। स्वस्थ लोगों को काम देने की योजना बनाई गई। फिर भी कंपनी द्वारा उठाये गए यह कदम अपर्याप्त सिद्ध हुए। कुल मिलाकर कंपनी के राहत कार्य प्रशंसनीय नही कहे जा सकते। 

1858 के बाद या ताज के अधीन अकाल नीति 

1857 की क्रान्ति के बाद कंपनी के स्थान पर ताज का अधिकार हो जाने पर ताज ने अकाल के विरूद्ध एक सुनियोजित नीति विकसित करने का निश्चय किया। इसके लिए समय-समय पर कई आयोग गठित किए गए। यही नही, अकाल-संहिता भी बनाई गई। एक सुनिश्चित अकाल नीति आवागमन के साधनों के विस्तार, सामुद्रिक व्यापार के विकास, कृषि कानून के अधिनियम आदि से संभव हो पायी।

1860 का प्रथम आयोग 

अलवर, उत्तर पश्चिम प्रांतों आदि स्थानों पर मानसून-असफलता 1860 मे भीषण अकाल पड़ा था। सरकार ने परिस्थिति से निपटने के लिए राहत कार्य तो किये ही, अकाल के कारणों की जांच के लिए एक कमीशन भी बैठाया। कमीशन ने अपना विस्तृत प्रतिवेदन तो प्रस्तुत किया पर भविष्य के लिए वांछित कदम न उठाये जा सके।

1866-67 का द्वितीय आयोग 

1866-67 मे उड़ीसा, मद्रास (चेन्नई), उत्तरी बंगाल तथा बिहार मे अकाल पड़ा। सरकार आपदा से निपटने मे अक्षम सिद्ध हुई। तथापि एक आयोग को भविष्य के लिए आवश्यक अनुशंसाएं पेश करने के लिए कहा गया।

1878 का तृतीय (स्ट्रेची) आयोग 

19 वीं सदी का सबसे भीषण, भयानक, भयावह, भयंक, खतरनाक, दिल को दहला देने वाला अकाल 1876-78 मे पड़ा जिसने मद्रास (चेन्नई), बम्बई उत्तरप्रदेश और पंजाब को बहुत प्रभावित किया। इस अकाल ने कई जानें लीं तथा कई एकड़ भूमि को अनुर्वर बना दिया। सरकारी मशीनरी ने, निःसंदेह, कुछ कदम तो उठाये थे लेकिन वे पर्याप्त नही रहे। लिटन स्वयं के द्वारा उठाये गये कदमों से असंतुष्ट नही था।

अतः उसने स्ट्रेची की अध्यक्षता मे एक आयोग गठित कर उसे भविष्य मे इसी प्रकार की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस सिफारिशें प्रस्तुत करने को कहा। इस कमीशन की प्रमुख अनुशंसाए इस प्रकार थी--

1. अकाल के दरामियान राहत कार्य की जिम्मेवारी स्वयं राज्य लें।

2. अकाल मे राहत पाने के हकदारों के वर्ग बनाए गए तथा उनकी सूची तैयार की गई। राहत-शिविरों के लोगो को पैसा, कच्चा माल, पका खाना आदि के रूप मे राहत प्रदान का प्रावधान किया गया।

3. ह्रष्ट-पुष्टों के लिए कार्य के रूप मे राहत दी गई। कार्य के बदले पर्याप्त मजदूरी का प्रावधान किया गया।

4. भोजन प्रदाय पर उचित देखरेख की जाए।

5. राजस्व भुगतान या मुआफ कर दिया जाए या कुछ समय के लिए निरस्त।

6. जमींदारों को राहत कार्य हेतु प्रोत्साहित किया जाए। 

7. राहत योजनाएं अग्रिम हों।

8. अकाल संहिता बने जिस पर स्थानीय सरकार परिस्थितिनुसार अमल करें।

चौथा कमीशन आयोग 

1896-97 मे देश के अधिकतर हिस्से अकाल की चपेट मे आये। सरकार ने विस्तृत कदम उठाये पर वे विशेष कारगर नही रहे। अतः सरकार ने एक नया कमीशन बैठाया जिसकी अनुशंसाए 1880 के कमीशन की अनुशंसाओं पर ही आधारित थी। इस कमीशन की सिफारिशों के क्रियान्वयन के पूर्व ही एक अन्य अकाल पड़ा तथा अधिकारीगण समुचित कार्रवाई नही कर पाये।

पंचम कमीशन 

तब कर्जन ने मेकडोनल के अधीन एक कमीशन गठित किया। इसने आपात से निपटने के लिए तुरंत कार्रवाई की अनुशंसा की, राजस्व-मुआफी की सिफारिश की, ॠण व्यवस्था की बात कही, अविलंब पैसा वितरण की बात भी कही। कमीशन ने गैर अधिकारियों के भी सम्मिलित होने की अनुशंसा की। कर्जन ने आयोग की काफी अनुशंसाए मान्य कर लीं। अकाल-संहिता मे भी कुछ संशोधन किए गए। 1907-08 मे जब संयुक्त प्रांत मे अकाल पड़ा तो सरकार ने यथोचित कदम उठाये। 1918 के अकाल के समय मे सरकार के कदम असराहनीय नही कहे जा सकते।

षष्ठम आयोग 

1942-43 मे बंगाल मे भयानक अकाल पड़ा जिसमे काफी जान-माल की हानि हुई। अतः बंगाल अकाल जांच आयोग बैठाया गया जिसने--

1. अखिल भारतीय खाद्य समिति

2. खाद्य और कृषि विभागों के विलय 

3. खाद्य-उत्पादन वृद्धि 

4. खाद्य प्राप्ति और वितरण मे राज्य का एकाधिकार

5. वस्तुओं के उचित मूल्य निर्धारण आदि की बात कही। 

निष्कर्ष 

अंग्रेजों की अकाल नीति दूषित ही रही, ऐसा कहा जा सकता है। उनकी अकाल नीति के मूल मे उनकी धन लोलुपता, स्वार्थपरता तथा कृषकों और कृषकों के प्रति उनकी क्रूर एवं अत्याचारपूर्ण प्रवृत्ति का होना ही प्रकट करती है।

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