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11/29/2019

1947 के भारत विभाजन के कारण

भारत विभाजन 

भारत में भिन्न धर्मों का एक साथ होना हमारी एकता का प्रतिक हैं। कहा जाता हैं कि भारत में साम्प्रदायिकता का बीच अँग्रेजी सरकार ने ही बोया था। प्रो. अब्दुल मस्जिद खाँने इसके अनेक प्रमाण अपनी पुस्तक " कम्युनलिज्म इन इण्डिया, इट्स ओरिजिनल एण्ड ग्रोथ" में दिया हैं। आज के इस लेख मे हम सन् 1947 के भारत विभाजन के मुख्य  कारण जानेंगे। 
1947 में भारत के विभाजन का सबसे मुख्य कारण अंग्रेजों के षडयंत्रो तथा मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिकता की नीति थी। ब्रिटिश सरकार काफी समय से कांग्रेस को एक हिन्दू संस्था का नाम देकर मुस्लिम लीग को भड़का रही थी। ब्रिटिश सरकार के द्वारा पारित किये गयें सभी एक्ट साम्प्रदायिकता पर आधारित रहे थे।

सन् 1947 का भारत विभाजन भारत के लिए अत्यंत ही दुःख पूर्ण घटना थी। सदियों तक साथ-साथ रहने के बाद भी हिन्दू और मुसलमान अपने धार्मिक मतभेदों को मिटा न सके। अंग्रेजी शासन ने इस सांप्रदायिकता की भावना को निरंतर प्रोत्साहन दिया। अंग्रेजों ने फुट डालों और शासन करो की नीति की अपनाया।
भारत विभाजन
भारत का विभाजन 
अंग्रेजों ने मुसलमानों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए हिन्दू और मुसलमानों मे अंतर करना प्रारंभ कर दिया। जैसे की मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान करना, हिन्दुओं की राष्ट्रीयता की भावना के विरूद्ध उन्हे प्रयोग में लाने का प्रयत्य करना आदि। 

1947 के भारत विभाजन के प्रमुख कारण

1. मुस्लिम लीग की स्थापना एवं मुस्लिम साम्प्रदायिकता 

शिमला प्रतिनिधिमंडल के समय मुस्लिम नेताओं ने एक केन्द्रीय मुस्लिम सभा बनाने की सोची जिसका उद्देश्य केवल मुसलमानों के हित की रक्षा करना था। 30 दिसम्बर 1906 को "अखिल भारतीय मुस्लिम लोग का गठन हुआ। मुस्लिम लीग का उद्देश्य और दृष्टिकोण साम्प्रदायिकता और हठधार्मिता का रहा। लीग का उद्देश्य विदेशी हुकूमत के प्रति राजभक्ति मे वृध्दि और राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रवाह को रोकना था। सन् 1910 के समाप्त होते-होते मुस्लिम लीग की प्रतिक्रियावदी नीति कुछ शिथिल पड़ गई थी। मुसलमानों की नई पीढ़ी राष्ट्रीयता की ओर झुकने लगी थी उनमे राष्ट्रीय विचारों का विकास होने लगा था। लेकिन अब्दुल कलाम आजाद, मोहम्मद अली जिन्ना, अली बिन्दुओं, अजमल खां डाॅ. अंसारी जैसे आदि मुस्लिम नेताओं ने मुस्लिम राष्ट्रवाद के उत्कर्ष करने और साम्प्रदायिकता मे महत्वपूर्ण योगदान रहा।

2. कांग्रेस की संतुष्टीकरण की दुर्बल नीति

भारत-विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए कांग्रेस की संतुष्टीकरण की दुर्बल नीति भी उत्तरदायी रही थी। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की अनुचित मांगो को भी स्वीकार कर लिया था। अनेक अवसरों पर कांग्रेस ने अपने सिद्धान्तों को तक त्याग दिया था। 1916 ई. का "लखनऊ समझौता" में की गई भूल जिसके अन्तर्गत कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक प्रतिनिधित्व और उनको उनकी जनसंख्या से अधिक अनुपात में व्यवस्थापिका-सभाओं मे सदस्य भेजने के अधिकार को स्वीकार करना था। इससे मुसलमानों को बढ़ावा मिला।

3. साम्प्रदायिक हिंसा

खिलाफत आन्दोलन और असहयोग आंदोलन के समाप्त हो जाने के बाद साम्प्रदायिक विद्वेष की आग बढ़ने गली। सन् 1921 में मालाबार मे हुए मोपला विद्रोह ने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता को चिंगारी प्रदान की।  सन् 1922 से लेकर 1927 ई. तक हिन्दू-मुस्लिम उपद्रवों ने इतना भयावह रूप धारण कर लिया कि दोनों सम्प्रदाय की एकता का अतं होने लगा। मुस्लिम लीग धीरे-धीरे प्रतिगामी नेतृत्व की अधीनता में चली गई और मुसलमानों के बीच हिन्दूराज दिखा-दिखाकर अपनी जड़े मजबूत कर प्रारंभ कर दिया।

4. पाकिस्तान की माँग

डॉ. बृजेश कुमार श्री वास्तव की पुस्तक के अनुसार सन् 1930 में सर मुहम्मद इकबाल मुस्लिम लीग का सभापति बना उसने अपने भाषण मे कहा " मुस्लिम हितों की सुरक्षा एक पृथक राज्य की स्थापना के द्वारा ही सम्भव हो सकती हैं। इकबाल ने उन सभी मुसलमान बुध्दिजीवियों को गम्भीरता से प्रभावित किया जिन्होंने पाकिस्तान बनाये जाने की मांग की यद्यपि इकबाल ने पाकिस्तान शब्द को जन्म नहीं दिया था इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लन्दन मे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी चौधरी रहम अली और उनके तीन साथियों ने जनवरी 1933 ई. मे प्रकाशित किये गये छोटे पैम्पलेट "अब या फिर कभी नही" मे किया और दक्षिण में हैदराबाद, उत्तर-पूर्व में बंगाल और तीन मुसलमानी राज्यों को एक संघ राज्य में सम्मिलित करके उसका नाम पाकिस्तान रखने का विचार व्यक्त किया। सन् 1940 मे अपने लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने स्पष्टतया पाकिस्तान की माँग रखी। पाकिस्तान की पृष्ठभूमि का निर्माण पर्याप्त समय से पहले से ही हो चुका था।

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