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12/20/2020

आर्य समाज की स्थापना, सिद्धांत, कार्य, योगदान

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आर्य समाज की स्थापना (arya samaj ki sthapna)

arya samaj ki sthapna, siddhant, karya;कर्नल अल्काट स्वामी दयानंद सरस्वती से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने स्वामी दयानंद को अत्यत प्रभावी और दुर्धर्ष योद्धा बताया था। स्वामी जी ने वेदों मे निहित ज्ञान, दर्शन और विवेक के प्रचार और प्रसार के लिये और सामाजिक सुधारों के लिये बम्बई मे 1875 मे आर्य समाज की स्थापना की थी तथा अनेक शिक्षण संस्थाओं को आरंभ किया। 

आर्य समाज के सिद्धांत या नियम 

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने सन् 1875 मे बम्बई मे आर्य समाज की स्थापना की थी। आर्य समाज के मुख्य सिद्धांत या नियम इस प्रकार से है-- 

1. ईश्वर निराकार, अजन्मा और अमर है, वह सत्त, चित्त और आनंद है। वह सृष्टा, पालक और रक्षक है। सबको उसकी उपासना करनी चाहिए।

2. वेद सत्य ज्ञान के स्त्रोत है, प्रत्येक कार्य के लिए इनका अध्ययन, मनन-चिन्तन और प्रचार आवश्यक है।

3. बहु-देववाद और मूर्तिपूजा का खंडन तथा अवतारवाद और तीर्थ-यात्रा का विरोध।

4. वेदों के आधार पर यज्ञ, हवन, मंत्र-पाठ आदि करना। 

5. कर्म और पुनर्जन्म मे विश्वास करना।

6. अविद्या का नाश, विद्या व ज्ञान का प्रचार तथा शिक्षा का, विशेषकर स्त्री शिक्षा का प्रसार करना चाहिए। 

7. बाल-विवाह तथा बहु-विवाह का विरोध तथा विशिष्ट परिस्थितियों मे विधवा विवाह का समर्थन करना।

8. हिन्दी तथा संस्कृत का प्रचार करना। 

9. सत्य को ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।

10. समस्त कार्य पर सत्य व असत्य का विचार करना चाहिए।

11. समाज का मुख्य उद्देश्य शारीरिक, सामाजिक, आत्मिक उन्नति और संसार का उपकार करना है। 

12. पारस्परिक संबंध का आधार प्रेम, न्याय और धर्म होना चाहिए, और सबकी भलाई मे अपनी भलाई समझना चाहिए। 

14. सबको व्यक्तिगत मामलों मे सामाजिक हित मे स्वतंत्रत होना चाहिए, पर सामाजिक और सार्वजनिक हित का सदा ध्यान रखना चाहिए। आर्य समाज भक्तों तथा निराकार ईश्वर के मध्य किसी माध्यम की आवश्यकता नही मानता। वह पुरोहित या पुजारी वर्ग मे विश्वास नही करता।

आर्य समाज के कार्य (योगदान)

आर्य समाज के कार्य या योगदान इस इस प्रकार से है--

1. आर्य समाज के धार्मिक कार्य

आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को एक नवीन रूप दिया। उसने पुरापंथी हिन्दू धर्म का खंडन किया और वेदों को धर्म की आधारशिला और सत्य ज्ञान को मूल स्त्रोत माना। आर्य समाज ने अनेक देव-देवताओं मे विश्वास, मूर्ति-पूजा, ब्राह्रा कर्मकांड, बलि प्रथा, अवतारवाद तथा उन सभी कुरीतियों और विश्वासों की भर्त्सना की, उनका खंडन किया जिन्होंने हिन्दू समाज व धर्म को विकृत कर दिया। उसने वैदिक धर्म का प्रचार किया और वेदों पर आधारित मंत्र, पाठ, यज्ञ-हवन आदि पर बल दिया।

2. शुद्धिकरण 

ईसाई प्रचारकों तथा मुसलमानो ने अछूत एवं अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक ईसाई तथा मुस्लिम धर्म अंगीकार करने के लिए बाध्य किया था। धर्म परिवर्तित हिन्दू मूलतः पुनः धर्म प्रवेश हेतु छटपटा रहे थे। स्वामी जी ने बलपूर्वक धर्म परिवर्तित भारतीयों को वैदिक विधि से पुनः हिन्दू धर्म मे समाहित किया। लाखों नव-मुस्लिम एवं नव-क्रिश्चियन इस शुद्धिकरण की प्रक्रिया से पुनः हिन्दू धर्म मे सम्मिलित किए गए।

3. सामाजिक कार्य 

स्वामी दयानंद सरस्वती प्रखर बुद्धि के राष्ट्रवादी सुधारक थे। उन्होंने भारतीय समाज मे प्रचलित बाल विवाह, पर्दा प्रथा, बहुविवाह, जाति प्रथा, अस्पृश्यता आदि बुराइयों को खत्म करने का सराहनीय कार्य किया। वे समाज की बुराइयों के कटू आलोचक थे। स्वामीजी ने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह तथा अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित कर स्त्री समाज के उन्नयन का कार्य किया। उन्होंने विधवाश्रम तथा अनाथालयों की स्थापना की एवं समाज मे प्रचलित जादू-टोना एवं अंधविश्वासों को जड़मूल से समाप्त करने का अथक प्रयत्न किया। स्वामीजी ने समाज मे ब्राह्मणों के प्रभुत्व को खत्म कर सभी को वेदों का अध्ययन करने तथा अछूतों को भी उचित स्थान प्रदान करने का प्रयास किया। 

4. राजनैतिक व राष्ट्रीय कार्य 

आर्य समाज ने देश की राष्ट्रीय और राजनीतिक चेतना मे भी योगदान दिया। इसने हिन्दी का राष्ट्रीय भाषा के रूप मे प्रचार किया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार व स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। पश्चिमी विचारों, आदर्शों और संस्कृति को अपनाये जाने के विरोध मे आर्य समाज ने आंदोलन किया। विदेशी सभ्यता के विनाशकारी प्रभावों को समाप्त किया। यह उग्रवादी होने से इसने तीव्र राष्ट्रीयता को जन्म दिया। कांग्रेस के राष्ट्र-निर्माण के कार्यक्रम के अनेक भागों की प्रेरणा का श्रेय आर्य समाज को है। इसने दृढ़ चरित्र तथा स्वतंत्रता के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। इसने लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे अनेक कट्टर आर्य सामाजी नेता राजनीतिक क्षेत्र मे उतारें।

5. आर्य समाज की साहित्यिक एवं शैक्षणिक देन 

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती संस्कृत साहित्य तथा हिन्दी भाषा के प्रकांड पंडित थे। स्वामी जी ने छात्रों के जीवन मे ब्रह्मचर्य के महत्व को स्थापित कर गुरूकुल शुरू किए। इन गुरुकुलों अथवा आश्रमों मे जातिगत भेदभाव से दूर सभी जाति के बालकों के साथ समान व्यवहार किया जाता था। आर्य समाज ने भारत मे कई स्थानों पर डी. ए. वी. विद्यालय तथा महाविद्यालय स्थापित किए। 

आर्य समाज का महत्व 

इस्लाम और ईसाई धर्म प्रचार ने हिन्दू धर्म की खिल्ली उड़ाई थी। आर्य समाज ने दोनों पर कठोरता से आक्रमण किया और सत्य सनातन ( हिन्दू धर्म ) को इनके आक्रमणों और आलोचना से बचाने मे सफलता प्राप्त की। आर्य समाज ने पुराण पंथी हिन्दू धर्म को, उसके दोषों का निवारण करके, वेदों पर उसे आधारित करके सैनिक आक्रमण हिन्दू धर्म (Militant Hinduism) बना दिया। आर्य समाज ने हिन्दूओं मे नवीन चेतना, आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास और स्वाभिमान की भावना जागृत की।

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