11/01/2020

विवाह का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य

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विवाह का अर्थ (vivah kise kahte hai)

vivah arth paribhasha uddeshya;मोटे तौर पर विवाह का अर्थ दो विषम लिंगी व्यक्तियों मे यौन सम्बन्ध स्थापित करने की समाज की स्वीकृति विधि है।

हालांकि विवाह का आधार मानव की जन्मजात जैविक यौन भावना की संन्तुष्टि है किन्तु विवाह वस्तुतः इस भावना की सन्तुष्टि की समाज द्वारा स्वीकृत रीति है। इस दृष्टि से विवाह एक सामाजिक घटना है, न कि जैविक। वास्तव मे विवाह एक सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है। सार्वभौमिक इसलिए क्योंकि विश्व के सभी समाजो मे विवाह दिखाई देता है, भले ही इसका स्वरूप एक समाज से दूसरे समाज मे कुछ या काफी भिन्न हो।

विवाह की परिभाषा (vivah ki paribhasha)

विभिन्न विद्वानों द्वारा विवाह की परिभाषाएं इस प्रकार है--

गिलिन तथा गिलन के अनुसार " विवाह एक प्रजनन मूलक परिवार की स्थापना की समाज द्वारा स्वीकृत विधि है।" 

हैवलाक एलिस के अनुसार " विवाह दो व्यक्तियों, जो यौन सम्बन्ध और सामाजिक सहानुभूति के बंधन से एक दूसरे के साथ सम्बद्ध हो और जिसे यदि सम्भव हुआ तो अनिश्चितकाल तक बनाये रखना उनकी इच्छा पर है, के बीच परस्पर सम्बन्धों को कहते है। 

वेस्टरमार्क के अनुसार " विवाह एक या अधिक पुरूषो तथा एक या अधिक स्त्रियों के बीच वह सम्बन्ध है जो प्रथा या कानून द्वारा मान्य होता है और जो संघ मे आने वाले दोनो पक्षों और इससे उत्पन्न होने वाले बच्चों- इन दोनो ही स्थितियों मे कुछ अधिकार और कर्तव्यो को समावेशित करता है। 

लावी के शब्दों मे " विवाह उन स्पष्ट रूप से स्वीकृत संगठनो को व्यक्त करता है, जो इन्द्रीय संबंधी संतोष के बाद स्थिर रहता है तथा पारिवारिक जीवन का आधार बनता है। 

हाबेल के अनुसार " विवाह सामाजिक आदर्श नियमो का जाल है जो विवाहित दंपत्ति के पारस्परिक संबंधों उनके रक्त संबंधियो बच्चों एवं समाज के प्रति उनके संबंधो को नियंत्रित तथा परिभाषित करता है।" 

मजूमदार और मदान " विवाह एक सामाजिक बंधन या धार्मिक संस्कार के रूप मे स्पष्ट होने वाली वह संस्था है, जो दो विषम लिंग के व्यक्तियों को यौन संबंध स्थापित करने एवं उन्हें एक दूसरे से सामाजिक, आर्थिक संबंध स्थापित करने का अधिकार प्रदान करती है।" 

जेम्स के अनुसार " विवाह मानव समाज मे सार्वभौमिक रूप से पायी जाने वाली संस्था है,जो यौन संबंध, गृह संबंध, प्रेम एवं मानव स्तर पर व्यक्ति के जैवकीय, मनोवैज्ञानिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

विवाह के उद्देश्य (vivah ke uddeshya)

विवाह एक सामाजिक संस्था है। संस्था का विकास और अस्तित्व कतिपय सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति से सम्बन्धित होता है। यह आवश्यक नही है कि उद्देश्य सदा समान ही रहे। देश और काल के अनुसार विवाह के उद्देश्यों मे थोड़ा बहुत हेरफेर होता रहता है। उद्देश्यों मे साधारणतया उतना अंतर नही होता जितना कि उनके अधिमान्यता के क्रम मे होता है। विवाह के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है--

1. यौन इच्छा की स्थायी पूर्ति करना।

2. सन्तानोत्पत्ति और उत्पन्न संतान का पालन पोषण करना और अपने वंश को आगे बढ़ाना।

3. आर्थिक हितो की पूर्ति मे भागीदारी।

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