3/10/2022

सामाजिक व्यवस्था का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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प्रश्न; सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

अथवा" सामाजिक व्यवस्था की परिभाषा दीजिए। सामाजिक व्यवस्था की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। 

अथवा" सामाजिक व्यवस्था क्या है? इसके तत्वों को स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर-- 

सामाजिक व्यवस्था का अर्थ (samajik vyavastha kya hai)

सामाजिक व्यवस्था वह स्थिति या अवस्था हैं जिसमें सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाले विभिन्न अंग या इकाइयां सांस्कृतिक व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित पास्परिक प्रकार्यात्मक संबंध के आधार पर सम्बध्द समग्रता की ऐसी सन्तुलित स्थिति उत्पन्न करते हैं जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होती हैं।

सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा सावयवी सिद्धांत पर आधारित है। इसके अन्तर्गत समाज की विभिन्न इकाईयाँ क्रमबद्ध रूप से परस्पर संबंधित रहती है। इन इकाईयों के बीच प्रकार्यात्मक संबंध पाये जाते है। प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था किसी न किसी सांस्कृतिक व्यवस्था के अंतर्गत ही क्रियाशील रहती हैं।

सामाजिक व्यवस्था की परिभाषा (samajik vyavastha ki paribhasha)

पारसंस के अनुसार," अत्यंत ही सरल सम्भावित शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी परिस्थितियों में जिसका कि कम से कम एक भौतिक या पर्यावरण संबंधी पक्ष हो, अपनी इच्छाओं या आवश्यकताओं की आदर्श पूर्ति की प्रवृत्ति से प्रेरित एकाधिक वैयक्तिक कर्ताओं को एक दूसरे के साथ अंतः क्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं और इन अन्तः क्रियाओं में लगे हुए व्यक्तियों का पारस्परिक संबंध तथा उनका परिस्थितियों के साथ संबंध सांस्कृतिक रूप से संरचित तथा स्वीकृत प्रतीकों की एक व्यवस्था द्वारा परिभाषित और मध्यस्थित होता हैं।" 

मार्शल जोन्स के अनुसार," सामाजिक व्यवस्था वह स्थिति हैं, जिसमें समाज की विभिन्न क्रियाशील इकाइयाँ परस्पर तथा पूरे समाज के साथ क्रिया करती हुई एक अर्थपूर्ण ढंग से संबंधित रहती है।" 

सामाजिक व्यवस्था की विशेषताएं (samajik vyavastha ki visheshta)

सामाजिक व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-- 

1. एकाधिककर्ता 

एक से अधिक वैयक्तिक कर्ता परस्पर अंतःक्रिया करके सामाजिक व्यवस्था को जन्म देते हैं। 

2. आदर्श लक्ष्य 

ये अंतःक्रियायें समाज द्वारा स्वीकृत उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होती हैं।

3. क्रमबद्धता 

सामाजिक व्यवस्था की विभिन्न इकाईयाँ क्रमबद्ध रूप से परस्पर संबंधित होती हैं। इससे एक पृथक सम्पूर्णता का निर्माण होता हैं। 

4. प्रकार्यात्मक संबंध 

सामाजिक व्यवस्था की विभिन्न इकाईयों के बीच प्रकार्यात्मक संबंध होते है। ये सभी इकाईयाँ गतिशील और क्रियाशील रहकर कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होती हैं। 

5. पर्यावरण 

प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था अनिवार्य रूप से किसी न किसी भौतिक पर्यावरण में क्रियाशील होती हैं जो अनुकूल या प्रतिकूल भी हो सकता हैं। 

6. सामाजिक एकीकरण

सामाजिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों को उनकी योग्यता और कुशलता के आधार पर अनेक श्रेणियों में बांटकर प्रस्थिति और भूमिका का निर्धारण करना होता है। इसी से पास्परिक सहयोग तथा एकीकरण मे वृद्धि होती है। वास्तव में, सामाजिक एकीकरण सामाजिक व्यवस्था का मापदंड हैं। किसी समाज की सामाजिक व्यवस्था जितनी अधिक प्रभावशाली होती है, वहाँ सामाजिक एकीकरण की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती हैं। 

7. सांस्कृतिक व्यवस्था से संबंध 

सांस्कृतिक व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था का नियमन एवं नियंत्रण करती है। प्रथायें, रीति-रिवाज, धर्म आदि सामाजिक व्यवस्था में संघर्ष को दूर कर संतुलन बनाये रखने में योगदान देती हैं। 

8. आवश्यकताओं की पूर्ति 

भिन्न-भिन्न समाजों में भिन्न-भिन्न सामाजिक व्यवस्थायें पायी जाती हैं। लेकिन सभी का उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही होता हैं। 

9. गतिशीलता 

कोई भी सामाजिक व्यवस्था जड़ अथवा पूरी तरह स्थिर नहीं होती। इसमें गतिशीलता अथवा परिवर्तनशीलता का गुण पाया जाता हैं। इसका तात्पर्य यह हैं कि समय की मांग के अनुसार सामाजिक व्यवस्था में इस तरह परिवर्तन होता रहता हैं, जिससे व्यक्तियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ ही उनकी अन्तर्क्रियाओं के सन्तुलन को बनाए रखा जा सके।

सामाजिक व्यवस्था के आवश्यक तत्व

इस संबंध मे पारसन्स ने सामाजिक व्यवस्था के संरचनात्मक और संस्थात्मक पक्षों का उल्लेख किया हैं-- 

(अ) संरचनात्मक पक्ष 

इसके अंतर्गत आने वाले तत्व सामाजिक व्यवस्था की संरचना का निर्माण करते हैं। ये तत्व इस प्रकार हैं-- 

1. नातेदारी व्यवस्था

नातेदारी से व्यक्ति को कुछ प्रस्थितियाँ एवं भूमिकायें प्राप्त होती हैं जो प्रदत्त प्रकार की होती हैं। इनका संबंध परिवार एवं विवाह से होता हैं। 

2. सामाजिक स्तरीकरण 

स्तरीकरण के आधार पर लोगों को समाज में उच्च और निम्न स्थान प्राप्त होता हैं। इसी आधार पर उन्हें अधिकार एवं सुविधायें प्राप्त होती हैं। स्तरीकरण की उचित व्यवस्था दायित्व के निर्वाह की प्रेरणा देती हैं। 

3. शक्ति व्यवस्था 

समाज में संतुलन, एकता और नियंत्रण बनाये रखने तथा संघर्ष टालने के लिये शक्ति व्यवस्था आवश्यक होती हैं। 

4. सामाजिक मूल्य 

सामाजिक मूल्य व्यक्तियों के व्यवहारों में समरूपता लाते हैं तथा सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखते हैं। 

(ब) संस्थात्मक पक्ष 

इसके अंतर्गत आने वाले तत्व समाज में व्यवस्था एवं नियंत्रण बनाये रखते हैं--

1. सम्बन्धात्मक संस्थायें

कर्ताओं के पदों और भूमिकाओं को परिभाषित कर उनके पास्परिक संबंधों को निश्चित करती हैं। जैसे विवाह संस्था पति-पत्नी के संबंधों को बताती हैं। 

2. नियामक संस्थायें 

ये व्यक्ति के स्वार्थों पर नियंत्रण रखते हुये सुविधायें भी प्रदान करती हैं। पुरस्कार और दण्ड इसी श्रेणी में आने वाली संस्थायें हैं। 

3. सांस्कृतिक संस्थायें 

धर्म, विश्वास, प्रतीक, मूल्य आदि इसी के अंतर्गत आते हैं। इनका संबंध सम्पूर्ण समाज से होता हैं।

व्यवस्था के प्रकार 

व्यवस्था के प्रकारों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता हैं--

(अ) प्राकृतिक व्यवस्था

प्राकृतिक व्यवस्था का संबंध प्राकृतिक संसार से है। प्रकृति के जिन अंगों पर मानवीय नियंत्रण नही है उनमें पायी जाने वाली व्यवस्था को हम प्राकृतिक व्यवस्था कह सकते हैं। प्रकृति के ये तत्व स्वचलित होते हैं। प्राकृतिक व्यवस्था के दो प्रमुख भाग हैं-- 

1. सावयवी प्राकृतिक व्यवस्था 

वह व्यवस्था जो विभिन्न जीव-जन्तुओं के शरीरिक विन्यास और जैवकीय व्यवस्था में दिखाई देती हैं। विभिन्न प्राणियों की शारिरिक रचना अनेक कोष्ठों से निर्मित विभिन्न अंगों की सुनिश्चित स्थितियों और निर्धारित प्रकार्यात्मक संबंधों के आधार पर व्यवस्थित और सन्तुलित रूप से क्रियाशील सिद्धांतों से निश्चित होती हैं। 

2. असावयवी प्राकृतिक व्यवस्था 

इस व्यवस्था का संबंध जड़ पदार्थों का ब्राह्माण के विभिन्न निर्माण के तत्वों से हैं। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, मंगल आदि ग्रह और नक्षत्रों में पाई जाने वाली आन्तरिक व्यवस्था तथा इसके पारस्परिक आकर्षण और नियमित संबंधों की व्यवस्था प्रकृति की आजीवित व्यवस्था हैं। प्राकृतिक विश्व का निर्माण करने वाले इन शक्तिशाली तत्वों के अंदर एक आन्तरिक व्यवस्था पाई जाती हैं। 

(ब) मानवीय व्यवस्था 

प्राकृतिक संसार के अतिरिक्त एक ऐसा संसार भी है जिसका निर्माण प्रकृति के ही एक अंग मनुष्य ने स्वयं किया हैं। वह मानव निर्मित सृष्टि भी व्यवस्थित और सन्तुलित हैं। यह सत्य है कि मानवीय सृष्टि व्यवस्था उतनी स्थिर और पूर्ण नहीं जितनी प्राकृतिक व्यवस्था हैं। मानवीय व्यवस्था चार प्रकार की होती हैं-- 

1. व्यक्तित्व व्यवस्था 

मनुष्य की शारिरिक, मानसिक तथा सामाजिक विशेषताओं के योग का परिणाम। 

2. यांत्रिक व्यवस्था 

यह वह व्यवस्था है जो मनुष्य के द्वारा बनाये गये विभिन्न, यंत्रों मशीनों आदि में पायी जाती हैं। इसमें किसी पूर्ण यंत्र या मशीन के विभिन्न पुर्जों (इकाइयों) को प्रकार्यात्मक दृष्टि से इस प्रकार निश्चित स्थितियों में रख दिया जाता है कि वे स्वयं भी क्रियाशील रहते हैं और सम्पूर्ण मशीन को क्रियाशील रखते हुए उसमें सन्तुलन बनाये रखते हैं। 

3. सांस्कृतिक व्यवस्था 

मानव निर्मित विचारों, सिद्धांतों मूल्यों, आदर्शों, व्यवहार प्रतिमानों तथा संस्थागत इकाइयों की प्रकार्यात्मक सम्बद्धता से उत्पन्न आदर्श प्रतिमान के रूप में स्पष्ट की जाती है। 

4. सामाजिक व्यवस्था

अनेक मनुष्यों के प्रकार्यात्मक संबंधों के आधार पर, निश्चित सांस्कृतिक प्रतिमान के अन्तर्गत विकासेन अन्तः क्रियान्वित प्रतिमान से उत्पन्न सामाजिक सन्तुलन का नाम हैं।

शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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