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10/07/2020

वर्ग व्यवस्था का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं या लक्षण

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वर्ग व्यवस्था का अर्थ (varg kise kahte hai)

वर्ग सामाजिक स्तरीकरण आधार है। यूँ तो प्रचानी समाजों की रचना से लेकर आधुनिक समाजों की रचना को समझने मे वर्ग की प्रकृति मे होने वाले परिवर्तन की व्याख्या का महत्व है किन्तु विशेषरूप से आधुनिक समाजों की विवेचना वर्गों की संरचना को समझे बिना यदि असंभव नही तो कठिन अवश्य है। जब समाज मे व्यक्तियों की स्थिति का निर्धारण उनके व्यक्तिगक गुणों जैसे शिक्षा, आय, व्यवसाय, आवास की दशा आदि के आधार पर होता है तो समाज मे स्तर विभाजन की यह प्रणाली वर्ग व्यवस्था के नाम से जानी जाती है। यह एक खुली व्यवस्था है। इसमे व्यक्ति अपने प्रयास मे सफल या विफल होने पर अपने से उच्च या निम्म स्थिति को प्राप्त करता है और इस प्रकार वह अपने से उच्च या निम्म वर्ग का सदस्य बनता है। यद्यपि यह आसान या सामान्य नही है, किन्तु असंभव भी नही है। 

दूसरे शब्दों में " वर्ग समान सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह है। व्यक्ति लौकिक आयाम जैसे शिक्षा, पेशा, आय, आवासीय दशा या जीवनस्तर आदि पर अपनी अर्जित स्थिति के आधार पर एक वर्ग का सदस्य होता है। 

समाज मे समान अर्जित स्थिति वाले व्यक्ति एक वर्ग की रचना करते है। वर्ग के सदस्यों मे वर्ग चेतना पाई जाती है। वे न केवल अपनी वर्गीय स्थिति अपितु अपने वर्गीय हित के प्रति भी सचेत होते है। 

वर्ग व्यवस्था की परिभाषा (varg ki paribhasha)

मैकाईवर एवं पेज के अनुसार " सामाजिक वर्ग एक समुदाय का कोई भाग है जो सामाजिक स्थिति के आधार पर शेष भाग से पृथक किया जा सकता है।" 

गिसबर्ट के शब्दों मे " एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों का समूह अथवा एक विशेष श्रेणी है जिसकी समाज मे एक विशेष स्थिति होती है। यह विशेष स्थिति ही अन्य समूहों से उसके सम्बन्ध को निर्धारित करती है।

जिन्सबर्ग के अनुसार " वर्ग व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जो वंश, कुल, समाज, व्यवसाय धन और शिक्षा के कारण एक-सा जीवन व्यतीत करते है और जो समान विचारों, भावनाओं एवं व्यवहार का भण्डार रखते हों और जो इनमे से कुछ या सब के कारण एक दूसरे से समानता के आधार पर मिलते हो और अपने को एक समूह का सदस्य समझते हों, चाहे इस बात की चेतना उनके विभिन्न अंशों मे पाई जाय।" 

ऑगबर्न के अनुसार " एक सामाजिक वर्ग ऐसे व्यक्तियों का योग है, जिनकी एक दिये हुये समाज मे अनिवार्य रूप से समान सामाजिक स्थिति होती है।"

वर्ग व्यवस्था की विशेषताएं या लक्षण (varg ki visheshta)

1. उच्चता एवं निम्नता की भावना 

वर्ग व्यवस्था मे ऊँच नीच की भावना पाई जाती है। प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्तियों को अपने से ऊँचा या नीचा समझते है। अपने वर्ग के प्रति सभी वर्गों मे हम की भावना पाई जाती है।

2. समानता की भावना

एक वर्ग के व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति समानता की भावना रखते है। सामाजिक व धार्मिक कृत्यों के अवसर पर वे अपने वर्ग के व्यक्तियों का विशेष रूप से ध्यान रखते है।

3. खुली व्यवस्था 

वर्ग की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि वर्ग एक खुली व्यवस्था है। कोई भी व्यक्ति अपने गुणों और प्रतिभा से धनी होकर निम्म वर्ग से उच्च वर्ग मे जा सकता है। इसके विपरीत कोई भी व्यक्ति अपने दुर्गुणों के कारण और निर्धान होने पर उच्च वर्ग से निम्म मे चला जाता है।

4. सीमित सामाजिक सम्बन्ध 

एक वर्ग के सदस्यों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होते है। जबकि दूसरे वर्ग के सदस्यों के साथ उनके सम्बन्ध उतने घनिष्ठ नही होते। इस प्रकार एक वर्ग के सदस्य दूसरे वर्ग के सदस्यों के साथ एक निश्चित सामाजिक दूरी बनायें रखते है।

5. जन्म का महत्व नही

वर्ग व्यवस्था जाति के तरह जन्म पर आधारित नही होती। वर्ग मे जन्म का महत्व नही होता। व्यक्ति भालेही किसी भी वर्ग मे जन्म ले, परन्तु वह किस वर्ग मे रहेगा? वह उसकी शिक्षा, योग्यता, कुशलता आदि पर निर्भर करता है।

6. कम स्थिरता 

चूंकि वर्ग व्यक्ति के गुणों पर निर्भर करता है अतः यह अपेक्षाकृत कम स्थिर है। व्यक्ति गुणों को अर्जित कर अपनी स्थिति मे समय-समय पर परिवर्तन करता रहता है।

7. पृथक संस्कृति 

प्रत्येक वर्ग के रीति-रिवाज, रहन-सहन और आचार व्यवहार आदि का एक निश्चित ढंग होता है। सभी वर्ग इस ढंग को स्थायी बनाने का प्रयास करते है।

8. अन्तर्वर्गीय विवाह 

यद्यपि वर्ग मे जाति की तरह कठोरता नही पायी जाती फिर भी इसे जाति से कुछ ही कम कह सकते है। अधिकतर प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ग मे ही विवाह करना पसंद करता हैं।

9. वर्ग चेतन

वर्ग व्यवस्था की एक विशेषता यह भी है कि सामाजिक वर्ग के सदस्यों मे वर्ग चेतना पायी जाती है। यही चेतना व्यक्ति के व्यवहार को निश्चित करती है। वे कुछ समूहों को अपने से नीचे और कुछ को ऊँचा मानते है।

10. उपवर्ग 

प्रत्येक वर्ग मे उपवर्ग भी पाये जाते है। जैसे-- सभी धनी लोग एक वर्ग मे नही आते। उनमे भी उच्च-उच्चवर्ग, उच्च मध्यम वर्ग एवं निम्न मध्यम वर्ग होते है।

11. समूहों का संस्तरण 

प्रत्येक समाज मे वर्गों की एक श्रेणी होती है। इसमे उच्च, मध्यम एवं निम्न स्तर होता है। उच्च वर्ग के सदस्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं अधिकार अन्य वर्गों की तुलना मे सर्वाधिक होते है। इसमे सदस्य संख्या कम होती है। निम्न वर्ग मे लोगों की संख्या अधिक होती है और उनकी प्रतिष्ठा एवं अधिकार भी सबसे कम होते है।

12. अर्जित स्थिति

वर्ग व्यवस्था मे व्यक्ति अपनी स्थिति जन्म के आधार पर नही अपितु वह अपनी सामाजिक स्थिति अपने गुणों से अर्जित करता है। इस प्रकार वर्ग पूर्णतः अर्जित होते है।

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