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11/04/2020

जाति अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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jati arth paribhasha visheshta;भारतीय समाज प्रमुख रूप से जाति प्रधान समाज है। यहां सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख आधार जाति प्रथा रहा है। इस समय भारत मे अनगिनत जातियां एवं उपजातियां है।  सभी जातियों की अपनी-अपनी विशेषताएं है। वास्तव मे जाति व्यवस्था सिर्फ भारतीय समाज की उपज तथा अनुपम संस्था है। आज हमारा समाज लगभग तीन हजाय जातियों तथा उपजातियों मे विभाजित है एवं यह प्रथा सिर्फ हिन्दुओं तक ही सीमित न होकर मुसलमानों एवं ईसाइयों तक मे भी कुछ सीमा तक प्रवेश कर गई है।

जाति का अर्थ (jati kya hai)

'जाति' शब्द अंग्रेजी का पर्यायवाची शब्द 'कास्ट' है। अंग्रेजी के 'कास्ट' शब्द का जन्म पुर्तगाली भाषा के कास्टा से हुआ है, जिसका अर्थ है नस्ल, प्रजाति अथवा प्रजातीय भेद। कास्ट शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1563 मे ग्रेसियों डी ओरटा ने यह लिखकर किया था कि," कोई अपने पिता के व्यवसाय को नही छोड़ता एवं चमारों की जाति के सब लोग एक समान है।" 

जाति का यह शाब्दिक भावार्थ है। जाति का वास्तविक अर्थ एक सामाजिक समूह के रूप मे लिया जाता है, यह एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसकी सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है।

जाति की परिभाषा (jati ki paribhasha)

मजूमदार और मदन के अनुसार," जाति एक बंद वर्ग है।" 

कूले के अनुसार," जब एक वर्ग पूर्णतया वंशानुक्रमण पर आधारित होता है तो हम इसे जाति कहते है।" 

हावेल के अनुसार," अन्तर्विवाह और वंशानुक्रमण द्वारा प्रदत्त पद की सहायता से सामाजिक वर्गों को जमा देना ही जाति है।" 

रिजले के अनुसार," यह परिवारों या परिवारों के समूहों का संकलन है जिनका एक सामान्य नाम होता है, अपने को किसी काल्पनिक पूर्वज मानव अथवा दिव्य के वंशज बतलाते है, जो एक से आनुवांशिक व्यवसाय करने का दावा करते है, तो उन लोगों के द्वारा, जो अपना मत प्रदर्शित करने के योग्य है, एक ही समुदाय के समझे जाते है।" 

केतकर के अनुसार," जाति दो विशेषताओं वाला सामाजिक समूह है। 

1. सदस्यता उन्ही व्यक्तियों तक सीमित रहती है, जो सदस्यों से उत्पन्न होते है एवं इस प्रकार उत्पन्न सभी व्यक्ति उसमे शामिल रहते है एवं

2. सदस्यों पर एक अनुलंघनीय सामाजिक नियम द्वारा जाति के बाहर विवाह करने पर प्रतिबंध रहता है।

2. मैकाइवर तथा पेज के अनुसार," जब स्थिति पूर्ण रूप से पूर्व निश्चित हो, ताकि मनुष्य बगैर किसी परिवर्तन की आशा के अपना भाग लेकर उत्पन्न होते हो तब वर्ग जाति का रूप ले लेता है।" 

संक्षेप मे," जाति वंशानुगत व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जो परम्परागत व्यवसाय करते है तथा जातीय नियमों और निषेधों का पालन करते है।"

जाति की विशेषताएं (jati ki visheshta)

जाति प्रथा की परिभाषाओं से ही इसकी प्रमुख विशेषताएं स्पष्ट हो जाती है। एन. के. दत्त ने जाति प्रथा की निम्न विशेषताएं बतालाई है--

1. जाति के सदस्य अपनी जाति के बाहर विवाह नही कर सकते, अर्थात् यह अन्तर्विवाही होता है। (हांलाकि वर्तमान समय मे अब कही-कही अपनी जाति से बाहर प्रेम विवाह भी किये जाती है।) 

2. हर जाति मे अन्य जातियों के साथ खान-पान से संबंधित कुछ प्रतिबंध होते है। 

3. हर जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता है। 

4. सभी जातियों तथा उपजातियों मे ऊंच-नीच की व्यवस्था या संस्तरण पाया जाता है, जिसमे ब्राह्मण जाति का स्थान सर्वोपरि है एवं सभी स्थानों पर मान्यता प्राप्त है।

5. जाति का निर्धारण जन्म से ही हो जाता है। सिर्फ जाति के नियमों के विपरीत कार्य करने पर व्यक्ति को जाति से बाहर निकाल दिया जाता है। इसके अलावा एक जाति से दूसरी जाति मे जाना असंभव है।

6. संपूर्ण जाति व्यवस्था ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा पर निर्भर है।

किंग्सले डेविस ने जाति प्रथा के निम्न सात प्रमुख लक्षण बताए है--

1. जाति की सदस्यता वंशानुगत होती है अर्थात् जन्म से ही बच्चा अपने माता-पिता की जाति को ग्रहण कर लेता है।

2. जाति की सदस्यता जन्मजात रहती है, अर्थात् कोई व्यक्ति किसी भी प्रयत्न द्वारा अपनी जाति नही बदल सकता है।

3. जाति अन्तर्विवाही समूह है अर्थात् जीवनसाथी का चुनाव अपनी ही जाति मे होता है।

4. जाति अपने सदस्यों पर दूसरे समूहों के साथ खानपान-सामाजिक सहवाह, सहयोग, संपर्क आदि पर प्रतिबंध लगाती है।

5. प्रत्येक जाति का एक नाम होता है, जो कि जातीय चेतना को बल देता है।

6. प्रत्येक जाति का परम्परागत व्यवसाय होता है। व्यवसाय के अलावा सामान्य जनजातीय या प्रजातीय संबंधी विश्वासों, सामान्य धार्मिक कृत्यों अथवा किन्हीं अन्य विशेषताओं द्वारा जाति संगठित होती है।

7. प्रत्येक जाति के बीच श्रेष्ठता एवं निम्नता की भावना पाई जाती है।

जाति प्रथा की संरचनात्मक तथा संस्थागत विशेषताएं 

1. समाज का खण्डात्मक विभाजन 

जाति प्रथा के कारण भारत कई खण्डों मे विभाजित हो गया एवं प्रत्येक खण्ड की प्रस्थिति तथा भूमिका सुनिश्चित कर दी गई है।

2. संस्तरण 

जाति व्यवस्था ऊंच-नीच की व्यवस्था है अर्थात् विभिन्न जातियों मे संस्तरण पाया जाता है एवं प्रत्येक जाति की प्रस्थिति अन्यों से ऊंची अथवा नीची है। कुछ जातियों मे परस्पर दूरी इतनी कम है कि उनमे ऊंच-नीच कर पाना एक कठिन कार्य है।

3. जन्म से निर्धारिण 

जाति की सदस्यता जन्म द्वारा निर्धारित होती है, अर्थात् व्यक्ति जन्म से ही जाति विशेष की सदस्यता ग्रहण कर लेता है, जो कि जीवन भर रहती है एवं किसी भी कार्य द्वारा वह अपनी जाति की सदस्यता बदल नही सकता।

4. खान-पान एवं सामाजिक सहवास पर प्रतिबंध 

प्रत्येक जाति अपने सदस्यों पर अन्य जातियों के लोगों के साथ खान-पान एवं सामाजिक सहवास पर नियंत्रण लगाती है तथा इन नियमों का कठोरता से पालन किया जाता है।

5. अपनी ही जाति मे विवाह को मान्यता अथवा अंतर्विवाह 

जाति का एक मुख्य लक्षण अन्तर्विवाह है अर्थात् प्रत्येक जाति अपने सदस्यों को अपनी ही जाति मे विवाह करने की अनुमति देती है।

6. परम्परागत पेशा 

प्रत्येक जाति का एक निश्चित परम्परागत वेशा होता है एवं जाति के सभी सदस्य इसी पेशे को अपनाते है। यह पेशा पैतृकता द्वारा ही अपनाया जाता है एवं इसे छोड़ना उचित नही माना जाता है।

7. आर्थिक व सामाजिक निर्योग्यताएं तथा विशेषाधिकार 

जातीय संस्तरण के अनुसार इसके साथ धार्मिक एवं सामाजिक निर्योग्यताएं तथा विशेषाधिकार भी जुड़े हुए थे। निम्न जातियों, विशेष रूप से अछूत जनजातियों को कई निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था। वे सार्वजनिक स्थानों से पानी नही ले सकती थीं। उसका प्रयोग नही कर सकती थी, उनका निवास स्थान गाँव से बाहर होता था एवं कहीं-कहीं तो उनके बाहर निकलने का समय भी निश्चित कर दिया गया था। दूसरी तरफ उच्च जातियों को कई विशेषाधिकार मिले हुए थे।

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