11/03/2020

विवाह का महत्व या आवश्यकता

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विवाह की आवश्यकता या महत्व अथवा विवाह के सामाजिक कार्य 

 Vivah ka mahatva;मनुष्य की कुछ जैविक आवश्यकताएं होती है, जिनकी पूर्ति उसके जीवन मे आवश्यक होती है। भूख, प्यास और श्वास इस प्रकार की आवश्यकताएं है, जिनकी पूर्ति व्यक्ति के अस्तित्व के लिए नितान्त आवश्यक है। इनकी पूर्ति के अभाव मे व्यक्ति जीवत ही नही रह सकता। इन्ही की भाँति यौन संबंध भी मानव की एक महत्वपूर्ण जैविक आवश्यकता है। यौन तृप्ति के अभाव मे वह जीवित तो रहता है किन्तु उसका स्वाभाविक विकास कठिन हो जाता है। 

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बिना यौन संबंधों के सन्तान, दूसरे शब्दों मे जनसंख्या की निरन्तरता का प्रश्न नही उठता और बिना जन सम्बन्ध अथवा समाज के अस्तित्व का सवाल पैदा नही होता। इस प्रकार यदि भोजन के अभाव मे व्यक्ति जीवित नही रह सकता तो यौन सम्बन्धों  के अभाव मे समाज जीवित नही रह सकता, किन्तु यह तो एक आवश्यक शर्त है, पर्याप्त नही। समाज के अस्तित्व के लिए समाज मे शांति, संगठन और व्यवस्था की भी आवश्यकता पड़ती है, जो किसी सीमा तक समाज मे यौन और ऐसे अन्य सम्बन्धों को निश्चित, नियमित व नियंत्रित करने के माध्यम से प्राप्त की जाती है। समाज का हित व्यक्ति के हित मे और व्यक्ति का हित समाज के हित मे निहित होता है। दोनो ही हितों मे सामंजस्य होता है, न कि विरोध। अगर इसने सामंजस्य न हो तो न तो व्यक्ति का जीवन सुरक्षित रह सकता है और न समाज का। विवाह का महत्व या आवश्यकता को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है--

1. संतानोत्पत्ति तथा पालन पोषण की व्यवस्था करना 

विवाह  संस्था का प्रमुख कार्य संतानोत्पत्ति करना, वैधता प्रदान करना, उनके पितृत्व का निर्धारण करना तथा उनके पालन पोषण की व्यवस्था करना है। अगर इस संस्था द्वारा संतानोत्पत्ति का कार्य पूरा नही होता तो सृष्टि की यह निरंतरता खत्म हो जाती।

2. यौन संतुष्टि प्रदान करना 

विवाह संस्था दो विषम लिंगियों को यौन संतुष्टि प्रदान करती है। इसके द्वारा व्यक्ति की जैवकीय तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

3. यौन संबंधो को व्यवस्थित करना 

यौन संतुष्टि मानव की प्रमुख आवश्यकताओं मे से एक है। व्यक्ति अगर स्वतंत्र तथा अनियमित रूप से इस इच्छा की संतुष्टि करने लगे तो इससे संघर्षों मे वृद्धि होगी, साथ ही अनैतिकता बढ़ने से समाज का संगठन भी खत्म हो सकता है। विवाह इस स्थिति मे व्यक्ति तथा समाज की रक्षा करता है एवं कई प्रतिबंधों तथा नियमों के अंतर्गत व्यक्ति को यौन संतुष्टि का अधिकार प्रदान करता है।

4. संबंधो मे स्थायित्व 

विवाह संस्था ने दो विषम लिंगियों के बीच संबंधों मे स्थायित्व प्रदान किया है। इस संस्था की उत्पत्ति के पहले पत्नी नाम के व्यक्तित्व का अभाव था। इस तरह विवाह संस्था ने दो इच्छित विषम लिंगियों को पती पन्ति के रूप मे संबोधित करके उनके परस्पर संबंधों को स्थायित्व प्रदान किया है। इस स्थायित्व के द्वारा अवैध संतानो की समस्या एवं स्त्री जाति की चरित्रता आदि की समस्याओं से बचने का कार्य पूर्ण होता है।

5. विवाह समाज कल्याण मे मददगार होता है

विवाह सामाजिक तथा सांस्कृतिक संस्था है। विवाह स्त्री-पुरूष के एक दूसरे के प्रति और भावी संतानों के प्रति उत्तरदायित्वों को निश्चित करता है। इस दृष्टि से विवाह समाज कल्याण हेतु महत्वपूर्ण है।

6. सांस्कृतिक निरंतरता 

हरिदत्त वेदालंकार ने लिखा है, " सांस्कृतिक दृष्टि से विवाह किसी समाज मे परंपराओं के संरक्षण तथा व्यक्तित्व के निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य करता है। विवाह द्वारा बनने वाले परिवार मे बच्चा अपने समाज के आचार-व्यवहार, रीति-रिवाज, धार्मिक तथा नैतिक विश्वासों एवं आदर्शों से परिचित होता है, उन्हें सीखता है तथा अपने को उन आदर्शों के अनुरूप साँचे मे ढ़ालता है। इस तरह नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अपने सांस्कृतिक दाय को ग्रहण करती है एवं उसके सातत्य को बनाये रखती है।" 

7. परिवार का निर्माण करना 

सभी समाजो से विवाह का सर्व प्रमुख कार्य परिवार का निर्माण करना है। व्यक्ति जब तक अपने परिवार का निर्माण नही करता उसका जीवन साधारणतया व्यक्तिवादी, अकेला तथा कभी कभी अनुत्तरदायी भी रहता है। विवाह संस्था व्यक्ति को मान्यता प्राप्त तरीके से परिवार का निर्माण करने का अवसर प्रदान करती है एवं इस तरह समाज मे व्यक्ति की स्थिति को ऊंचा उठाती है।

8. आर्थिक सहयोग 

यौन संतुष्टि के समान व्यक्ति की कई भौतिक आवश्यकताएं होती है जिनकी पूर्ति नितांत जरूरी है। उदाहरण के लिए मानव मे उदरपूर्ति एवं सुरक्षा की प्रवृत्ति होती है। शारीरिक सुरक्षा एवं उदरपूर्ति के लिए सहयोग जरूरी है। स्त्री पुरुष सहयोग के द्वारा अपनी इन प्रवृत्तियों को शांत कर पाते है। इसी तरह आर्थिक सहयोग भी विवाह का एक प्रमुख कार्य है।

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