11/06/2020

भारतीय संस्कृति की विशेषताएं

By:   Last Updated: in: ,

भारतीय समाज व संस्कृति

bhartiya sanskriti ki visheshta;भारतीय संस्कृति विश्व की एक महान् तथा प्राचीनतम संस्कृति है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। विश्वविख्यात कला-समीक्षक हेवल ने लिखा है, " किसी भी दूसरे राष्ट्र ने, प्राचीन हो या आधुनिक, इतनी उच्च संस्कृति का निर्माण नही किया। किसी भी धर्म को जीवन दर्शन बनाने मे इतनी सफलता नही मिली। यहां तक कि कोई मानवीय ज्ञान इतना समृद्ध और शक्तिशाली नही हो सका जितना कि भारत मे हुआ।" 

जर्मनी विद्वान मैक्समूलर ने मुग्ध होकर लिखा है," यदि मुझसे पूछा जाए कि किस देश मे मानव मस्तिष्क ने अपनी सूक्ष्यतम शक्तियों को विकसित किया, जीवन के बड़े से बड़े प्रश्नों पर विचार किया, तो मै भारतवर्ष की ओर संकेत करूंगा।" भारत के ज्ञान, दर्शन तथा साहित्य ने न केवल इस देश के निवासियों को प्रेरित किया, वरन् विदेशी विद्वानों तक को प्रभावित किया है। 

भारतीय संस्कृति की विशेषताएं (bhartiya sanskriti ki visheshta)

भारतीय संस्कृति की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. दीर्घकालीन स्थायित्व 

भारतीय संस्कृति का 5,000 वर्षों का एक लम्बा इतिहास है। मानवीय संस्कृतियों मे दो ही ही ऐसी संस्कृतियां है-- चीन और भारतीय जो अतीत काल से अब तक सतत् रूप मे स्थायी रही है। मिस्त्र,बेबीलोन,यूनान तथा रोम की संस्कृतियां अपने चरम वैभव पर पहुंचकर काल के गाल मे विलीन हो गई। उनकी भाषा, धर्म, कला कौशल, विज्ञान अब पूर्णतया लुप्त है। इतिहास के विशेषज्ञों के अतिरिक्त उनका किसी को ज्ञान नही है। 

इसके विपरीत भारतीय संस्कृति ने आज भी अपने हजारों वर्ष पुराने रूप को खोया नही है। आज से युगों पूर्व गीता और उपनिषदों ने ज्ञान तथा आध्यात्म की धारा प्रवाहित की थी वह आज भी असंख्य भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। वेद, उपनिषद, मनुस्मृति रामायण, महाभारत आदि ऐसे गंथ्र है जिनको आज भी प्रत्येक भारतीय बड़े आदर से देखता है। यह सत्य है कि हमारे भारत पर अनेक विदेशी जातियों ने आक्रमण किए परंतु वे उसके मूल रूप को नष्ट करने मे असमर्थ रहे।

2. व्यापकता 

भारतीय संस्कृति की एक विशेषता यह है कि भारतीय संस्कृति का क्षेत्र बहुत व्यापक रहा है। मानव जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नही है जिस पर भारतीय चिंतकों ने गहराई से विचार न किया हो। जीवन का बहुमुखी विकास भारतीय संस्कृति का प्रमुख लक्ष्य रहा है, इस कारण ही इसका क्षेत्र सर्वाधिक व्यापक व विशाल रहा है। भारतीय दार्शनिकों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि पक्षों पर विस्तार से विचार किया है। आश्रम प्रणाली भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का प्रमाण है। प्रायः पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता के आधार पर यह दोष लगाया है कि संस्कृति केवल धार्मिक है तथा इसमे सन्यास और परलोक पर ही मुख्यतया विचार किया गया है। परन्तु यह आरोप पूर्णतया गलत है। यह सत्य है कि भारतीय संस्कृति मे आध्यात्मिकता पर बल दिया गया परन्तु साथ ही उसमे सांसारिक सुखों की अवहेलना भी नही की गई है। तैत्रेयोपनिषद मे गुरू शिष्य को शिक्षा देते हुए कहते है," ऐसे कार्यों से मुख मत मोड़ो जो तुम्हें समृद्धि देते है। उस रास्ते पर चलने से इंकार मत करो जो वित्तीय तथा सामाजिक स्थिति को ऊंचा उठाते है।" 

3. मिली जुली या मिश्रित संस्कृति 

प्राचीन काल मे भारत मे अनेक विदेशी जातियों का आगमन होता रहा है। कुछ ने यहाँ पर्याप्तकाल तक शासन किया और स्थायी रुप से भारत मे बस गयी। भारतीय संस्कृति इन्हीं विविध जातियों के सम्मिलित अंशदान का फल है। अन्य शब्दों मे आर्य, अनार्य, शक, यूनानी, कुषाण, हूण तथा पारसी आदि विभिन्न संस्कृतियों के योग से ही भारतीय संस्कृति का विकास हुआ। ये विभिन्न जातियां भारत मे समय समय पर आती रही तथा भारत के जनजीवन मे इस प्रकार घुल-मिल गयी कि आज यह कहना कठिन है कि हम कौन आर्य, कौन द्रविड़, कौन शक तथा कौन हूण है? इन विदेशी जातियों ने भारतीय भाषा, धर्म व नीति-विधान को अपना लिया था।

4. दार्शनिकता तथा आध्यात्मिकता 

दार्शनिकता तथा आध्यात्मिकता भी भारतीय संस्कृति की एक मुख्य विशेषता है। श्री अरविंद का कथन है कि ," आध्यात्मिकता भारतीय मस्तिष्क को समझने की कुंजी है।" यह आध्यात्मिकता ही भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग करती है। आत्मा और परमात्मा के विषय मे जितना भारतीयों ने चिंतन किया उतना संभवतः अन्य किसी जाति ने नही किया। भारत मे सदा ही दार्शनिकों और चिंतकों को महत्व इस कारण ही दिया गया क्योंकि यहाँ की जनता अध्यात्म और दर्शन मे विशेष रूचि रखती थी। श्री अरविंद लिखते है," भारतीय सभ्यता मे धर्म द्वारा क्रियाशील हुआ दर्शन और दर्शन द्वारा आलोकित धर्म ही नेतृत्व करते आए है। शेष सभी चीजें कला, काव्य आदि यथासंभव उसका अनुसरण करती रही है। नि:संदेश भारतीय सभ्यता की पहली विशेषता यही है।... इसके पीछे तथ्य यह है कि भारतीय संस्कृति आरंभ से ही एक आध्यात्मिक व अंतर्मुखी धार्मिक व दार्शनिक संस्कृति रही है और बराबर ऐसी ही चली आयी।" भारत मे धनवानों को इतनी प्रतिष्ठा नही मिली जितनी कि आध्यात्मिक क्षेत्रों मे नेतृत्व करने वाले महापुरुषों को मिली। 

5. सहिष्णुता व उदारता 

सहिष्णुता की परंपरा भारतीय संस्कृति की अन्य विशेषता रही है। प्राचीन काल से ही यहाँ धर्म के क्षेत्र मे सदा उदारता और सहिष्णुता की नीति का ही पालन किया गया है। वेदों मे उल्लेख है कि " शक्ति तो एक ही है उसके स्वरूप विभिन्न है।" अन्य शब्दों मे धार्मिक विद्वेष को हमारे देश मे कोई स्थान नही दिया गया। प्राचीन भारतीय सम्राटों ने कभी भी अन्य धर्मों के अनुयाइयों की भावनाओं को ठेस नही पहुंचाई। अशोक बौद्ध होते हुए भी अन्य धर्मों का आदर करता था तथा ब्राह्मणों को दान देता था। उसका कथन था कि " देवताओं के प्रिय (अशोक) दान या पूजा की इतनी परवाह नही करते, जितनी इस बात की कि सब संप्रदायों मे सार या मेल की वृद्धि हो। संप्रदायों मे मेल की वृद्धि अनेक प्रकार से होती है पर उसकी जड़ वाणी का संयम है, अर्थात्  लोग अपने ही संप्रदाय का आदर और बिना कारण दूसरे संप्रदाय की निंदा न करें।

6. समन्वयपरक       

भारतीय संस्कृति को एक महासागर कहा जा सकता है जिसमे विभिन्न दिशाओं से आकर अनेक सांस्कृतिक नदियां लीन हो गई। अन्य शब्दों मे भारतीय संस्कृति समन्वयपरक है। सभ्यता के प्रारंभ के साथ-साथ भारतवासियों मे यह गुण विकसित हो गया था कि वे भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों व कला शैलियों के बीच समन्वय करने लगे थे। भारतीयों को जिस संस्कृति से जो अच्छा मिला वह उन्होंने ग्रहण किया। द्रविड़ों तथा आर्यों के विचारो व संस्थाओं के बीच समन्वय करके हिन्दु धर्म का जन्म हुआ। भारतीयों ने विदेशियों से भी बहुत कुछ ग्रहण किया। भारतीय कला के विकास मे हमे इसके उदाहरण मिलते है। मूर्तिकला की गंधार शैली यूनानी कला से प्रभावित है। मौर्य कला भी पर्सेपोलिस की कला से प्रभावित है। मुगल चित्रकला और राजपूत चित्रकला भी विदेशी प्रभाव का परिणाम है।

आधुनिक युग मे भी हमारे देश मे समन्वय की प्रवृत्ति चलती रही। पुनर्जागरण काल मे राजा राममोहन राय ने पश्चिम के ज्ञान विज्ञान को भारतीयों से ग्रहण करने को कहा था। महात्मा गांधी ने इस्लाम और ईसाई धर्म की अच्छाइयों को अपनाने पर बल दिया। उन पर टाल्सटाय, थोरियों तथा अन्य पश्चिमी विचारकों का प्रभाव था। वे ईसाई धर्म से अत्यधिक प्रभावित थे। वे अपने जीवन के अंतिम काल तक हिन्दुओं को इस्लाम व ईसाई धर्म की अच्छाइयों को अपनाने का परामर्श देते रहे।

7. सत्य और अहिंसा पर बल 

वैदिक ब्राह्मणों, बौद्धों तथा जैनियों आदि सभी भारतीय धर्मों ने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाने पर बल दिया। सभी ने सत्य के महत्व को स्वीकार किया और उसे दैनिक जीवन मे अपनाने पर बल दिया। इसी प्रकार सभी धर्मों ने अहिंसा के महत्व को स्वीकार किया। आज भी इस सिद्धांत को महात्मा गांधी ने पुनः जीवित किया तथा राजनीति तक मे अहिंसा को अपनाने पर बल दिया। प्राचीन भारतीय सम्राट भी यथासंभव अहिंसा की नीति का पालन करने का प्रयास करते थे।

8. जाति व्यवस्था 

जाति व्यवस्था एक ऐसी विशेषता है जो भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग करती है। अतीत काल से ही भारतीय समाज वर्ग और जातियों मे विभाजित रहा है और आज भी है। हिन्दू स्मृतियों के अनुसार प्रत्येक जाति को अपने धर्म का पालन निष्ठा के साथ करना चाहिए। ऐसा करने से उसका मोक्ष है। यदि प्रत्येक जाति अपने धर्म का पालन सच्चे ह्रदय से करेगी तो संपूर्ण समाज का कल्याण होगा।

जाति व्यवस्था का महत्वपूर्ण कार्य श्रम-विभाजन की सरल व्यवस्था करके समाज को संगठित बनाए रखना है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के आरंभिक समय से ही जाति के द्वारा एक विशेष कार्य प्रदान किया जाता है। सभी जातियों के सदस्य जाति द्वारा निर्धारित कार्य को करना अपन नैतिक कर्तव्य मानते है और इस प्रकार उनके बीच सामाजिक तनाव उत्पन्न नही हो पाता।

आगे चलकर जाति प्रथा ने अपनी अच्छाइयों को खो दिया। धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी दोषपूर्ण होती गयी कि आज यही सामाजिक जागरूकता और सामाजिक विकास के मार्ग मे एक बड़ी बाधा बन गई है। आज प्रत्येक जाति अपने लाभ के लिए ही प्रयास करती है तथा राष्ट्र हित की अपेक्षा करती है। उच्च जातियों और निम्न जातियों के मध्य निरंतर संघर्ष चलते रहते है। इसी कारण डाॅ. राधाकृष्णन का कथन है," दुर्भाग्यवश वही जाति प्रथा जिसे सामाजिक संगठन को नष्ट होने के लिए बनाया गया था, उसी की उन्नति मे बाधक बन रही है।" 

8. ग्राम्य प्रधान 

भारतीय संस्कृति का स्वरूप सदा से ही ग्राम्य प्रधान रहा है। आज भी भारत की 80 % जनता गांवो मे ही वास करती है। यद्यपि यहां नगरों तथा महानगरों का विकास हुआ परंतु वे भारतीय संस्कृतियों के आधारभूत ग्राम्य स्वरूप पर कोई विशेष प्रभाव नही डाल पाए। गांव के महत्व के कारण ही गांधी जी ग्राम्य उत्थान पर बल देते थे। यह पूर्णतया सत्य है कि गांवो का उत्थान किए बिना राष्ट्र का उत्थान नही हो सकता। वास्तव मे गांव भारतीय समाज की आत्मा ही नही है वरन् भारतीय संस्कृति को युग-युगों से सुरक्षित रखने और यहाँ की सभ्यता को चिरस्थायी बनाए रखने मे भी इनकी भूमिका सर्वविदित रही है। 

10. कर्म सिद्धांत को महत्व देना 

वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय विद्वान और चिंतक कर्म के सिद्धांत को विशेष महत्व देते आए है। गीता का प्रमुख उपदेश " कर्म सिद्धांत " पर आधारित है। प्राचीन भारतीय चिंतकों का विश्वास था कि इस लोक मे मोक्ष की प्राप्ति केवल धर्म से ही नही वरन् कर्म से हो सकती है। मोक्ष न तो बिना कुछ किए मिलता है और न केवल धर्म से। मोक्ष का साधन है धर्मयुत्त कर्म। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना का माध्यम कर्म है। सुकर्म से मोक्ष की साधना होती है और कुकर्म से अधोगति मिलती है। संक्षेप मे अच्छे कर्मों के द्वारा ही व्यक्ति इस लोक व परलोक को सुधार सकता है।

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;विवाह का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;गाँव या ग्रामीण समुदाय की विशेषताएं

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; कस्बे का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; नगर का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;भारतीय संस्कृति की विशेषताएं

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;दहेज का अर्थ, परिभाषा, कारण

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; विवाह विच्छेद का अर्थ, कारण, प्रभाव

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; वृद्ध का अर्थ, वृद्धों की समस्या और समाधान

आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;युवा तनाव/असंतोष का अर्थ, कारण और परिणाम

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।