10/20/2020

वाणिज्यवाद का अर्थ, विशेषताएं

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vanijyavad in hindi;16. वीं और 17 वीं शताब्दी के पश्चिमी मे यूरोप मे एक नई आर्थिक प्रवृत्ति आई जिसका नामकरण वाणिज्यवाद हुआ। इस नई प्रवृत्ति को फ्रांस मे कोलबर्टवाद, जर्मनी मे कैमरालिनवाद एवं ब्रिटेन मे व्यापारवाद या वणिकवाद के नाम से जाना जाता था।

वाणिज्यवाद या व्यापारवाद का क्या अर्थ है? वाणिज्यवाद का अर्थ 

vanijyavad meaning in hindi;वाणिज्यवाद एक विशेष नीति है। वाणिज्यिक क्रांति को जिस नीति के तहत बढ़ावा मिला उस नीति को व्यापारवाद या वाणिज्यवाद कहा जाता है। 16 वीं और 17 वीं शताब्दी मे यूरोप की जीवन पद्धति मे जो महत्वपूर्ण परिवर्तन आया वह धर्म के स्थान पर धन को महत्व था। इसका कारण राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना और पुनर्जागरण था। राज्य को शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनाने के लिए धन की आवश्यकता थी और इस युग मे धन का अर्थ सोना-चाँदी इत्यादि से था। अतः राज्यों ने इसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना प्रारंभ कर दिया। इसके लिए राज्य ने व्यापार और वाणिज्य को नियमित करने के लिए जो नीति अपनाई उसे ही वाणिज्यवाद कहा जाता है।

हेज के शब्दों मे ," वाणिज्यवाद एक आधुनिक शब्द है जो सरकार की आर्थिक नीति विशेष रूप से व्यापार तथा वाणिज्य को नियमित करने की नीति प्रदर्शित करता है।" 

वाणिज्यवाद की विशेषताएं (vanijyavad ki visheshta)

वाणिज्यवाद या व्यापारवाद की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. उद्योगों का राष्ट्रीय नियमन 

अब विभिन्न देशों की सरकारे अपने देश के उधोग-धन्धों और व्यापार के संगठन, वृद्धि, संचालन तथा व्यावस्थाओं पर ध्यान देने लगीं, क्योंकि उद्योग, व्यापार जहाँ राष्ट्र की सम्पन्नता और आर्थिक शक्ति का आधार था वही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समृद्धि और प्रतिष्ठा का विषय भी था। राष्ट्रीय गौरव की अभिवृद्धि और व्यापारिक लाभ के लिये अन्य संघर्षों मे आर्थिक सम्पन्नता ही आधार होती थी। 

2. सोने तथा चांदी का महत्व 

वाणिज्यवादियों ने सोने एवं चांदी के संग्रह को सबसे अधिक महत्व दिया था। उनका विचार था कि राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए बहुमूल्य धातुएं, सोना तथा चांदी ही सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत था। सभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य अधिक से अधिक स्वर्ण संग्रह हो गया।

3. व्यापार संतुलन 

व्यापार संतुलन मे स्वर्ण और चांदी को माध्यम बनाया गया तथा अपने देश मे स्वर्ण और चांदी की मात्रा को बढ़ाने के लिये निर्यात अधिक और आयात कम करने की नीति अपनाई गई। इस प्रकार व्यापार का संतुलन अपने देश के पक्ष मे करने का प्रयत्न किया जाने लगा।

4. जहाजों का अधिक उपयोग 

वाणिज्यवादी लेखकों का यह मत था कि जिस व्यापार मे जहाजों का उपयोग ज्यादा होता हो उस व्यापार को अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि वस्तुओं के साथ ही जहाजी भाड़ा और बीमा की आय कही ज्यादा होती है। अपने जहाजों से माल भेजने पर निर्यातों की कीमत और ज्यादा हो जाती है।

5. उपनिवेशों की आवश्यकता 

विदेशी व्यापार को सुनिश्चित बनाने के लिए वाणिज्यवादी लेखकों ने उपनिवेशों की आवश्यकता पर बल दिया था। इससे अपने मूलदेश मे उत्पन्न होने वाली वस्तुओं को बेचा जा सकता था एवं उपनिवेशों से सस्ता तथा कच्चा माल कम मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता था।

6. जनसंख्या वृद्धि आवश्यक 

इस लेखकों का मत था कि जनसंख्या की अभिवृद्धि आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि से ही अधिक सैनिक व श्रमिक मिल सकेंगे। सस्ते श्रम से उत्पादन की लागत कम रहेगी और उत्पादन ज्याद। श्रमिकों की शिक्षा तथा बेरोजगारी को दूर करना भी लेखक आवश्यक समझते थे।

7. धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन 

वाणिज्यवादी लेखकों का मत था कि प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए। इससे विदेशी व्यापारी, श्रमिक और बुद्धिजीवी देश को समृद्ध बनाने मे अधिक योगदान दे सकते है। 

8. उपनिवेशों का आर्थिक शोषण 

पुर्तगाल, स्पेन, हाॅलैण्ड, फ्रांस और इंग्लैंड ने अपने-अपने उपनिवेशों मे व्यापार का एकाधिकार स्थापित करने के लिये अनके कानून बनाये। परन्तु इसमे उपनिवेशों की जनता के हितों का ध्यान नही रखा गया। अतः उन पर अत्याचार किये जाने लगे और शोषण किया गया तथा उन्हे निर्धन और कमजोर बना दिया गया।

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