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10/21/2020

वाणिज्यवाद के सिद्धांत

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वाणिज्यवाद के सिद्धांत (vanijyavad ke siddhant)

वाणिज्यवाद के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार है--

1. व्यापार संतुलन का सिद्धांत 

वाणिज्यवाद के प्रमुख विचारकों मे इंग्लैंड के टाॅमस मान का महत्वपूर्ण स्थान है। व्यापारवाद के लिए व्यापार संतुलन का सिद्धांत इसी की देन है। उसका मानना था कि राज्यों को अपने राजकोष को समृद्ध रखना चाहिए। इसके लिए उन्हें आयात पर अधिक कर और निर्यात पर सामान्य कर लगाना चाहिए। इससे राजकोष मे अधिक मुद्रा का संचय होगा। 

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2. बहुमूल्य धातुवाद 

वाणिज्यवाद का एक प्रमुख सिद्धांत था कि अधिक से अधिक मात्रा मे बहुमूल्य धातुएँ राज्य के पास होनी चाहिए। बहुमूल्य धातुओं मे सोना-चाँद सबसे महत्वपूर्ण थी। यही देश और व्यक्ति की असली सम्पत्ति मानी जाती थी। जिस देश के पास जितना अधिक सोना-चाँद होगा वह देश उनता ही अधिक समृद्ध और शक्तिशाली होगा। इटली के वाणिज्यवादी एन्टोनिया सिरा ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया। उसका कहना था कि जिन राज्यों के पास सोने-चाँदी की खाने नही है वे किस प्रकार बहुमूल्य धातुओं को संग्रह करे। इसके लिए वह मुद्रा के निर्यात का निषेध करने के विरूद्ध था। 

3. उद्योग और विदेशी व्यापार पर जोर 

वाणिज्यवाद का एक सिद्धांत यह भी था कि प्रत्येक राज्य को अपने देश मे उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए विदेशों से कच्चे माल का आयात किया जाए तथा विदेशों को बनी हुई वस्तुएँ निर्यात की जाएँ। उद्योगों को बढ़ाने से देश की जनता की मांग को विदेशों को निर्यात करके अधिक से अधिक सोना-चाँदी एकत्र किया जा सकता है। इसके अलावा विदेशी व्यापार को भी बढ़ाने का सिद्धांत प्रचलित था। विदेशी व्यापार से ही अधिक से अधिक सोना-चाँदी प्राप्त किया जा सकता है।

4. उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन 

वाणिज्यवाद ने उपनिवेशवाद को भी प्रोत्साहित किया। उपनिवेशों की स्थापना से विदेशी व्यापार से अधिक और स्थायी लाभ होने लगता है। उपनिवेशों से राज्य की उत्पादित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाया जा सकता था और वहाँ से उद्योगों के लिए कच्चा माल आयात किया जाना अधिक आसान हो जाता था। इस कारण उपनिवेशवाद को भी बढ़ावा दिया गया।

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