10/20/2020

वाणिज्यवाद के उदय कारण, परिणाम, उद्देश्य

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वाणिज्यवाद के उदय तथा विकास के कारण (vanijyavad ke karan)

यूरोप मे निरन्तरता के साथ ही आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा कृषि एवं विज्ञान सम्बन्धी क्षेत्रों मे परिवर्तन दृष्टिकोण होने लगे। ये परिवर्तन ही वाणिज्यवाद के मूल आधार अथवा उदय के कारण। वाणिज्यवाद के उदय तथा विकास के कारण इस प्रकार है--

1. राजनीतिक परिवर्तन 

सामंतवाद के पतन से राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान तथा निरंकुश साम्राज्यों की स्थापना हुई। सामन्तीय व्यवस्था के केन्द्रीय सरकार कमजोर होती है, सेना और धर्मधिकारियों का बोलबाला था। राष्ट्रीय एवं निरंकुश राज्यों के निर्वाह का मुख्य साधन करारोपण था। आधुनिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था का जन्म करारोपण के साथ ही हुआ था। वाणिज्यवादी लेखकों ने भी निरंकुश और शक्तिशाली राज्यों की स्थापना पर बल दिया था। 

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इंग्लैंड, फ्रांस, हालैण्ड व स्पेन जैसे शक्तिशाली राज्यों की तथा आर्थिक परिवर्तनों के साथ ही व्यापारी वर्ग का महत्व बढ़ गया था। शक्तिशाली राज्यों की स्थापना से शांति एवं सुरक्षा की भी स्थापना हुई थी। इससे भी व्यापार की उन्नति मे मदद मिली।

2. आर्थिक परिवर्तन 

15 वीं सदी के अंत तथा 16 वीं सदी के प्रारंभ मे यूरोपीय समुदाय के आर्थिक ढांचे मे बड़े महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। कृषि का स्थान अब निर्माण उद्योग ले रहे थे। घरेलू अर्थव्यवस्था के स्थान पर विनिमय प्रणाली को महत्व मिलने लगा था। विनिमय का क्षेत्र बढ़ने से आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार भी तेजी से बढ़ने लगा। मुद्रा के प्रचलन से बहुत सी बाधाएं दूर हो गयी थी। मुद्रा का उपयोग और महत्व भी लगातार बढ़ रहा था। इससे बैंकिंग व्यवसाय को प्रोत्साहन मिला तथा बैंकों की स्थापना हुई। 

3. धार्मिक और सांस्कृतिक कारण 

पुनर्जागरण के फलस्वरूप हुए बौद्धिक जागरण, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र मे नये अविष्कारो से जीवन के प्रति दृष्टिकोण मे परिवर्तन हुआ। परलौकिक जीवन के स्थान पर भौतिक सुख समृद्धि की इच्छा को बल मिला। भौतिक सुखों के लिए धन संग्रह की आवश्यकता को देखते हुए वाणिज्य प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला।

वाणिज्यवाद के परिणाम या प्रभाव (vanijyavad ke parinaam)

वाणिज्यवाद के निम्न परिणाम हुये--

1. व्यापारियों और उद्योगपतियों को अधिक लाभ।

2. राज्यों की शक्ति और समृद्धि मे बढ़ोतरी।

3. आम आदमी के लाभ मे कमी हुई।

4. व्यापार का स्वरूप और तरीकों मे बदलाव आया।

5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मे वृद्धि हुई।

6. औद्योगिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

7. मुद्रा का प्रयोग बढ़ा। इससे मुद्रा का नियमन और व्यवस्थितिकरण हुआ।

8. बैंकों और अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना हुई।

9. नई कंपनियों और कारखानों का विकास हुआ।

10. उपनिवेशों की स्थापना का औचित्य सिद्ध हुआ।

11. व्यापारिक प्रतियोगिता का युग आरंभ हुआ।

12. इसमे धन को अत्यधिक महत्व दिया गया।

13. इसने यूरोप को कई युद्धों का सामना कराया।

14. लूट और शोषण का युग आरंभ हुआ।

15. मानवीय श्रम शोषण और अधिक बढ़ गया। जीवन का लक्ष्य सिर्फ धन कमाना हो गया।

16. इसका एक परिणाम कृषि और उद्योगों के ह्रास मे देखने मे आया, क्योंकि व्यापारवाद सिर्फ व्यापार को ही अधिक महत्व देता था।

17. राजकोष को अधिक से अधिक भरने के लिए जनता पर करों का बोझ बढ़ाया गया। इससे उनके जीवन स्तर मे कमी आयी और विद्रोह तथा क्रांतियों का उदय हुआ।

वाणिज्यवाद या व्यापारवाद के उद्देश्य 

व्यापारवाद या वाणिज्यवाद जिन वर्गों के द्वारा संभव हुआ उनमे शामिल सभी वर्गों के लगभग समान थे, वाणिज्यवाद के उद्देश्य इस प्रकार है--

1. राष्ट्रीय आर्थिक प्रभुत्व प्राप्त करना।

2. राज्य को अधिक से अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना।

3. सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त करना। इसीलिए इसे बहुमूल्य धातुवाद की संज्ञा भी दी जाती है। वाणिज्यिवादियों का प्रसिद्ध नारा था, " अधिक सोना प्राप्त करो और अधिक शक्तिशाली बनो।

4. फ्रांसिक बेकन ने इसे शक्तिशाली राज्य बनाने की नीति बताया था।

5. विलियम कनिंघम ने वाणिज्यवाद को राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आर्थिक शक्ति का साधन बताया।

6. वाणिज्यवाद का एक उद्देश्य समाज और राज्य का आर्थिक एकीकरण भी था।

वाणिज्यवाद या व्यापारवाद के उद्देश्य 

व्यापारवाद या वाणिज्यवाद जिन वर्गों के द्वारा संभव हुआ उनमे शामिल सभी वर्गों के लगभग समान थे, वाणिज्यवाद के उद्देश्य इस प्रकार है--

1. राष्ट्रीय आर्थिक प्रभुत्व प्राप्त करना।

2. राज्य को अधिक से अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना।

3. सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त करना। इसीलिए इसे बहुमूल्य धातुवाद की संज्ञा भी दी जाती है। वाणिज्यिवादियों का प्रसिद्ध नारा था, " अधिक सोना प्राप्त करो और अधिक शक्तिशाली बनो।

4. फ्रांसिक बेकन ने इसे शक्तिशाली राज्य बनाने की नीति बताया था।

5. विलियम कनिंघम ने वाणिज्यवाद को राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आर्थिक शक्ति का साधन बताया।

6. वाणिज्यवाद का एक उद्देश्य समाज और राज्य का आर्थिक एकीकरण भी था।

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