10/24/2020

क्रीमिया का युद्ध, कारण, घटनाएं, परिणाम, महत्व

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क्रीमिया का युद्ध (krimiya ka yudh)

krimiya ka yudh in hindi;1854 मे पलेस्टाइन के पवित्र स्थानों के नियंत्रण के मामूली झगड़े से क्रीमिया के युद्ध की शुरुआत हुई, तथापि बाद मे यह अति भयंकर रूप धारण कर गया जिसके फलस्वरूप लाखों व्यक्तियों के खून की नदी बह गई। इंग्लैंड की महारानी ने युद्ध के लिए रूस के जार निकोलस प्रथम की स्वार्थता और महत्वाकांक्षा को दोषी ठहराया, जबकि किंगलेक ने फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय पर सारा दोष डाला।

जे. ए. आर. मेरियट सिर्फ नेपोलियन को ही उत्तरदायी नही मानता। उसके कारण युद्ध का वातावरण पहले ही तैयार हो चुका था। 

आगाथा रेम के अनुसार " क्रीमिया के युुद्ध का कारण यह था कि उस समय तुर्की मे राष्ट्रीयता की भावना ने उग्र रूप धारण कर लिया था।"

अन्य विचारको का मत है कि इंग्लैंड टर्की मे रूस के बढ़ते हुए प्रभाव को ईर्ष्या की दृष्टि से देखता था। वास्तविकता स्थिति यह थी कि क्रीमिया का युद्ध कई कारणों का संयुक्त परिणाम था।

क्रीमिया के युद्ध के कारण (krimiya ke yudh ke karan)

क्रीमिया के युद्ध के कारण इस प्रकार है--

1. रूस की नीति 

पीटर के बाद रूस मे भी इंग्लैंड के समान उपनिवेशक व्यापार की प्रतिस्पर्धा जाग्रत हुई। उसकी यह आकांक्षा तब तक पूरी नही होती जब तक उसका कृष्ण और भूमध्य सागर पर अधिकार न हो। इन पर टर्की का आधिपत्य था। अतः रूस टर्की को नष्ट करके भी उसके प्रदेशो पर अधिकार करने के लिये संकल्पबद्ध था।

2. इंग्लैंड की नीति

रूस के टर्की साम्राज्य मे विस्तार तथा कृष्ण सागर पर अधिकार से इंग्लैंड को अपनी अफ्रीकी और भारतीय व्यापार के लिए खतरा जान पड़ता था। अतः वह किसी भी कीमत पर नही चाहता था कि रूस कृष्ण सागर पर अधिकार करे। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पामस्टर्न ने रूस के जार निकोलस द्वारा टर्की के प्रस्ताव को 1840 मे इस कारण अस्वीकार कर दिया।

3. फ्रांस की नीति 

फ्रांस मे नेपोलियन तृतीय यद्यपि निर्वाचित राष्ट्रपति था परन्तु उसने शीघ्र ही संविधान को समाप्त करके स्वयं को फ्रांस का सम्राट (नेपोलियन  बोनापार्ट के जैसा) घोषित कर दिया। अतः वह जानता था कि फ्रांस की क्रांतिकारी और निरंकुशता विरोधी जनता उसके इस कार्य से असन्तुष्ट है। अतः वह जनता जनता का ध्यान रूस की ओर या पूर्वी समस्या की ओर लगाना चाहता था। इस प्रकार फ्रांस के दृष्टिकोण ने पूर्वी समस्या को या यूरोपीय देशो की प्रतिद्वन्दिता को नवीन रूप प्रदान किया।

4. आस्ट्रिया की नीति 

आस्ट्रिया भी रूस के कृष्ण सागर मे आने का दो कारणों से विरोधी था। प्रथम कारण तो यह था कि वह स्वयं डेन्यूब नदी के द्वारा कृष्ण और एजियन मे जाने का और व्यापार करने का इच्छुक था। दूसरा कारण कृष्ण सागर पर अधिकार होने से वह अपने स्वजातीय सर्बिया, यूगोस्लाव और ग्रीकों की मदद से अनेक बल्कन राज्यों पर अधिकार कर लेता, उस स्थिति मे मे आस्ट्रिया को व्यापार मे सुविधा कभी नही मिलती। अतः आस्ट्रेलिया टर्की को बनाये रखकर इस कृपा का लाभ टर्की से प्राप्त करना चाहता था। वह रूस को राष्ट्रीय आंदोलन मे मदद करने के लिये यूनान मे और सर्बिया मे रोकता रहा। आस्ट्रिया इस समय युद्ध मे भाग लेने से भी संकोच इसलिए कर रहा था कि यूरोप मे 1830और 1848 की क्रान्तियों का और विशेषकर जर्मनी और इटली मे दमन करना पड़ा था।

5. प्रशा और इटली की नीति 

कैबूर इटली की समस्या को अन्तर्राष्ट्रीय बनाकर आस्ट्रिया को एकाकी और बदनाम करने के लिये प्रत्यशील था। कालांतर मे यह अवसर पाने के लिये क्रीमियां मे कोई आर्थिक या प्रादेशिक हित न होते हुई भी वह इंग्लैंड और फ्रांस के साथ रूस पर आक्रमण करने को तैयार हो गया। जहाँ तक प्रशा का प्रश्न है वह रूस को क्रीमिया मे भाग लेकर नाराज नही नाराज नही करना चाहता था। बल्कि बिस्मार्क ने अपने राजदूत काल मे प्रशा के रूस पर आक्रमण का विरोध किया था तथा जार से व्यक्तिगत रूप मे भी मित्रता की थी। इसके पीछे उसका यही दृष्टिकोण था कि भविष्य मे आस्ट्रिया की पराजय के लिये रूस तटस्थता अधिक मूल्यवान होगी। अतः प्रशा ने तटस्थ रहने का निश्चय किया।

6. रूस का अपने राजदूत मैन्शचीकोफ के नेतृत्व मे टर्की मे एक शिष्टाचार मंडल भेजना और उसकी असफलता 

जब रूस ने नेपोलियन तृतीय को अपने राजनितिक प्रभाव द्वारा टर्की राज्य से सुविधाएं प्राप्त करने मे सफल होते देखा तो मैन्शचीकोफ को 1853 मे अपना दूत बनाकर कुस्तुनतुनिया भेजा, जिसके हाथ दिए पत्र मे टर्की को निम्नलिखित शर्ते मानने के लिए धमकी दी गई--

1. टर्की सरकार यूनानी ईसाइयों की सुरक्षा का अधिकार रूस को दे दे।

2. वह जेरूसलम के पूज्य और पवित्र स्थानों का प्रबंध करने का अधिकार यूनानी चर्च को दे दे जिसका सरदार रूस था।

कुस्तुनतुनिया मे स्थिति ब्रिटिश राजदूत लार्ड स्ट्रैफोर्ड डि रैडक्लिफ ने टर्की के सुल्तान को रूस की पहली शर्त मानने की सलाह दी, परन्तु दूसरी को न मानने की राय दी। इस पर मैन्शचीकोफ क्रोध मे आकर कुस्तुनतुनिया छोड़कर वापिस चला गया। अतः टर्की सुल्तान और जार निकोलस का विरोध और बढ़ गया। इसलिए, यह राजदूत इस युद्ध के लिए बहुत हद तक जिम्मेवारी रखता था।

7. रूस का मालदेविया तथा वालेशिया पर कब्जा

जब मैन्शचीकोफ टर्की के सुल्तान से रूस की शर्ते मनवा सका तो वह कुस्तुनतुनिया से रूस लौट आया। इस पर जार निकोलस ने डेन्यूक के किनारे पर मालदेविया और वालेशिया के दो प्रांतो पर अपनी सेना भेजकर कब्जा कर लिया। ये प्रांत टर्की राज्य के अंतर्गत थे। इससे स्थिति गंभीर हो गई। यद्यपि ब्रिटेन का मंत्री पामस्टर्न चाहता था कि इंग्लैंड और फ्रांस के संयुक्त बेड़े को रूसी सेनाओ को रोकने के लिए बासफोरस तक आगे बढ़ाया जाए, किन्तु एबरडीन युद्ध टालना चाहता था, अतः उसने टर्की के सुल्तान को सलाह दी कि वह धैर्य से काम ले तथा जहाँ तक संभव हो रूस के विरुद्ध बल प्रयोग न करे। आस्ट्रिया भी युद्ध को टालना चाहता था।

8. वियना नोट 

आस्ट्रिया के विदेश मंत्री काउन्ट बुओल ने युद्ध को रोकने के उद्देश्य से इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रिया और प्रशा के प्रतिनिधियों को जुलाई, 1853 मे वियेना मे आमंत्रित किया। चारों राज्यों के प्रतिनिधियों ने एक नोट तैयार किया इसमे रूस और तुर्की के ईसाई मत के संरक्षण से संबंधित कुचुक केनाईजी एवं एड्रियानोपल की संधियों की भाषा एवं अर्थो को स्वीकार करने का अनुरोध किया। तुर्की ने चार शब्द " महान तुर्की के राज्य द्वारा " जोड़कर इसे स्वीकार कर लिया। रूस ने इस संशोधन को अस्वीकार कर दिया।

क्रीमिया युद्ध का तात्कालिक कारण 

टर्की ने ग्रीक चर्च मानने वाले पादरियों को सुविधाएं देना अस्वीकार कर दिया। अतः जून 1853 को रूस ने टर्की के डैन्यूकन राज्यों पर आक्रमण कर दिया। विएना मे एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। जिसके द्वारा निर्णीत किए गए प्रस्तावों को टर्की और रूस दोनों ने ही अस्वीकार कर दिया। फलतः युद्ध प्रारंभ हो गया।

दल बंदी 

इस युद्ध मे दो दल थे। एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस और टर्की थे और दूसरी ओर केवल रूस अकेला था।  इटली ने फ्रांस का पक्ष लेकर टर्की की सहायता की, क्योंकि भविष्य मे अपने राष्ट्रीय एकीकरण के लिए उसे फ्रांस की सहायता की आवश्यकता थी। इस युद्ध मे आस्ट्रिया और प्रशिया तटस्थ रहे।

क्रीमिया युद्ध की घटनाएं 

इस युद्ध ने एक भीषण रूप धारण कर लिया था और यह दो वर्ष तक चलता रहा। इस युद्ध मे दोनो पक्षों की आपार जन-धन की हानि हुई। रूस ने टर्की साम्राज्य मे डैन्यूब नदी के निकटवर्ती मोल्डेविया तथा वैलेसिया नामक प्रदेशो पर आक्रमण कर दिया। मित्र-राष्ट्रों की संयुक्त सेना ने रूस को हरा दिया और उसने क्रीमिया नामक प्रदेश पर आक्रमण कर सिवेस्टोपोल के किले का घेरा डाल दिया। अंत मे, 8 सितम्बर 1855 ई. को सभी सेनाओं ने हथियार डाल दिए और पराजय स्वीकार कर ली। 

इसी समय रूस मे जार निकोलस प्रथम की मृत्यु हो गई उसके स्थान पर द्वितीय एलेक्जेंडर झार बना। इंग्लैंड मे पुनः नेपोलियन के विरुद्ध लोकमत बन गया। किन्तु आस्ट्रिया की मध्यस्थता से यह संभावित युद्ध टल गया और नेपोलियन की अध्यक्षता मे पेरिस मे एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन मे एक संधि हुई जो पेरिस की संधि के नाम से विख्यात है।

पेरिस संधि 

एलेक्जेंडर द्वितीय ने युद्ध को चलाना व्यर्थ समझा तथा फ्रांस और इंग्लैंड भी आर्थिक और सैनिक विनाश से हताश थे उन्हें कोई आर्थिक लाभ दिखाई नही दे रहा था अतः आस्ट्रिया की मध्यस्थता से 1856 को 30 मार्च के दिन पेरिस की संधि हो गई। परेसि संधि की मुख्य निम्म शर्तें थी--

1. रूस और टर्की ने युद्धकाल मे जीते हुए इलाके एक दूसरे को वापस कर दिये। 

2. रूस और टर्की को आदेश दिया गया कि वे कष्ण-सागर पर सैनिक कार्यवाहियों तथा विस्फोटक सामान का निर्माण नही करेंगे।

3. रूस ने टर्की के ईसाइयों पर अपने संरक्षण के दावे को त्याग दिया और दक्षिण बसारेविया टर्की को पुनः वापस कर दिया।

4. टर्की के सुल्तान ने इस बात का वचन दिया कि भविष्य मे वह अपनी ईसाई प्रजा की दशा मे आवश्यक सुधारों के साथ-साथ उसके साथ उदारता का व्यवहार करेगा।

5. डेन्यूब नदी मे सभी देशों को जहाज चलाने की आज्ञा दे दी गई। उस पर अंतर्राष्ट्रीय कमीशन का प्रभाव या अधिकार मान लिया गया। रूस को डन्यूब नदी के तटो से पीछे हट जाना पड़ा और बेसरबिया का इलाका मालदेविया के हवाले करना पड़ा।

6. सर्विया की स्वतंत्रता भी सभी राज्यों द्वारा स्वीकार कर ली गई। 

7. बेसेरेविया को माल्डेविया से मिला दिया गया।

8. कार्स का प्रदेश टर्की को और क्रीमिया रूस को वापस मिल गया।

क्रीमिया युद्ध के परिणाम (krimiya ke yudh ke parinaam)

क्रीमिया का युद्ध यूरोप के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके प्रमुख परिणाम इस प्रकार थे--

1. रूस पराजित हो गया तथा टर्की साम्राज्य मे प्राप्त अनेक विशेषाधिकारों से उसे हाथ धोना पड़ा।

2. इंग्लैंड मे एबरडीन के मंत्रिमंडल का पतन हो गया तथा पामस्टर्न प्रधानमंत्री बना।

3. ब्रिटेन के युद्ध मे भाग लेने के उद्देश्य की भी कुछ अंशो मे पूर्ति हो गई, अर्थात् कुछ समय तक बाल्कान प्रदेश मे रूस की प्रगति रूक गई।

4. जार का शासन बदनाम हो गया क्योंकि अधिकारियों ने उसका साथ नही दिया। जनता ने भी उसका साथ नही दिया। फलतः निकोलस के उत्तराधिकारी अलेक्जेंडर द्वितीय को शासन मे अनेक सुधार करने पड़े।

5. नेपोलियन तृतीय को व्यक्तिगत तरीके के फायदा हुआ। उससे फ्रांस के सब दल संतुष्ट हो गये।

6. क्रीमिया युद्ध मे भाग लेकर कैबूर ने इंग्लैंड और फ्रांस को अपना मित्र बनाया इससे इटली के एकीकरण मे मदद मिली।

7. रूस और आस्ट्रिया शत्रु हो गये।

8. मेटरनिख युग समाप्त हो गया।

9. अन्तर्राष्ट्रीयता का विकास हुआ, चूंकि पेरिस की संधि मे कुछ अन्तर्राष्ट्रीय नियमो का प्रतिपादन भी था।

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