10/24/2020

1830 की क्रांति के कारण, घटनाएं, परिणाम, प्रभाव या महत्व

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युरोप की 1830 की क्रांति 

यूरोप मे संयुक्त व्यवस्था के पतन के समय 1820 मे राष्ट्रवादी विद्रोह हुए थे। परन्तु 1830 मे यूरोप मे जो क्रान्तियां हुई वे 1820 के विद्रोह तथा आंदोलन से पृथक थी। 1830 की क्रान्तियाँ अधिकतर सम्पन्न वर्ग के उदारवादी विद्रोह थे। ये क्रांतियां 1815 मे लागू प्रतिक्रियावादी नीतियों के विरुद्ध थी। इसके अतिरिक्त ये क्रांतियां तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक असंतोष की उपज भी थी। 1830 मे यूरोप के कई देशों मे क्रान्तियाँ हुई, ये देश थे-- फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड तथा पोलैण्ड।

फ्रांस की 1830 की जुलाई क्रांति 

यूरोप मे 1830 मे क्रान्ति की पहली चिंगारी फ्रांस मे भड़की। इसके बाद तो सारे यूरोप मे क्रान्तियाँ फैल गई। इस समय फ्रांस मे बूर्बो शासक चार्ल्स  दसवाँ संविधानिक राजा के रूप मे शासन करने के लिए तैयार नही था। वह निरंकुश शासन का पक्षपाती था। वह राजा के दैवी अधिकारों का पक्षपाती था उसने कहा था " मै अंग्रेजी राजा की भांति शासन करने की अपेक्षा लकड़ी काटना अधिक पसंद करूँगा।" वह शिक्षा के क्षेत्र मे क्रान्ति तथा लोकतंत्र के विचारो को स्थिरता नही देना चाहता था। इस प्रतिक्रियावादी नीति के चलते फ्रांस मे उदारवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा था। 1827 के चुनावों मे उदारवादियों को 428 स्थान प्राप्त हुए जबकि राजसत्तावादियों को मात्र 115 स्थान ही प्राप्त हुए थे। चार्ल्स ने चार अध्यादेश जारे किये जिनसे असंतोष और भकड़ उठा। इन विद्रोहों मे अवकाश प्राप्त सैनिक विद्यार्थी तथा मजदूर एवं मध्यवर्ग शामिल हुए।

1830 की क्रांति के कारण (1830 ki kranti ke karan)

1830 की यूरोपीय क्रांतियों का आरंभ फ्रांस से हुआ। क्योंकि यहाँ क्रांति के लिए पर्याप्त कारण थे। यही कारण अन्य देशों मे भी व्याप्त थे। अतः 1830 की फ्रांस और यूरोपीय क्रांति के प्रमुख कारण इस प्रकार है--

1. राजनीतिक दलो मे संघर्ष 

लुई 18 वे के शासनकाल मे फ्रांस मे पांच प्रमुख राजनीतिक दल थे, जिनके दो गुट बने हुये थे। एक गुट कट्टर राजसत्तावादी और वैध राजसत्तावादियों का था। दूसरे गुट मे उदारवादी, गणतंत्रवादी और बोनापार्टिस्ट शामिल थे। इन राजनीतिक दलो के मध्य संघर्ष जुलाई की क्रांति को लाने मे बड़ा सहायक सिद्ध हुआ।

2. चार्ल्स दशम की दमकारी नीति 

चार्ल्स दशम एक प्रतिक्रियावादी शासक था। उसने फ्रांस मे अपना निरंकुश शासन स्थापित करके क्रांति के समर्थकों का दमन करना प्रारंभ कर दिया। उसकी दमनकारी नीति ने फ्रांस की जनता को अत्यधिक रूष्ट कर दिया और फलस्वरूप क्रांति का विस्फोट होना निश्चित हो गया।

3. मध्यवर्ग मे असंतोष 

1789 मे भी मध्यम वर्ग ने क्रान्ति का आरंभ किया था, 1830 मे भी यही वर्ग जागरूक और असंतुष्ट था। अतः इस वर्ग के लेखक, वकीलों, डाॅक्टरों, वैज्ञानिकों और पत्रकारों ने क्रान्ति भावना उत्पन्न की।

4. कैथोलिकों का भ्रष्टाचार 

मेटरनिख की सफलता और निरंकुश शासन की स्थापनाओ से चर्च मे पुनः भ्रष्टाचार, घमण्ड, विलासिता, सामान्य वर्ग की उपेक्षा और उन पर अत्याचार आरंभ हो गये, अतः जनता ने पुनः चर्च के खिलाफ संघर्ष आरंभ कर दिया।

5. पौलिगनेक की मूर्खता 

चार्ल्स दशम तो निरंकुश था ही, साथ ही साथ उसका जो प्रधानमंत्री पौलिगनैक जो था वह और भी अधिक निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी था। उसने उदारवाद को समाप्त कर शक्तिशाली कुलीन वर्ग की स्थापना की घोषणा की। इस घोषणा ने असंतुष्ट जनता को क्रान्ति के लिये प्रेरणा दी।

6. नेशनल गार्ड को समाप्त करना 

लुई 16 वें और 18 वें ने नेशनल गार्ड को स्वीकार कर लिया था परन्तु चार्ल्स दशम ने नेशनल गार्ड को 1821-27 मे भंग करवा दिया, जिसके कारण नेशनल गार्ड के सैनिकों ने क्रान्ति कर दी।

7. स्वतंत्रता समानता और बन्धुत्व की समाप्ति 

चार्ल्स दशम ने विचारों की स्वतंत्रता, योग्यता की समानता को खत्म कर दिया। पुनः वर्गवाद एवं धन का प्रभाव आरंभ हो गया। उसने कुलीन, पादरी और सामान्य वर्ग की एकता को समाप्त कर राष्ट्रीयता या परस्पर बन्धुभाव को समाप्त कर दिया। अतः फ्रांस तथा यूरोप मे वर्गीय संघर्ष होने लगे तथा इसके समर्थकों ने क्रान्ति के सिद्धांतों की इस प्रकार से हो रही हत्या को एक गम्भीर खतरा समझा।

चार्ल्स का अध्यादेश (तात्कालिक कारण) 

1830 की क्रान्ति का मुख्य कारण चार्ल्स द्वारा क्लाउड का अध्यादेश था। जुलाई, 1830 को चार्ल्स ने सेन्टक्लाउड से अध्यादेश जारी किया। उसने चार अध्यादेश जारी किये थे--

1. प्रतिनिध सभा को भंग करना।

2. मताधिकार को सीमित करना।

3. प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना।

4. सभा की कार्यवाही 7 से 5 वर्ष करना। 

इन कारणों से जनता मे असंतोष भड़क गया। अवकाश प्राप्त सैनिक, विद्यार्थी सभी क्रांति के लिए राजा से मोर्चा लेने को तैयार हो गये।

फ्रांस की जुलाई क्रांति 1830 की घटनाएं 

उपर्युक्त कारणो और अध्यादेशों के विरोध मे जनता की प्रतिक्रिया बहुत तीव्र हुई। पेरिस के पत्रकार तथा जनता ने उसे चुनौती के रूप मे लिया। गणतंत्रवादी, उदारवादी, मजदूर, अवकाश प्राप्त सैनिक, विद्यार्थी सभी चार्ल्स दशम् के खिलाफ हो गए थे। 27 जुलाई को विद्रोहियों ने पेरिस की सड़कों और गलियों मे मोर्चा बन्दी कर ली गई। जो लोग क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे उनमे तैलीरां पत्रकार दियर तथा क्रांतिकारी लफायेत थे। जनता की मांग थी कि 1514 के घोषणा-पत्र को पूनः लागू किया जाए। शासक की सेना और क्रांतिकारियों मे तीन दिन तक संघर्ष चला। इस संघर्ष से सेना के सैनिक भी जनता के साथ थे। अतः 31 जुलाई, को चार्ल्स सिंहासन त्याग कर इंग्लैंड भाग गया।

फ्रांस की 1830 की क्रांति के प्रभाव, परिणाम या महत्व 

1789 की क्रान्ति की तुलना मे 1830 की क्रांति मे रक्तपात बहुत कम हुआ। मेटरनिख अपने देश के विद्रोह के दमन मे लगा होने के कारण फ्रांस की क्रांति मे अधिक हस्तक्षेप ना कर सका। 1830 की जुलाई क्रांति फ्रांस के इतिहास मे एक महत्वपूर्ण घटना थी। चार्ल्स दशम के देश छोड़कर चले जाने से फ्रांस दैवी अधिकारों के स्थान पर जनतन्त्रीय शासन स्थापित हुआ। फिलिप जनता का राजा बना। नया राजा चुने जाने से निरंकुश शासनतंत्र समाप्त हो गया। 

मेटरनिख की व्यवस्था को आघात लगा। इस क्रांति का प्रभाव सारे यूरोप के राज्यों पर पड़ा। पोलैण्ड, जर्मनी, इटली, इंग्लैंड, नीदरलैंड्स आदि।

इस क्रांति का प्रभाव फ्रांस तक ही सीमित नही रहा वरन् इसने यूरोप और संयुक्त अमेरिका को भी प्रभावित किया। वियना की कांग्रेस ने जो प्रतिक्रियावादी युग शुरू किया उस पर इस क्रांति द्वारा भी बड़ा कुठाराघात हुआ। मेटरनिख के वैध सिद्धांत के अधिकार को क्रांति ने निरर्थक किया। 

इस क्रांति के द्वारा यूरोप के अन्य देशो के क्रांतिकारियो को भी प्रेरणा मिली। स्विट्ज़रलैंड मे लोकतंत्रत्मक संविधान लागू किया गया और इंग्लैंड मे 1822 मे सुधार बिल पास किया गया। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका मे दास प्रथा का अंत करके गरीब किसानो व मजदूरों की दशा सुधारने के नियम बनाये गये। फ्रांस की क्रांति से उत्साहित होकर बेल्जियम, हालैण्ड से पृथक होकर एक स्वंतंत्र देश बन गया। इटली व जर्मनी मे भी क्रांतियां हुई। क्राांति ने जनसाधारण को निरंकुशता का विरोध करने के लिए तैयार कर दिया और कुछ समय बाद ही यूरोप मे आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए जिनके कारण निरंकुशता का अंत हो गया।

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