4/28/2020

समाजशास्त्र की प्रकृति (samajshastra ki prakriti)

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samajshastra ki prakriti;ऑगस्त काॅम्टे को समाजशास्त्र शब्द का जन्मदाता कहा जाता हैं। ऑगस्त का विचार था कि जिस प्रकार भौतिकी वस्तुओं का अध्ययन करने के लिए भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, जीवशास्त्र आदि विज्ञान हैं, ठीक उसी प्रकार सामाजिक जीवन का अध्ययन करने के लिए सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता हैं। ऑगस्त कॉम्टे से इसे 'सामाजिक भौतिकशास्त्र का नाम दिया। इसके बाद सन् 1838 मे काॅम्टे  ने ही इसे समाजशास्त्र के नाम दिया था।  आज हम समाजशास्त्र की प्रकृति पर चर्चा करेंगे। समाजशास्त्र तुलनात्मक रूप से एक विज्ञान है। नया विज्ञान होने के कारण समाजशास्त्र की प्रकृति के बारे मे विवाद का होना नितान्त ही स्वाभाविक हैं।
समाजशास्त्र की प्रकृति
बाटोमारे ने लिखा है कि " प्राकृतिक विद्वानों और समाजशास्त्र मे इतना ही अन्तर है कि प्राकृतिक विज्ञान किसी तथ्य की कारण सम्बन्धी व्याख्या करते हैं जबकि समाजशास्त्र का उद्देश्य अर्थ का विवेचन करना तथा उसे समझना है।

समाजशास्त्र की प्रकृति (samajshastra ki prakriti)

समाजशास्त्रीय अध्ययन की प्रकृति वैज्ञानिक है, यह लम्बे समय तक विवाद का विषय रहा समाजशास्त्रीय अध्ययन के वैज्ञानिक नही हो पाने के पीछे तर्क यह दिया जाता रहा है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति वैज्ञानिक अध्ययन के अनुकूल नही है। समाजशास्त्रीय साहित्य मे भी काफी लम्बे अर्से तक यह बात जोर देकर प्रतिपादित की जाती रही है कि समाजशास्त्र विज्ञान कि अपेक्षा दर्शन के अधिक निकट हैं, लेकिन आज शायद ही कोई इस बात पर संदेह करता है कि समाजशास्त्र विज्ञान नही हैं।
क्या समाजशास्त्र विज्ञान हैं? यह प्रशन बड़ा ही विवादास्पद हैं। हाँ या नही में इसका न्यायपूर्ण उत्तर नही दिया जा सकता हैं। इसका उत्तर मात्रा मे ही दिया जा सकता हैं अर्थात किस मात्रा तक यह विज्ञान है। समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है न कि प्राकृतिक विज्ञान का अर्थ समझना आवश्यक हैं? 
विज्ञान क्या हैं?
विज्ञान से अर्थ विशिष्ट एवं सामान्य तथ्यों के उस समुच्चय से है जो एक सुव्यवस्थित अनुसंधान प्रणाली द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर पाई जाने वाली वस्तुओं के विषय मे होता हैं। 
विज्ञान के आवश्यक तत्व 
विज्ञान कहलाने के लिए किसी अध्ययन को सामान्य रूप से निम्नांकित आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती हैं----
1. वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करना
2. वास्तविक तथ्यों अर्थात् क्या हैं का वर्णन करना
3 . सार्वभौमिकता 
4. कार्यकारण सम्बन्धों की व्याख्या करना
5. अवलोकन द्धारा तथ्यों का संग्रह करना
6. तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण 
7. सत्यापन आदि।

समाजशास्त्र की प्रकृति के वैज्ञानिक होने के पक्ष मे निम्म तथ्य दिये जा सकते हैं-----


1. समाजशास्त्र विज्ञान है
विज्ञान व्यवस्थित या क्रमबद्ध ज्ञान को कहते है। समाजशास्त्र और जीवशास्त्र को इसलिए विज्ञान कहा जाता है, क्योंकि इसके सम्बन्ध मे प्राप्त व्यवस्थित है। यहि बात अन्य विषयों के बारे मे भी लागू होती है। समाजशास्त्र समाज का विज्ञान हैं, समाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र समाज का अध्ययन व्यवस्थित ढंग से करता है, इसलिए यह एक विज्ञान हैं। 

2. समाजशास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करता है 
समाजशास्त्र की अध्ययन पद्धतियां वैज्ञानिक है और इसके नियम सार्वभौमिक होते हैं। इन नियमों की परीक्षा और पुन:परीक्षा की जा सकती हैं। 
समाजशास्त्र की वैज्ञानिक पद्धतियाँ निम्न हैं-----
3. समामिति 
4. समाजशास्त्र वास्तविक घटनाओं का अध्ययन करता है
समाजशास्त्र आर्दश विज्ञान नही है, जहाँ क्या होना चाहिए का वर्णन किया जाता है। समाजशास्त्र तो वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन करता है। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि समाजशास्त्र क्या है वर्णन करता है। सामाजिक परिस्थितियों जिस रूप मे है समाज मे जो तथ्य जिस रूप मे पाये जाते है उनका ठीक उसी रूप मे अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र अपने अध्ययन मे कल्पना का सहारा नही लेता है और न अफवाहों को ही अपने अध्ययन का आधार बनाता है। वह तो वर्तमान परिस्थितियों को जिस रूप मे देखता है, उसका उसी रूप मे अध्ययन करता है। 
5. समाजशास्त्रीय नियम सर्वव्यापी है
समाजशास्त्र समाज का विज्ञान हैं। यदि समाज की परिस्थितियाँ परिवर्तित न हो तो समाज के नियम भी नही बदलेंगे और एक ही प्रकार के सभी समाजों पर समान रूप से लागू होंगे। 
6. समाजशास्त्रीय सिद्धांत कार्य 
कारण सम्बन्धों पर आधारित है- हर एक कार्य के पीछे एक कारण होता है अर्थात् कार्य और कारण का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। कार्य-कारण का यह सिद्धांत समाज पर भी लागू होता है। समाज भी सभी घटनाएं जादू का चमत्कार नही हीती है, उसके पीछे एक कारण होता है जैसे भारत मे संयुक्त परिवार नष्ट हो रहे हैं, उसके एक कारण होना चाहिए। 
7. समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों की परिक्षा 
जिस प्रकार भौतिकशास्त्र के नियम सार्वभौमिक और सार्वदेशिक होते है, उनकी परीक्षा और पुनः परिक्षा की जा सकती है, यही नियम समाजशास्त्र पर भी लागू होते है। अपरिवर्तित परिस्थितियों मे समाजशास्त्र के नियम भी परिवर्तित नही होंगे। वे सभी देश और सभी कालों पर समान रूप मे लागू होते है और इन सिद्धांतों की परीक्षा और पुनः परिक्षा की जा सकती है। जैसे विघटित परिवार विघटित व्यक्तित्व को जन्म देगा, इस सिद्धांत की किसी भी देश, काल और परिस्थितियों मे परिक्षा की जा सकती है।
9. समाजशास्त्र भविष्यवाणी करता है
जिस प्रकार विज्ञान के द्वारा क्या हैं के आधार पर क्या होगा की ओर संकेत किया जा सकता है उसी प्रकार समाजशास्त्र अध्ययन के द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती हैं।

10. अवलोकन द्धारा तथ्यों का संग्रह 
समाजशास्त्र में तथ्यों का संग्रह कल्पना के आधार पर नही किया जात है वरन् प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर किया जाता हैं। 
11. क्या हैं? का वर्णन
समाजशास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न स्थितियों का ज्यों का त्यों वर्णन किया जाता हैं। समाजशास्त्र अपनी ओर से तथ्यों मे कुछ जोड़ता नही हैं, जैसे को तैसा रूप मे ही प्रस्तुत करता हैं।

समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक होने पर आपत्तियाँ

1. वैज्ञानिक तटस्थता का अभाव
समाजशास्त्र विज्ञान नही हैं, क्योंकि उसमे तटस्थता का अभाव पाया जाता हैं। भौतिकशास्त्री तटस्थ रहकर अध्ययन करता हैं, किन्तु समाजशास्त्रीय अपने अध्ययन मे तटस्थ नही रह सकता हैं। इसका कारण यह हैं समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है, सामाजिक सम्बंधो का अध्ययन हैं। समाज-वैज्ञानिक अनुसंधान का एक भाग होता है। अतः वह अपने अध्ययन मे तटस्थ नही हो सकता हैं।
2. सामाजिक घटनाओं की माप असम्भव 
विज्ञान कि पूर्णता इसमें है कि उसके द्वारा तथ्यों को नापा-तौला जा सकता है। समाजशास्त्री के लिए सामाजिक घटनाओं की माप संभव नही है। सामाजिक घटनाएं अमूर्त होती है। जो अमूर्त है, जिसे और छूआ नही जा सकता हैं, उसकी माप कैसे की जा सकती है? वैज्ञानिक मकान की लम्बाई और की माप कर सकता हैं, किन्तु एक समाजशास्त्रीय पिता-पूत्र के सम्बन्धो की माप नही कर सकता। 
3. प्रयोगशाल नही
समाजशास्त्र के मे प्रयोगशाल नही होती। भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र आदि विज्ञानों के अध्ययन हेतु अनेक प्रयोगशालाएं हैं। समाजशास्त्र के पास ऐसी कोई प्रयोगशाल नही है जहाँ जाकर वह समाज के सम्बन्ध मे कुछ प्रयोग कर सके।
4. भविष्यवाणी का अभाव 
समाजशास्त्र भविष्यवाणी नही कर सकता है क्योंकि समाज सतत् परिवर्तनशील है। समाज की घटनाएं सतत् परिर्वित होती रहती है। जब समाज की घटनाएं परिवर्तित होती रहेंगी, तो इसके सम्बन्ध मे भविष्यवाणी भी नही की जा सकेगी। भविष्यवाणी के अभाव मे समाजशास्त्र को विज्ञान नही कहा जा सकता हैं। 
समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति 
राबर्ट बीयस्टेड के अनुसार; 1. समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है न कि प्राकृतिक विज्ञान।
2. समाजशास्त्र एक तार्किक व अनुभवसिध्द विज्ञान हैं।
3. समाजशास्त्र एक समान्य विज्ञान है न कि विशेष विज्ञान।
4. समाजशास्त्र एक विशुद्ध विज्ञान है न कि व्यावहारिक विज्ञान।
5. समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है, मूर्त नही।
6. समाजशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है न कि आदर्शात्मक विज्ञान।
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