3/09/2022

सामाजिक संरचना अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

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समाजशास्त्र मे सबसे पहली बार हर्बर्ट स्पेंसर ने सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तक "प्रिंसिपल ऑप सोशियोलाॅजी" मे सन् 1885 मे किया था।
लेकिन स्पेन्सर संरचना को बहुत स्पष्ट नहीं कर सके। सामाजिक संरचना शब्द को लेकर विभिद मतभेद है लेकिन लगभग सभी इस बात से सहमत हैं कि सामाजिक संरचना का तात्पर्य ‘सामाजिक निरंतरता तथा पुनरावृत्ति’ से है।
प्रारंभिक रूप से ‘स्ट्रक्चर’ शब्द अंग्रेजी भाषा से लिया गया जिसका अर्थ भवन की संरचना या बनावट से है, 16वीं शताब्दी तक इसका अर्थ बदल गया और इसे किसी वस्तु के विभिन्न घटको के बीच ‘परस्पर सम्बंधों के संदर्भ में किया जाने लगा।

सामाजिक संरचना का अर्थ (samajik sanrachna kise khate hai ) 

जिस प्रकार से हमारे शरीर की संरचना होती हैं जो की हमारे शरीर के अंगो जैसे की हाथ,पैर, पेट,नाक-कान, आदि से मिलकर बनती है। उसी प्रकार से सामाजिक संरचना का अभिप्राय समाज की इकाइयों की क्रमबद्धता से होता हैं। सामाजिक इकायां जैसे की समूह, समितियां, संस्थाएं, परिवार, सामाजिक प्रतिमान आदि की क्रमबद्धता को सामाजिक संरचना कहा जाता हैं।
स्पष्ट है की संरचना शब्द से आशय इकाइयों की क्रमबद्धता से है। इकाइयों का एक ऐसा प्रतिमानित संबंध जो अपेक्षाकृत स्थिर होता है संरचना कहलता हैं। हम हमारे चारों और की वस्तुओं की संरचना को भली-भांती समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए आप एक मकान की संरचना को ले सकते हैं जिसकी संरचना ईट, चूना, सीमेंट आदि चीजों की क्रमबद्धता से बनी हैं। अगर मनाक मे से ईट, चूना, सीमेंट आदि को अगल-अलग कर दिया जाऐ तो मकान की संरचना नष्ट हो जाएँगी। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों के कुल योग को सामाजिक संरचना माना हैं।

सामाजिक संरचना की परिभाषा (samajik sanrachna ki paribhasha) 

टालकाट पारसन्स के अनुसार," सामाजिक संरचना परस्पर संबंधित संस्थाओं, एजेंसियों और सामाजिक प्रतिमानों तथा समूह मे प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किये गये पदों एवं कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।"
इग्गन के अनुसार," अन्त:वैयक्तिक सम्बन्ध सामाजिक संरचना के अंग हैं, जो कि व्यक्तियों द्वारा अधिकृत पद-स्थितियों के रूप मे सामाजिक संरचना के अंग बन जाते है और उसका निर्माण करते हैं।
फोर्टस, " व्यक्तियों के बीच पाये जाने वाले पारस्परिक सम्बन्ध ही सामाजिक संरचना के अंग है। इसमे जिन अंगो का समावेश होता हैं, उसकी प्रकृति परिवर्तनशील हैं तथा इनमे पर्याप्त भिन्नता भी है।"
मैकाइवर तथा पेज, " समूह निर्माण के विभिन्न रूप से सामाजिक संरचना के जटिल प्रतिमान की रचना करते है। सामाजिक संरचना के विश्लेषण मे सामाजिक प्राणियों की विविध मनोवृत्तियो तथा रूचियों के कार्य प्रदर्शित होते हैं। "
कार्ल मानहीम के शब्दों में," सामाजिक संरचना परस्पर क्रिया मे निहित सामाजिक शक्तियों का जाल है।"
लेवीस्ट्रास के अनुसार," एक समाज की संरचना उस समाज मे रहने वाले लोगों के दिमाग की संरचना हैं।"
कोजर के शब्दों में," सामाजिक संरचना का आशय विभिन्न सामाजिक इकाइयों के तुलनात्मक रूप से स्थिर और प्रतिमानित संबंधों से हैं।" 
मैडेल के अनुसार," सामाजिक संरचना अनेक अंगों की एक क्रमबद्धता की ओर संकेत करती हैं।यह संरचना तुलनात्मक रूप से स्थिर होती हैं, लेकिन इसका निर्माण करने वाले अंग स्वयं परिवर्तनशील होते हैं। 
रेडक्लफ ब्राउन के अनुसार," सामाजिक संरचना के अंग मनुष्य ही है और स्वयं संरचना संस्था द्वारा परिभाषित और नियमित संबंधों मे लगे हुये व्यक्तियों की क्रमबद्धता हैं।"
गिन्सबर्ग के अनुसार," सामाजिक संरचना का अध्ययन सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों समूह, समितियों तथा संस्थाओं के प्रकार एवं इनकी संपूर्ण जटिलता जिनसे कि समाज का निर्माण होता है, से संबंधित है।"
सामाजिक संरचना की उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता हैं कि सामाजिक संरचना अनेक सामाजिक समूहों, समितियों, संस्थाओं तथा व्यक्तियों की प्रस्थिति और भूमिका को प्रभावित करने वाले नियमों तथा मूल्यों की एक क्रमबद्धता हैं। यह सच है कि जरूरत के अनुसार सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाले अंगों की प्रकृति में परिवर्तन भी होता रहता हैं, किन्तु इससे सामाजिक संरचना में साधारतया कोई परिवर्तन नहीं होता। यह स्थिति वैसी ही हैं, जिस प्रकार रोग अथवा स्वास्थ्य की दशा में शरीर का कोई अंग पहले की तुलना में कुछ बदल जाने के बाद भी स्वयं शरीर की संरचना में कोई परिवर्तन नहीं होता।

सामाजिक संरचना की विशेषताएं (samajik sanrachna ki visheshta)

सामाजिक संरचना की विशेषताएं निम्नलिखित है--
1. सामाजिक संरचना अमूर्त होती हैं अमूर्त का अर्थात है कि जो जो मूर्त या साकार न हो, निराकार, देहरहित, निरवयव, अप्रत्यक्ष। सामाजिक संबंधों का आधार सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक प्रतिमान तय करते हैं जो कि अमूर्त होते हैं।
2. सामाजिक संरचना अनेक उपसंरचनाओं से मिलकल बनती है जैसे की परिवार, नातेदार, संस्थाएं, समितियां, समूह आदि। इस प्रकार अनेक उप संरचनाएँ मिलकर सामाजिक संरचना का स्वरूप तय करती हैं।
3. सामाजिक संरचना से हमे समाज के बाहरी स्वरूप का ज्ञान होता हैं। संरचना की इकाइयां परस्पर संबंधित होकर एक ढांचे का निर्माण करती हैं जिससे हमे संरचना के स्वरूप का बोध होता हैं।
4. जिसा कि सामाजिक संरचना के अर्थ मे ऊपर कहा गया है कि सामाजिक संरचना इकाइयों की क्रमबद्धता होती हैं। संरचना इकाइयों का महज संयोग नही बल्कि एक विशिष्ट क्रम संरचना का स्वरूप निर्धारित करता हैं। इस क्रम के अभाव मे संरचना कायम नही रह सकती।
5. सामाजिक संरचना मे विभिन्न इकाइयों का पद और स्थान पूर्व निर्धारित होता है। इन्हें प्रतिस्थापित नही किया जाता। समाज की जितनी भी इकाइयां हैं वे अपना-अपना पूर्व निर्धारित कार्य करती हैं।
6. प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न-भिन्न होती हैं, अतः संस्कृति द्वारा निर्धारित प्रतिमानों मे भिन्नता होने के कारण संरचना भी भिन्न-भिन्न होती हैं। सामाजिक संरचना की प्रकृति उसके अंगो पर निर्भर करती है और अंगो का स्वरूप हर समाज मे अगल होता हैं। इसलिए सामाजिक संरचना मे विभिन्नता पाई जाती हैं।
7. सामाजिक संरचना स्थानीय विशेषताओं से प्रभावित होती हैं। प्रत्येक समाज की संस्कृति स्थानीय परिवेश से अनुकूलन के परिणामस्वरूप विकसित होती हैं।
8. सामाजिक संरचना की एक विशेषता यह भी है कि यह अपेक्षाकृत स्थाई होती हैं।
9. सामाजिक प्रक्रियाएं सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण पक्ष हैं। समाज मे सहयोग, व्यवस्थापन, अनुकूलन, सात्मीकर, प्रतिस्पर्धा जैसी अनेक प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। सामाजिक संरचना इन प्रक्रियाओं से प्रभावित होती हैं।
10. सामाजिक संरचना के भाग व्यक्ति एवं समूह तथा सामाजिक सम्बन्ध एवं संस्थाएं क्रमशः मूर्त तथा अर्मूत होते है। भाग परिवर्तनशील भी होते हैं, किन्तु संरचना अमूर्त एवं तुलनात्मक रूप से अपरिवर्तनशील होती हैं। सामाजिक संरचना मे परिवर्तन होता हैं, किन्तु सामान्यतः भागों मे परिवर्तन की तुलना मे संरचना मे परिवर्तन कम होता हैं।
11. सामाजिक संरचना समाज मे समूहों, संस्थाओं के विन्यास को प्रकट करती हैं, न कि उनके प्रकार्यों को।
12. सामाजिक संरचना के निर्माण मे सामाजिक परिस्थितियों और सामाजिक आवश्यकताओं की भी भूमिका महत्वपूर्ण होती हैं। यही कारण है कि सामाजिक संरचना मे अनुकूलन करने की क्षमता होती हैं।
13. सामाजिक संरचना का निर्माण सदस्यों के उत्तरदायित्व की भावना से होता हैं, जबकि समाज की संरचना का निर्माण अनेक सदस्यों के अधिकार और कर्त्तव्य की व्यवस्था से होता हैं।
14. सामाजिक संरचना मे सामाजिक प्रक्रियाओं मे सम्बन्धित व्यक्तियों या कर्ताओं की अतः क्रियाएं सम्मिलित रहती हैं।

सामाजिक संरचना के स्तर 

जॉनसन ने सामाजिक संरचना के दो स्तरों प्रकार्यात्मक उप-प्रणाली तथा संरचनात्मक उप-प्रणाली का उल्लेख किया है-- 
1. प्रकार्यात्मक उप-प्रणालियाँ (Functional Sub-systems)  
प्रत्येक समाज को अपने अस्तित्व के लिए समस्याओं का निवारण या आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है। वे हैं- प्रतिमानों को बनाए रखना एवं तनावों को दूर करना (Pattern Maintenance and Tension Management), अनुकूलन (Adaptation) उद्देश्य प्राप्ति (Goal Attainment) एकीकरण ( Integration )। ऐसा न होने पर वह समाज अपना अस्तित्व एवं विशिष्ट स्वरूप खो देता हैं। इनमें से प्रत्येक समस्या के लिए एक प्रकार्यात्मक उप प्रणाली होगी। उदाहरण के लिए, अर्थव्यवस्था  वह प्रकार्यात्मक उप-प्रणाली है जो समाज के अनुकूलन से सम्बन्धित है। अर्थव्यवस्था वस्तुओं एवं सेवाओं को उत्पन्न करती है और समूह एवं समितियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। 
परिवार रूपी प्रकार्यात्मक उप-प्रणाली समाज में समाजीकरण के द्वारा दिन-प्रतिदिन के तनावों को दूर करने एवं सामाजिक प्रतिमानों को बनाए रखने का कार्य करती है। शिक्षण संस्थाएँ धार्मिक समूह, मनोरंजन के समूह, अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य संगठन भी समाज में तनावों को दूर करने एवं प्रतिमानों को बनाए रखने में योग देते हैं। 
उद्देश्यों की पूर्ति में सरकार रूपी उप-प्रणाली महत्त्वपूर्ण है। सरकार शक्ति के द्वारा समाज के उद्देश्यों की पूर्ति करती है। प्रजातन्त्र में दबाव समूह जनमत तैयार करते हैं और संसद के लिए बिलों का मसौदा बनाते हैं और वे भी समाज के उद्देश्यों की पूर्ति में योग देते हैं इस प्रकार राज्य व्यवस्था (Polity) उद्देश्य प्राप्ति की महत्त्वपूर्ण उप प्रणाली है। 
इन सभी में एकीकरण एवं समन्वय स्थापित करने में वकालत का व्यवसाय, धार्मिक नेता, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आदि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
सैद्धान्तिक दृष्टि से समाज की प्रत्येक उप-प्रणाली को एक स्वतंत्र सामाजिक प्रणाली के रूप में देखा जा सकता है। इनमें से प्रत्येक उप-प्रणाली के लिए अन्य उप-प्रणालियों को पर्यावरण के रूप में देखा जा सकता है और सभी उप-प्रणालियों का एक-दूसरे के साथ व्यवस्थित रूप से विनिमय होता रहता है। 
2. संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ (Structural Sub-systems)  
समाज की प्रकार्यात्मक उप-प्रणालियाँ अमूर्त होती हैं, जबकि संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ मूर्त समूहों से बनी हुई होती है; जैसे नातेदारी- तंत्र, पिरवारों, गोत्रों और वंश- समूहों से बना होता है। इसके अतिरिक्त, चर्च, शिक्षा प्रणाली आदि में संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ हैं। संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ मूर्त एवं वास्तविक होती हैं।
शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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