3/09/2022

प्रस्थिति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, प्रकार/वर्गीकरण

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प्रश्न; प्रस्थिति क्या हैं? प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति में अंतर स्पष्ट कीजिए। 
अथवा" प्रस्थिति से आप क्या समझते है? 
अथवा" प्रस्थिति की परिभाषा दीजिए। समाज में प्रस्थिति के निर्धारण के क्या आधार हैं?
उत्तर--

प्रस्थिति या स्थिति का क्या अर्थ हैं, प्रस्थिति किसे कहते है?

 प्रस्थिति या स्थिति व्यक्ति के समूह या समाज मे स्थान को प्रगट करती है। समाज मे अनेक स्थितियां होती है जिन्हे व्यक्ति पा सकता हैं--- पति, पिता, पुत्र, शिक्षक, छात्र, क्रिकेट खिलाड़ी, पत्नी, पति, पुलिस अधिकारी, मंत्री, वकील, जज, कैदी, आदि। इस प्रकार एक व्यक्ति समाज मे एक साथ अनेक स्थितियों पर आरूढ़ हो सकता हैं।
प्रस्थिति या स्थिति का अर्थ, एक समय विशेष में, किसी विशेष स्थान मे, किसी विशेष व्यवस्था के अन्दर जो व्यक्ति को एक स्थान मिला होता है व उसकी स्थिति या प्रस्थिति या पद हैं।
मैकाइवर और पेज के अनुसार प्रस्थिति या स्थिति व्यक्ति का समाज मे स्थान है जिस पर होने से इस बात के अलावा कि उसमे क्या गुण है और वह समाज की क्या सेवा करता है उसे समाज मे किसी अंश तक सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रभाव प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए पति यदि निठल्ला, मुर्ख और व्यभिचारी है तो भी परम्परात्मक भारतीय परिवारों मे उसकी स्थिति पत्नी से अच्छी ही रहती हैं। इसी प्रकार किसी जिला प्रशासनिक अधिकारी मे निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता का अभाव, जन कल्याण कार्यों के प्रति अरूचि तथा कार्य के प्रति लगन और निष्ठा के अभाव के बावजूद भी एक विशेष स्थिति पर आरूढ़ होने की वजह से उसे समाज मे एक अंश तक सम्मान प्रतिष्ठा मिलती है और वह दूसरों पर प्रभाव रखता हैं।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रस्थिति या स्थिति किसी व्यक्ति के समाज मे स्थान, जिसके सन्दर्भ मे वह अन्य व्यक्तियों से संबंधित होता हैं, की सामाजिक पहचान है जिससे उसे समाज मे सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त होती हैं।

प्रस्थिति या स्थिति के आवश्यक तत्व अथवा विशेषताएं 

प्रस्थिति की निम्नलिखित विशेषताएं हैं--
1. स्थिति का हस्तांतरण
स्थितियों के संस्थाकरण के द्वारा समाज की संस्कृति का एक अंग बन जाती है और अन्य सांस्कृतिक उपकरणों के समान ये भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती हैं।
2. सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा निर्धारण
समाज मे व्यक्ति की स्थिति का निर्धारण समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर होता हैं।
3. सापेक्षिक अवधारणा
हम किसी प्रस्थिति का अर्थ अन्य स्थितियों के संन्दर्भ मे ही समझ सकते है। उदाहरण के लिए पति की स्थिति का अर्थ पत्नी की स्थिति के संन्दर्भ मे ही स्पष्ट किया जा सकता हैं।
4. प्रस्थिति की विविधता
एक ही समय मे एक व्यक्ति की अनेक स्थितियाँ होती है अर्थात् वह विभिन्न समूहों मे विभिन्न स्थानों को ग्रहण करता हैं।
5. एक लम्बे समय तक समाज मे विद्यमान रहने के कारण स्थितियां होती हैं
अर्थात् वह विभिन्न समूहों के विभिन्न स्थानों को ग्रहण करता है। समाज को प्रत्येक स्थिति नये सिरे से निर्धारित नही करनी होती, बल्कि वह पहले से ही समाज मे विद्यमान होती हैं।

प्रस्थिति या स्थिति के प्रकार 

प्रस्थिति निम्न दो प्रकार की होती हैं--

1. प्रदत्त स्थिति या जन्मजात प्रस्थिति

प्रदत्त स्थिति समाज द्वारा व्यक्तियों को बिना उनकी योग्यताओं और क्षमताओं मे भेद का ध्यान किए जन्म से प्राप्त होती हैं। इन्हें जन्मजात या प्रदत्त स्थिति कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि जन्मजात या प्रदत्त स्थितियां वे स्थितियां है जो व्यक्ति को अपने समाज के बिना किसी प्रयत्न के उपलब्ध हो जाती है। ये स्थितियां व्यक्ति को उनकी जन्मजात योग्यताओं का विचार किये बिना ही मिल जाती हैं। प्रदत्त स्थिति का आधार लिंग भेद, आयु भेद, नातेदारी, वर्ण भेद तथा कुछ अन्य आधार हैं।
प्रदत्त प्रस्थिति की प्रकृति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि प्रदत्त प्रस्थिति के निर्धारक कारक कौन-कौन से हैं। अथवा वे कौन-से आधार हैं जो व्यक्ति की प्रदत्त प्रस्थितियों का निर्धारण करते हैं? इन निर्धारक कारकों अथवा आधारों को संक्षेप में निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता हैं--
1. लिंग-भेद 
विश्व के विभिन्न समाजों और संस्कृतियों के अध्ययन से स्पष्ट होता हैं कि स्त्रियों और पुरूषों की प्रस्थिति एक-दूसरे से हमेशा भिन्न रही हैं। जैविकीय आधार पर समझा जाता है कि पुरूषों की तुलना में स्त्रियाँ अधिक कमजोर, भावुक और अन्धविश्वासी होती हैं। बच्चों के पालन-पोषण तथा घरेलू कामों के कारण भी स्त्रियों को वे कार्य नहीं दिए जाते जिनका संबंध शक्ति और साहस से होता हैं। अधिकांश समाजों में लिंग-भेद व्यक्ति की प्रदत्त स्थिति का एक प्रमुख आधार हैं। 
2. आयु-भेद
आयु की भिन्नता के आधार पर भी विश्व के लगभग सभी समाजों में विभिन्न व्यक्तियों की प्रस्थिति एक-दूसरे से भिन्न होती है। समाज एक बच्चे अथवा किशोर की तुलना में युवा और प्रौढ़ लोगों को अधिक अधिकार देता हैं। वृद्धावस्था को प्रत्येक समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता हैं। प्राचीन भारत, चीन और जापान मे व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करने में आयु का हमेशा से ही विशेष महत्व रहा हैं। 
3. नातेदारी 
बहुत प्राचीन काल से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके परिवार और नातेदारी समूह की स्थिति से प्रभावित होती आयी हैं। साधारणतया यह समझा जाता है कि व्यक्ति के माता-पिता और दूसरे स्वजन यदि योग्य, प्रतिभाशाली तथा परिश्रमी हैं तो वह व्यक्ति भी इन्हीं गुणों से सम्पन्न होगा। नातेदारी के आधार पर ही व्यक्ति को अपने परिवार में भी कुछ ऐसी प्रस्थितियां प्राप्त होती है जिनके लिए उसे कोई प्रयत्न नहीं करने पड़ते। 
4. प्रजाति-भेद 
अमेरिका, अफ्रीका और अनेक दूसरे देशों में प्रजाति के आधार पर विभिन्न व्यक्तियों और समूहों की प्रस्थिति में भेद करना एक सामान्य सी बात हैं। बहुत लम्बे समय से इस भ्रान्ति का प्रचार किया जाता रहा है कि काली प्रजाति की तुलना में गोरी प्रजाति के लोग अधिक साहसी, योग्य और कुशल होते हैं। इसके फलस्वरूप काली प्रजाति के लोगों को वे अधिकार और प्रस्थिति नहीं दी जाती जो गोरी प्रजाति के लोगों को सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। 
5. जाति-भेद 
जाति एक ऐसा आधार है जो जन्म से ही कुछ व्यक्तियों को दूसरों की अपेक्षा अधिक उच्च मान लेता हैं। भारतीय समाज में कोई व्यक्ति चाहे कितना ही योग्य और कुशल क्यों न हो, लेकिन किसी निम्न जाति में जन्म लेने के कारण उसकी प्रस्थिति निम्न हो जाती हैं। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति उच्च जाति में जन्म लेता है तो कितना भी मूर्ख और अकुशल होने के बाद भी उसे एक उच्च सामाजिक प्रस्थिति प्राप्त हो जाती हैं। 
6. जन्म की वैधता
डेविस का कथन है कि बच्चे के जन्म की वैधता भी प्रदत्त स्थिति का एक मुख्य आधार हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी बच्चे का जन्म अवैध रूप से होता है तो जीवन के आरंभ से ही समाज में उसे नीची निगाह से दिखा जाने लगता हैं। इससे उसकी प्रस्थिति निम्न बन जाती हैं। आधुनिक युग में अवैध सन्तानों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होते रहने के कारण अब प्रदत्त स्थिति के निर्धारण में इस आधार का महत्व भी बढ़ता जा रहा हैं।

2. अर्जित या स्वार्जित स्थिति

अर्जित स्थिति व्यक्ति को जन्म से प्राप्त नही होती। इसके लिए उसे प्रयास करना पड़ता हैं। अर्जित स्थिति प्राप्त की जाती है, प्रदान नही की जाती। इसके लिए व्यक्ति मे होड़ होती है। यह व्यक्ति की योग्यता, कुशलता और क्षमता पर निर्भर करती हैं। समाज मे अर्जित स्थिति का मुख्य आधार हैं--- शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक स्थिति, आय आदि। वर्ग सदस्यता अर्जित स्थिति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। समाज मे अनेक ऐसे व्यक्ति पाये जाते है, जो अपने व्यक्तिगत गुणों के आधार पर समाज मे आगे निकल जाते हैं।
अर्जित प्रस्थिति के निर्धारक तत्व
अर्जित प्रस्थिति के निम्नलिखित निर्धारक तत्व हैं--
1. शिक्षा 
शिक्षा अर्जित प्रस्थिति का एक प्रमुख निर्धारक तत्व है। शिक्षा सामाजिक स्थिति का निर्धारण करती है। प्रगतिशील और प्रजातंत्रात्मक समाजों में इस कारक का विशेष महत्व है। प्रोफेसर और जज की सामाजिक स्थिति उसकी योग्यता, शिक्षा और प्रशिक्षण के कारण भिन्न-भिन्न होती हैं। 
2. संपत्ति का संचय 
आधुनिक युग में व्यक्ति की अर्जित प्रस्थिति का एक महत्वपूर्ण आधार उसके द्वारा एकत्रित की गयी सम्पत्ति की सीमा हैं। साधारणतया यह समझा जाता है कि जिन व्यक्तियों ने अधिक संपत्ति अर्जित की हैं, वे दूसरे लोगों की तुलना में अधिक साहसी, परिश्रमी, योग्य और कुशल होते हैं। यही कारण हैं कि निर्धन व्यक्ति की तुलना में एक उद्योगपति की सामाजिक स्थिति काफी ऊँची होती हैं। इसके बाद भी संपत्ति का संचय अर्जित प्रस्थिति का एक तुलनात्मक आधार हैं। उच्च प्रस्थिति के लिए संपत्ति का संचय वैध साधनों के द्वारा होना जरूरी हैं। 
3. राजनीतिक अधिकार 
वर्तमान लोकतांत्रिक समाजों में राजनीतिक अधिकार अर्जित प्रस्थिति का एक महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा हैं। संपत्ति और शिक्षा का अभाव होने के बाद भी कोई व्यक्ति नेतृत्व की कुशलता के द्वारा यदि राजनीतिक सत्ता प्राप्त कर लेता हैं तो उसकी सामाजिक प्रस्थिति बहुत ऊँची हो जाती हैं। नेतृत्व कि गुण एक अर्जित गुण हैं। कोई समाज नेता की प्रस्थिति व्यक्ति को स्वयं ही नहीं दे सकता। 
4. आविष्कार तथा नवाचार 
जो व्यक्ति अपनी लगन, सूझ-बूझ और परिश्रम से उपयोगी आविष्कार करते है, वे एक उच्च सामाजिक प्रस्थिति अर्जित कर लेते हैं। न्यूटन, गैलीलियों, मार्कोंनी, आइन्स्टाइन तथा जगदीश चन्द्र बसु ने बड़े-बड़े आविष्कार करके ही उच्च प्रस्थिति अर्जित कर ली। नवाचार का अर्थ व्यवहार के नये ढंगों की खोज करना हैं। ऐसे नवाचार संगीत, अभिनय, लेखन तथा समाज कल्याण आदि किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो सकते हैं। यही कारण है कि बड़े-बड़े संगीतकार, कलाकार, खिलाड़ी, लेखक और समाज सुधारक एक उच्च सामाजिक प्रस्थिति अर्जित कर लेते हैं। 
5. व्यवसाय की प्रकृति 
जो व्यक्ति सम्मानित व्यवसाय के द्वारा आजीविका अर्जित करते हैं, वे एक उच्च सामाजिक प्रस्थिति अर्जित कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, प्रशासनिक अधिकारी, डाॅक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर जैसे व्यवसायों को अधिक सम्मानित माना जाता हैं। दूसरी और, एक पनवाड़ी, चमड़ा अथवा शारब का व्यवसाय करने वाला, वैश्यावृत्ति से व्यक्ति चाहे कितनी भी सम्पत्ति अर्जित कर ले, वह एक उच्च प्रस्थिति अर्जित नहीं कर पाता हैं।

प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति में अंतर

प्रदत्त और अर्जित स्थिति में निम्नलिखित अंतर हैं-- 
1. प्रदत्त स्थिति व्यक्ति को समाज द्वारा प्राप्त होती हैं, जिसके लिये उसे कोई प्रयत्न नहीं करने पड़तें। स्वार्जित स्थिति व्यक्ति के स्वयं के प्रयासों द्वारा होती हैं। 
2. प्रदत्त स्थिति को व्यक्ति समाज में लिंग-भेद, आयु भेद, नातेदारी, वर्ण भेद तथा कुछ अन्य आधारों पर प्राप्त करता हैं। स्वार्जित स्थिति में इन आधारों का कोई महत्व नहीं होता। 
3. प्रदत्त स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर होती हैं, स्वार्जित स्थिति परिवर्तनशील होती है। 
4. प्रदत्त स्थिति सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों के अनुसार निर्धारित होती हैं। स्वार्जित स्थिति का प्रमुख संबंध समाज की आर्थिक व्यवस्था से हैं। 
5. प्रदत्त स्थिति सामूहिकता को प्रोत्साहन देती हैं, स्वार्जित स्थिति व्यक्तिवादिता को प्रोत्साहिन देती हैं। 
6. प्रदत्त स्थिति बंद एवं परम्परागत समाजों में पायी जाती हैं। स्वार्जित स्थिति आधुनिक मुक्त समाजों की प्रमुख विशेषता हैं।

प्रदत्त एवं स्वार्जित स्थिति में संबंध 

प्रत्येक समाज में प्रदत्त एवं स्वार्जित दोनों ही स्थितियाँ पाई जाती हैं। यह बात भिन्न है कि किसी में एक प्रकार की स्थिति दूसरी से अधिक प्रभावी हो। प्रदत्त व स्वार्जित स्थितियों में अंतर होते हुए भी दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। दोनों को एक-दूसरे का पूरक कहा जा सकता हैं। सामाजिक जीवन में दोनों स्थितियों का महत्व हैं। अतः दोनों का समाज में आवश्यक हैं। सामाजिक विरासत से प्राप्त गुणों को स्थायी रखने के लिए प्रदत्त स्थिति आवश्यक हैं। यही नही प्रदत्त स्थिति व्यक्ति को ऐसा मार्ग प्रशस्त करती हैं जिसके आधार पर चलकर व्यक्ति स्वार्जित स्थितियों को प्राप्त कर सकता हैं। इस प्रकार प्रदत्त स्थिति एक आधार पर कार्य करती हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति अपने भविष्य को निश्चित करता हैं। डेविस का कथन हैं कि," प्रदत्त स्थिति के द्वारा एक व्यक्ति एक प्रकार की सुरक्षा का अनुभव करता हैं, जिसे स्वार्जित स्थिति प्रदान नही कर सकती। 
स्वार्जित स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रदत्त स्थिति भी आवश्यक होती हैं। स्वार्जित स्थिति को भी प्रदत्त तत्वों की अपेक्षा रहती हैं। 
संक्षेप में हम कह कहते है कि स्थिति आंशिक आरोपित एवं आंशिक अर्जित होता हैं। अर्थात् कोई भी स्थिति पूर्णतः प्रदत्त या पूर्णतः अर्जित नहीं हो सकती। यह हो सकता हैं, इनमें से एक प्रकार मुख्य हो व दूसरा गौण। किसी भी समाज में व्यवहार रूप में दोनों को बिल्कुल अलग-अलग नहीं किया जा सकता।
शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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