प्रस्थिति या स्थिति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं प्रकार

प्रस्थिति या स्थिति का क्या अर्थ हैं, पस्थित या स्थिति किसे कहते है 

प्रस्थिति या स्थिति व्यक्ति के समूह या समाज मे स्थान को प्रगट करती है। समाज मे अनेक स्थितियां होती है जिन्हे व्यक्ति पा सकता हैं--- पति, पिता, पुत्र, शिक्षक, छात्र, क्रिकेट खिलाड़ी, पत्नी, पति, पुलिस अधिकारी, मंत्री, वकील, जज, कैदी, आदि। इस प्रकार एक व्यक्ति समाज मे एक साथ अनेक स्थितियों पर आरूढ़ हो सकता हैं।
प्रस्थिति या स्थिति
प्रस्थिति या स्थिति का अर्थ; एक समय विशेष में, किसी विशेष स्थान मे, किसी विशेष व्यवस्था के अन्दर जो व्यक्ति को एक स्थान मिला होता है व उसकी स्थिति या प्रस्थिति या पद हैं।
मैकाइवर और पेज के अनुसार प्रस्थिति या स्थिति व्यक्ति का समाज मे स्थान है जिस पर होने से इस बात के अलावा कि उसमे क्या गुण है और वह समाज की क्या सेवा करता है उसे समाज मे किसी अंश तक सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रभाव प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए पति यदि निठल्ला, मुर्ख और व्यभिचारी है तो भी परम्परात्मक भारतीय परिवारों मे उसकी स्थिति पत्नी से अच्छी ही रहती हैं। इसी प्रकार किसी जिला प्रशासनिक अधिकारी मे निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता का अभाव, जन कल्याण कार्यों के प्रति अरूचि तथा कार्य के प्रति लगन और निष्ठा के अभाव के बावजूद भी एक विशेष स्थिति पर आरूढ़ होने की वजह से उसे समाज मे एक अंश तक सम्मान प्रतिष्ठा मिलती है और वह दूसरों पर प्रभाव रखता हैं।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रस्थिति या स्थिति किसी व्यक्ति के समाज मे स्थान, जिसके सन्दर्भ मे वह अन्य व्यक्तियों से संबंधित होता हैं, की सामाजिक पहचान है जिससे उसे समाज मे सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त होती हैं।

प्रस्थिति या स्थिति के आवश्यक तत्व अथवा विशेषताएं 

1. स्थिति का हस्तांतरण
स्थितियों के संस्थाकरण के द्वारा समाज की संस्कृति का एक अंग बन जाती है और अन्य सांस्कृतिक उपकरणों के समान ये भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती हैं।
2. सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा निर्धारण
समाज मे व्यक्ति की स्थिति का निर्धारण समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर होता हैं।
3. सापेक्षिक अवधारणा 
हम किसी प्रस्थिति का अर्थ अन्य स्थितियों के संन्दर्भ मे ही समझ सकते है। उदाहरण के लिए पति की स्थिति का अर्थ पत्नी की स्थिति के संन्दर्भ मे ही स्पष्ट किया जा सकता हैं।
4. प्रस्थिति की विविधता
एक ही समय मे एक व्यक्ति की अनेक स्थितियाँ होती है अर्थात् वह विभिन्न समूहों मे विभिन्न स्थानों को ग्रहण करता हैं।
5. एक लम्बे समय तक समाज मे विद्यमान रहने के कारण स्थितियां होती हैं
अर्थात् वह विभिन्न समूहों के विभिन्न स्थानों को ग्रहण करता है। समाज को प्रत्येक स्थिति नये सिरे से निर्धारित नही करनी होती, बल्कि वह पहले से ही समाज मे विद्यमान होती हैं।

प्रस्थिति या स्थिति के प्रकार

1. प्रदत्त स्थिति या जन्मजात प्रस्थिति
प्रदत्त स्थिति समाज द्वारा व्यक्तियों को बिना उनकी योग्यताओं और क्षमताओं मे भेद का ध्यान किए जन्म से प्राप्त होती हैं। इन्हें जन्मजात या प्रदत्त स्थिति कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि जन्मजात या प्रदत्त स्थितियां वे स्थितियां है जो व्यक्ति को अपने समाज के बिना किसी प्रयत्न के उपलब्ध हो जाती है। ये स्थितियां व्यक्ति को उनकी जन्मजात योग्यताओं का विचार किये बिना ही मिल जाती हैं। प्रदत्त स्थिति का आधार लिंग भेद, आयु भेद, नातेदारी, वर्ण भेद तथा कुछ अन्य आधार हैं।
2. अर्जित या स्वार्जित स्थिति
अर्जित स्थिति व्यक्ति को जन्म से प्राप्त नही होती। इसके लिए उसे प्रयास करना पड़ता हैं। अर्जित स्थिति प्राप्त की जाती है, प्रदान नही की जाती। इसके लिए व्यक्ति मे होड़ होती है। यह व्यक्ति की योग्यता, कुशलता और क्षमता पर निर्भर करती हैं। समाज मे अर्जित स्थिति का मुख्य आधार हैं--- शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक स्थिति, आय आदि। वर्ग सदस्यता अर्जित स्थिति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। समाज मे अनेक ऐसे व्यक्ति पाये जाते है, जो अपने व्यक्तिगत गुणों के आधार पर समाज मे आगे निकल जाते हैं।
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