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3/28/2020

नियोजन का अर्थ, परिभाषा, महत्व/आवश्यकता

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नियोजन का अर्थ (niyojan kise kahte hai)

niyojan arth paribhasha mahatva;नियोजन वांछित परिवर्तन लाने का एक तरीका हैं। नियोजन भविष्य मे देखने की विधि अथवा कला है। इसमे भविष्य की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है ताकि लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले प्रयासों को उनके अनुरूप ढाला जा सके। 
आज के इस लेख मे हम नियोजन का अर्थ जानने के बाद हम नियोजन की विभिन्न विद्वानों द्धारा दी गई परिभाषा को जानेंगे।
नियोजन का मतलब

नियोजन परिवर्तन का एक ऐसा स्वरूप है जिसमे तार्किक ढंग से लक्ष्य और साधनों के संयोजन से वांछित परिवर्तन लाया जाता हैं। यह एक चेतन प्रयास है, जो समाज की समस्याओं को पहचानकर प्राथमिकता के आधार पर चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाता हैं। इस प्रक्रिया से समस्याओं का हल खोजने के लिए लक्ष्य निर्धारण सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाता हैं।

नियोजन की परिभाषा (niyojan ki paribhasha)

जाॅन ई इलियट के शब्दों में, " नियोजन क्रिया स्तयं मे एक सोद्देश्य क्रिया है। किन्ही पूर्व निश्चित उद्देश्यों के अभाव मे नियोजन की कल्पना करना कठिन है। नियोजन वह साधन है जिसे किसी निश्चित लक्ष्य के संदर्भ मे प्रयोग किया जाता है।
हार्ट के अनुसार, " नियोजन कार्यों की श्रृंखला का अग्रिम निर्धारण है जिसके द्वारा निश्चित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।"
गुन्नार मिर्डल के अनुसार, " नियोजन किसी देश की सरकार द्वारा किए गए वे जागरूक प्रयास है जिनके द्वारा लोक नीतियों की अधिक तार्किक ढंग से समन्वित किया जाता है ताकि अधिक से अधिक तेजी से विकास के लक्ष्यों को पूरा किया जा सके।

नियोजन का महत्व अथवा आवश्यकता (niyojan ka mahatva)

भारत मे नियोजन के द्वारा परिवर्तन लाने का महत्व निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट है--
1. आर्थिक पुनर्निर्माण 
भारत जैसे पिछड़े एवं कृषि प्रधान देश मे आर्थिक क्षेत्र में नियोजित परिवर्तन का काफी महत्व है। औद्योगिकरण ने अलग किस्म की समस्याएं उत्पन्न की है। आर्थिक विषमता, गंदी बस्तियां, बेरोजगारी, श्रमिकों का शोषण, गरीबी आदि महत्वपूर्ण समस्याओं का निराकरण नियोजित परिवर्तन से ही संभव है।
2. ग्रामीण पुनर्निर्माण 
भारत की 74. 3 प्रतिशत जनसंख्या 6 लाख से भी अधिक गाँवों मे निवास करती है। एक कल्याणकारी राज्य होने के नाते हम गाँवों की उपेक्षा कर कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य प्राप्त नही कर सकते। नियोजन के द्वारा ग्रामीण पुनर्निर्माण की योजनायें लागू करके हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।
3. समाज-कल्याण 
अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछ़ड़े वर्गों की संख्या यहां अत्यधिक है। इस वर्ग को सदियों तक शोषण का सामाना करना पड़ा है। इन वर्गों के उत्थान के बिना समाज की प्रगति संभव नही है। अतः इसके लिये नियोजित कार्यक्रम की आवश्यकता से इंकार नही किया जा सकता।
4. सामाजिक परिवर्तन 
भारतीय समाज में जातिवाद, अस्पृश्यता, अपराध, बाल अपराध, वेश्यावृत्ति, भिक्षावृत्ति, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भाषावाद, क्षेत्रवाद इत्यादि अनेक समस्याएं विकराल रूप धारण कर चुकी है। इन समस्याओं को सुलझाने एवं समाज को पुनर्गठित करने के लिए नियोजन की आवश्यकता है।
5. जनसंख्या नियंत्रण 
भारत में जनसंख्या की वृद्धि तेज गति से हो रही है। बढ़ती हुई जनसंख्या देश को पीछे ढकेलती है। अतः जनसंख्या को नियोजित किए बिना देश को समृद्ध नहीं किया जा सकता।
6. धार्मिक क्षेत्र मे नियोजन 
भारतीय समाज में बाल विवाह, सती प्रथा, देवदासी प्रथा, पर्दा प्रथा, अस्पृश्यता इत्यादि को धर्म के साथ जोड़ा गया साथ ही विभिन्न प्रकार के कर्मकांड एवं आडंबर प्रचलन में है। इनसे धर्म को मुक्त कर समाज में सुव्यवस्था स्थापित करने में नियोजन का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है।
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