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10/31/2019

अगस्त काॅम्टे का तीन स्तरों का नियम

तीन स्तरों का नियम सामाजिक विचारधारा के क्षेत्र में ऑगस्त काॅम्टे का एक महत्वपूर्ण योगदान हैं। ऑगस्त काॅम्टे एक सामाजिक विज्ञान की स्थापना करना चाहता था। इस लेख मे हम ऑगस्त काॅम्टे के तीन स्तरों के नियम व्याख्या करेंगे।

अगस्त काॅम्टे का तीन स्तरों का नियम 

तीन स्तरों के नियम के सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए ऑगस्त काॅम्टे ने लिखा है कि "हमारी प्रत्येक अवधारणाएं" हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक तीन विभिन्न सैध्दान्तिक दशाओं से होकर जाती हैं-
1. आध्यात्मिक अथवा काल्पनिक
2. तात्विक अथवा गुणात्मक
3. वैज्ञानिक या सकारात्मक
इस प्रकार ऑगस्त काॅम्टे ने मानव मस्तिष्क और सामाजिक संगठन के विकास को तीन अवस्थाओं से होकर गुजार हैं। तीन स्तरों का नियम मानव के सामाजिक चिन्तन की अथवा सोच-विचार की तीन अवस्थाएं हैं।
तीन स्तरो का नियम

ऑगस्त काॅम्टे के अनुसार तीन स्तर का नियम 

1. धार्मिक अवस्था
इसे मानव चिन्तन की प्रारम्भिक अवस्था माना गया हैं। यह मानव चिन्तन की वह अवस्था है, जिसमे मानव की बुद्धि का बहुत ही कम विकास होता हैं। इस स्तर पर जो भी घटित होता है जैसे बाढ़, बर्षा, सर्दी-गर्मी, भूकंप, तुफान, दिन-रात का होना, कोई बिमारी, स्नेह-प्रेम का होना आदि। इसका कारण मानव दैवी शक्ति या अलौकिक तत्वों को मानता है। काॅम्टे ने लिखा हैं", धार्मिक अवस्था सृष्टि की अनिवार्य प्रकृति की समस्त घटनाओं के आदि और अन्तिम कारणों संक्षेप मे सम्पूर्ण ज्ञान की खोज करने मे मानव मस्तिष्क यह मान लेता है कि समस्त घटनाचक्र अलौकिक प्राणियों की तात्कालिक क्रिताओं का परिणाम होता हैं।
हम कह सकते है की धार्मिक अवस्था  मे मानव प्रेत्यक घटना के पिछे किसी अलौकिक या दैवीय शक्ति के होने की ही बात सोचता है। काॅम्टे के अनुसार इस धार्मिक अवस्था की तीन उप-अवस्थाएं होती हैं --
(a) प्रेतवाद
इस अवस्था मे मानव के विचार रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास मे जकड़े हुए होते है। आदिम समाजो मे धर्म की उत्पत्ति के सम्बन्ध माना गया सिध्दान्त का अत्यधिक महत्व है। इस अवस्था मे मानव आत्मा और प्रेतआत्मा मे विश्वास करता है वह जादू-टोना जैसी आदि चीजों को मानता हैं।
(b) बहुदेवतावाद
इस विकास की प्रक्रिया मे जब मानव का मस्तिष्क कुछ और विकसित होने लगता है तो उसने अपने आप को प्रेतो से घिरा हुआ पाया और वह धार्मिक शक्तियों से घबरा कर इससे छुटकारा पाने का उपाय ढूंढने लगा। इस अवस्था मे मानव का चिन्तन संदेह एवं भय से परिपूर्ण होने लगता हैं इसे मे वह देवताओं की पूजा श्रध्दावश नही अपितु भयवश करता है।
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(c) एकेश्वरवाद
धार्मिक अवस्था के विकास की तीसरी और अन्तिम इस अवस्था को काॅम्टे एकेश्वरवाद का नाम देते हैं। इस अवस्था मे मानव का चिन्तन मानव के विचार केन्द्रीत होने लगते हैं। इस अवस्था मे मानव सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माता एवं संहारक एक ही ईश्वर को मानने लगता हैं।
2. तात्विक अवस्था 
इसे सामाजिक विकास की भावनात्मक या अमूर्त अवस्था के नाम से भी जाना जाता हैं। यह धार्मिक एवं प्रत्यक्षवाद के मध्य की अवस्था होती हैं। इसे हम प्रथम अवस्था का संशोधन भी कह सकते हैं। इस अवस्था मे मनुष्य का मस्तिष्क विकसित हो जाता है साथ ही उसमे तर्क-शक्ति का भी विकास होने लगता है। इस स्तर पर उसके मन मे अनेक सवाल उठने लगते है जैसे" ईश्वर कैसा दिखता है? वह कहाँ है? क्यों है? ये शंकाए उसके विचारों मे उठने लगती हैं। इस स्तर पर मानव रूढ़िवादिता एवं अन्धविश्वास से दूर हटने लगता हैं। काॅम्टे के अनुसार" मस्तिष्क यह मान लेता है कि अलौकिक शक्तियों की अपेक्षा अमूर्त शक्तियों यथार्थ सत्ता सभी जवों में अन्तर्निहित और समस्त घटनाचक्र को उत्पन्न करने की शक्ति रखता हैं।"
3. प्रत्यक्षत्मक अवस्था या वैज्ञानिक 
काॅम्टे ने चिन्तन की तीसरी और अन्तिम इस अवस्था को प्रत्यक्षात्मक या विज्ञानिक अवस्था का नाम दिया है हम जिस वस्तु को जो जिस रूप मे है उसी रूप मे देखते है उसे वैज्ञानिक चिन्तन कह जाता हैं। इस अवस्था या वैज्ञानिक के नाम मे सिर्फ उन्ही तथ्यों को स्वीकार किया जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते है। इस स्तर पर मानव का मस्तिष्क पूर्णतया विकसित हो जाता है इस अवस्था मे मनुष्य भौतिक घटनाओं  को बुध्दि की सहायता से सोचने का प्रयास करता हैं। काॅम्टे के अनुसार "अन्तिम प्रत्यक्षात्म अवस्था मे मानव का मस्तिष्क निरपेक्ष धारणाओं विश्व की उत्पत्ति एवं लक्ष्य तथा घटनाओं के कारणों की व्यर्थ खोज का त्याग कर देता हैं तथा उनके नियमों अर्थात् अनुक्रम तथा समरूपता के स्थिर सम्बन्धों के अध्ययन मे लग जाते है।
प्रत्यत्मक अवस्था मे मस्तिष्क दैवीय धारणाओं, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उद्देश्य घटनाओं के कारणो की खोज आदि व्यर्थ बातों की खोज को छोड़ देता है और इन घटनाओं के अनुक्रम और समानताओं के निश्चित सम्बन्धों मे लग जाता हैं।

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