9/29/2020

प्रकार्यवाद का सिद्धांत, मर्टन

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राबर्ट के. मर्टन ने अपनी पुस्तक "Social Theory and social Struture" मे प्रकार्यवाद के सिद्धांत का विश्लेषण एवं विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है। वाइन के अनुसार," इस पुस्तक ने मर्टन को प्रकार्यात्मक समाजशास्त्रीय सम्प्रदाय (the school of functional sociology) का नेता बना दिया।" मर्टन ने प्रकार्यवादी विश्लेषण की अवधारणा को प्रमुख मानवशास्त्रीय ब्रोनिसला मैलिनोवस्की (Bronislaw Malinowski) एवं रैडक्लिक ब्राउन (Radcliffe Brown) से ग्रहण की है। मर्टन ने प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण को विशेष रूप से परिमार्जित कर उसे बिल्कुल नये रूप मे प्रस्तुत किया है। 

राबर्ट के. मर्टन का प्रकार्यवाद का सिद्धांत 

मर्टन के प्रकार्यवाद पर विचार 

मर्टन का मत है कि प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण समाजशास्त्र मे जितना उपयोगी हो सकता था उतना नही हो पाया है। अतः इस दृष्टिकोण को नियबद्ध तथा परिशुद्ध बनाने के लिए प्रकार्य शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक है। मर्टन के अनुसार प्रकार्यवाद या प्रकार्यात्मक पद्धति शाब्दिक भ्रम मे फंसा रहा है। जैसे- एक शब्द कई प्रकार के अर्थों मे प्रयोग किया जाता रहा है तथा कई बार एक ही अर्थ के लिये कई शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है। मर्टन ने प्रकार्य शब्द के पांच भिन्न अर्थों के उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है--

1. उत्सव, सभा के रूप मे प्रकार्य 

किसी भी प्रकार की सभा या उत्सव को प्रकार्यात्मक विश्लेषण के संबंध मे उपयोग मे लाया जाता है। जबिक ऐसा नही होना चाहियें।

2. व्यवसाय के रूप मे प्रकार्य 

प्रकार्य (Function) शब्द को प्रायः व्यवसाय (Occupation) के समक्ष अर्थों मे प्रयोग किया जाता है। अर्थशास्त्री बहुधा इस शब्द का प्रयोग करते है। जैसे- हम कहते है आप क्या व्यवसाय (Function) कर रहै है। ब्लन्ट ने जातियों के विभिन्न व्यवसायों के लिए फंक्शन शब्द का ही प्रयोग किया है। मैक्स वेबर ने भी व्यवसाय की परिभाषा देते हुए इन्हीं अर्थों मे प्रकार्य शब्द का प्रयोग किया है। नेसफील्ड ने जाति की उत्पत्ति के व्यावसायिक सिद्धांत के लिए प्रकार्य (Function) शब्द का ही प्रयोग किया है।

3. स्थिति से संबंधित क्रियाओं के रूप मे प्रकार्य 

सामान्य बोलचाल की भाषा एवं राजनीतिशास्त्र मे इसका प्रयोग किया जाता है। प्रकार्य शब्द का प्रयोग किसी स्थिति से सम्बंधित क्रियाओं के अर्थ मे किया जाता है। किसी पद पर आसानी व्यक्ति के प्रकार्यों के रूप मे इसका विशेष उपयोग होता है। समाजशास्त्र और मानवशास्त्र मे भी इसका अर्थ कुछ ऐसा ही है पर वह विस्तृत है यह आवश्यक नही है कि व्यक्ति या पदासीन लोग ही प्रकार्य करते है। अमूर्त वस्तुये जैसे नियम, प्रथायें, विश्वास भी प्रकार्य करते है, इसलिए मर्टन इस अर्थ के पक्ष मे नही है। 

4. गणितशास्त्रीय अर्थ मे प्रकार्य 

गणित मे लेवनीज ने प्रकार्य शब्द का प्रयोग सबसे पहले किया। इस गणितीय अर्थ का विस्तार सामाजिक विज्ञानों मे भी हुआ है, सामाजिक वैज्ञानिक (Functional Relation) जैसे शब्दों का प्रयोग करते है, मेनहिम ने भी यही अर्थ अपनी विचारों मे लिया था।

5. प्राणीशास्त्रीय या सामाजिक कार्य-कलापों के रूप में प्रकार्य

प्राणिशास्त्र मे शरीर के संचालन मे उसके अंगों द्वारा दिये जाने वाले योगदान को प्रकार्य (Funtion) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यह ह्रदय का प्रकार्य है, यह गुर्दे का प्रकार्य है आदि। समाजशास्त्री प्रकार्य को इसी अर्थ मे प्रयुक्त करते है। एक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कई अंगों या तत्वों से होता है। प्रत्येक अंग या तत्व सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के अनुकूलन या पोषण के लिए जो योगदान देता है, वही प्रकार्य कहलाता है।

प्रकार्य के इन पाँचों अर्थों मे मर्टन ने पाँचवें अर्थ को अपने सिद्धांत के आधार के रूप मे स्वीकार किया है। मर्टन ने प्रकार्य के दो आधारभूत अर्थों को स्वीकार किया है--

1. एक सावयवी व्यवस्था के रूप मे प्रकार्य।

2. एक सावयवी व्यवस्था के अंतर्गत किसी लक्ष्य, उद्देश्य आदि के परिणामों के रूप मे प्रकार्य।

मर्टन के अनुसार सामाजिक प्रकार्य का संबंध हमारे अवलोकनीय वस्तुनिष्ठ परिणामों से है। प्रकार्यवादी सिद्धांतों की तीन आधारभूत मान्याएँ जिनका प्रयोग अन्य प्रकार्यवादियों ने किया है, उन तीनों मान्यताओं की उपयोगिता को मर्टन ने चुनौती दी है। वे तीन मान्यताएँ इस प्रकार है--

1. समस्त सामाजिक इकाइयां एक सामाजिक संरचना या व्यवस्था मे कुछ सकारात्मक प्रकार्यों को करती है।

2. ये इकाइयां सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के लिए प्रकार्य करती है।

3. उनके इन प्रकार्यों के आधार पर ही सामाजिक संरचना व व्यवस्था का अस्तित्व संभव होता है। अतः इकाइयों का प्रकार्य सामाजिक संरचना व व्यवस्था के अस्तित्व व निरंतरता के लिए अनिवार्य है।

मर्टन ने उपर्युक्त तीनों मान्यताओं को अस्वीकृत करते हुए कहा कि प्रकार्यवादियों की यह मान्यता गलत है कि समस्त सामाजिक इकाइयां केवल प्रकार्य ही करती है, अर्थात् सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने मे प्रत्येक इकाई कुछ योगदान देती है। मर्टन अपना ध्यान केवल संगठन तक ही सीमित न रखकर इस बात पर भी जोर देते है कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था मे पूर्ण संतुलन नही पाया जाता है। कुछ इकाइयां ऐसी भी होती है जो किसी कारणवश अपना कार्य करना छोड़ देती है, अर्थात् व्यवस्था के लिए अकार्य करने लगती है। उनके अकार्य से सामाजिक व्यवस्था विघटित होने लगती है। अतः यह कहना उपयुक्त नही है कि सामाजिक इकाइयां सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के लिए प्रकार्य करती है और उनका प्रकार्य सामाजिक संरचना व व्यवस्था के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। मर्टन का मत है कि कुछ सामाजिक इकाइयों के कार्य यदि प्रकार्यात्मक होते है, तो कुछ के अंशतः अकार्यात्मक कुछ के नकार्यात्मक और कुछ के पूर्णतः अकार्यात्मक।

अकार्य की अवधारणा को प्रकार्यवादी विश्लेषण से जोड़कर मर्टन ने इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी कमी दूर कर दी है कि यह केवल संगठन का ही अध्ययन करता है। यदि किसी सामाजिक इकाई के प्रकार्यों के साथ-साथ अकार्यों पर भी ध्यान दिया जाये तो संतुलन के साथ-साथ असंतुलन का भी अध्ययन किया जा सकता है।

प्रकार्य विषयक मान्यताएँ 

इस प्रकार मर्टन ने प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण को अधिक व्यावहारिक बनाया है। मर्टन ने प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण की कमियों का तो उल्लेख किया ही है, साथ ही अपने कुछ आधारों या मान्यताओं को भी प्रस्तुत किया है। ये मान्यताएँ निम्न प्रकार है--

1. प्रकार्यात्मक एकता या संगठन वास्तव मे एक प्रयोग सिद्ध या प्रत्यक्षमूलक संगठन है।

2. सामाजिक रीतियाँ तथा घटनाएं एक समूह के लिए प्रकार्यात्मक हो सकती है जबकि दूसरे समूहों के लिए वही रीतियाँ या घटनाएं अकार्यात्मक हो सकती है।

3. सार्वभौमिक प्रकार्यवाद की अवधारणा मे बदलाव आवश्यक है, क्योंकि एक समाज या समूह के जो प्रकार्यात्मक परिणाम है वे जरूरी नही कि दूसरे समाजों पर भी लागू हों।

4. तत्व या इकाई अनिवार्य है, इस मान्यता का भी प्रकार्यात्मक रूप मे संशोधन होना चाहिए, क्योंकि एक ही इकाई के एक से अधिक प्रकार्य भी हो सकते है और एक ही प्रकार्य की पूर्ति हेतु अनेक विकल्प भी हो सकते है। एक इकाई विशेष की प्रकृति को एक विशिष्ट संदर्भ मे ही समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रकार्यात्मक विश्लेषण इस बात पर बल देता है कि प्रकार्यों द्वारा सेवित सामाजिक इकाइयों का विशेष रूप मे स्पष्टीकरण होना चाहिए क्योंकि कुछ इकाइयों के विविध प्रकार्य भी हो सकते है जिनके कुछ परिणाम अकार्यात्मक होते है। साथ ही मर्टन ने प्रकार्यात्मक विश्लेषण को आदर्शात्मक भी नही माना है। 

प्रकार्य के स्वरूप 

मर्टन ने प्रकार्य के निम्न दो स्वरूपों के प्रत्ययों का निर्माण किया है--

1. अन्तरनिहित प्रकार्य 

अन्तरनिहित प्रकार्य वे होते है सदस्यों के द्वारा न तो स्वीकार किये जाते है और न तो इच्छित होते है।

2. प्रत्यक्ष प्रकार्य 

प्रत्यक्ष प्रकार्य वे होते है जो सदस्यों के द्वारा स्वीकार किये जाते है और स्पष्ट रूप से प्रकट एवं स्पष्ट होते है।

प्रकार्य 

प्रकार्य वे निराश्रित परिणाम है, जो कि एक व्यवस्था के अनुकूलन या सामंजस्य को स्थापित करते है।

अकार्य 

मर्टन ने अकार्य के प्रत्यत का भी विकास किया है उसका कहना है कि प्रत्येक सांस्कृतिक तथ्य का प्रकार्य ही नही होता, अकार्य भी हो सकता है, मर्टन के अनुसार अकार्य वे निरीक्षित परिणाम है जो समाज मे व्यवस्था के अनुकूलन या सामंजस्य को कम करते है।

मर्टन के अकार्य के प्रत्यत के विकसित होने से प्रकार्यात्मक विश्लेषण के क्षेत्र का विकास हुआ है। अब इस पद्धति के द्वारा सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन भी किया जा सकता है।

मर्टन ने प्रकार्यवाद के तत्वों की अपरिहार्यता को स्वीकार नही किया है। उसने इस संबंध मे कहा है कि इन्हें प्रकार्यात्मक पूर्व आवश्यकतायें मानना चाहिए।

प्रकार्यों को पूरा करने के लिये कुछ निश्चित सांस्कृतिक या सामाजिक तत्व की अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन इससे यह नही मानना चाहिए कि वे प्रकार्य अपरिहार्य है, ये तो आवश्यकताओं के घोतक है निश्चायक नही। इसका अर्थ यही है कि उन प्रकार्यों को पूरा करने के लिये यह अनिवार्य है कि सामाजिक संरचना होनी चाहिए लेकिन कौनसी होनी चाहिए इस बात का निर्णय दूसरी बातों पर भी आधारित होता है। इस संबंध मे मर्टन का कथन है कि " जिस प्रकार एक इकाई के अनेक प्रकार्य हो सकते है उसी प्रकार एक समान प्रकार्य कई भिन्न प्रकार की वैकल्पिक इकाइयों द्वारा पुरा किया जा सकता है।

मर्टन ने प्रकार्यात्मक विश्लेषण के प्रारूप का निर्माण भी किया है जिसके आधार पर अनुसंधान एवं अध्ययन किया जा सकता है। अपने प्रारूप मे उसने निम्नलिखित तथ्यों की ओर संकेत किया है--

1. सामाजिक क्रियायें या सांस्कृतिक तथ्य समस्त सामाजिक या सांस्कृतिक व्यवस्था के लिये प्रकार्यात्मक होते है।

2. ऐसे समस्त तथ्य (सामाजिक एवं सांस्कृतिक) समाजशास्त्रीय प्रकार्यों को पूर्ण करते है।

3. ये तथ्य परिणामतः अपरिहार्य होते है।

मर्टन का प्रकार्यवाद मे योगदान 

मर्टन से पूर्व समाजशास्त्रियों ने प्रकार्यवाद के संबंध मे यह विचार व्यक्त किया था कि समाज की सभी इकाइयां किसी न किसी विशेष तरह के कार्य करती है। ये सभी इकाइयां सामाजिक व्यवस्था के लिए कार्य करती है। सामाजिक व्यवस्था का निर्माण इन सामाजिक इकाइयों द्वारा किये गये प्रकार्य द्वारा ही किया जाता है। पर समाजशास्त्रियों की इन विचारधाराओं को मर्टन ने स्वीकार नही किया है। मर्टन ने प्रकार्यवाद मे अपने नवीन विचारों का योगदान किया है। इस संबंध मे मर्टन का योगदान निम्न तरह है--

1. प्रकार्य का विभाजन 

मर्टन का मत है कि समाज की सभी इकाइयां समाज के हित मे ही कार्य नही करती है। कुछ इकाइयां समाज मे विघटन की स्थिति को भी पैदा करती है। इन विघटनकारी कार्यों को दुष्कार्य अथवा अकार्य के नाम से पुकारते है। इस प्रकार मर्टन ने इकाइयों के कार्यों का विभाजन प्रकार्य एवं अकार्य रूप मे किया है। प्रकार्य वह उन कार्यों को कहता जो समाज की व्यवस्था को बनाने मे सहायक है। दुष्कार्य या अकार्य वह उन कार्यों को कहता है जो समाज मे विघटन की स्थिति उत्पन्न करते है।

2. गोचर एवं अगोचर प्रकार्यों की अवधारणाएं 

मर्टन का द्वितीय योगदान यह है कि उसने सामाजिक इकाइयों के कुछ कार्यों को ऐसा कहा है जो देखे जा सकते है तथा उनके परिणामों की कल्पना भी की जा सकती है। इन कार्यो को मर्टन गोचर या प्रकट प्रकार्य के नाम से पुकारता है। मर्टन ने ऐसे प्रकार्यों का भी वर्णन किया है जिनको देखा नही जा सकता है, मर्टन ने उन कार्यों को गुप्त प्रकार्य या अगोचर प्रकार्य के नाम से पुकारा है। इस तरह प्रकार्य अकार्य, प्रकट प्रकार्य एवं गुप्त प्रकार्य आदि की अवधारणाएं समाजशास्त्र को मर्टन की ही देन है।

3. प्रकार्यों का सामाजिक व्यवस्था मे महत्व 

मर्टन का कहना है कि प्रकार्य सामाजिक व्यवस्था को संगठित तथा व्यवस्थित बनाने वाले कार्य है। अतएव समाजशास्त्र मे प्रकार्य का ही महत्व है।

4. प्रकार्य तथा दुष्कार्य का ज्ञान 

मर्टन का यह मत है कि प्रकार्य एवं अकार्य या दुष्कार्य का पता अथवा ज्ञान किया जा सकता है।

5. सामाजिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का महत्व 

मर्टन का मत है कि प्राकर्य मे सामाजिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का भी महत्व है। प्रकार्य की उत्पत्ति मे ये दोनों ही तत्व सहायक होते है। साथ ही साथ से तत्व प्रशंसनीय भी होते है।

6. प्रकार्यात्मक एकता 

समाज मे एकता बनाये रखने हेतु प्रकार्य की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यह एक प्रयोगसिद्ध संगठन है।

7. प्रकार्यात्मक विपरीतता 

मर्टन का कहना है कि एक रीति-रिवाज एक समाज मे संगठन, व्यवस्था एवं प्रकार्य उत्पन्न करता है, पर वही रीति-रिवाज किसी दूसरे समाज मे विघटनकारी तत्वों को भी जन्म दे सकता है। इस तरह मर्टन ने बतलाया है कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक तत्व सदैव प्रकार्य को ही पैदा नही करते है, वे दुष्कार्य के जन्म के कारण भी बन सकते है।

8. सार्वभौमिक प्रकार्यवाद के प्रत्यय मे परिवर्तन 

मर्टन की यह भी देन है कि वह सार्वभौमिक प्रकार्यवाद के प्रत्यय मे परिवर्तन का पक्षपाती है। उनका कहना है कि एक समाज के प्रकार्यों को दूसरे समाजों पर भी लागू होना जरूरी नही है। 

9. अनेक विकल्पों का सिद्धांत 

मर्टन का कहना है कि समाज की एक ही इकाई के कई प्रकार्य हो सकते है तथा एक प्रकार्य के अनेक विकल्प भी हो सकते है।

10. सामाजिक इकाइयों का स्पष्टीकरण 

सामाजिक इकाइयों के प्रकार्य, अकार्य भी हो सकते है अतएव मर्टन ने कहा है कि सामाजिक इकाइयों का विश्लेषण स्पष्ट रूप से होना चाहिए।

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