9/28/2020

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत, कार्ल मार्क्स

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मार्क्स ने अपनी कृति "दास कैपिटल" मे अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत प्रतिपादित किया। अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत पर प्रमुख अर्थशास्त्री रिकार्डों के सिद्धांत का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखायी देता है। कोकर ने लिखा कि " मार्क्स ने पूँजीवाद के विकास और सामाजिक परिणामों की जो व्याख्या की है, उसकी प्रमुख बात उसका अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत है जिसे उन्होंने मूल्य के श्रम सिद्धांत के आधार पर विकसित किया। 

कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत (atirikt mulya ka siddhant)

मूल्य का अर्थ 

मूल्य को स्पष्ट करने के लिये मार्क्स ने मूल्य का दो अर्थों मे प्रयोग किया है। एक तो उपयोग मूल्य एवं दूसरा विनिमय मूल्य। अतः इन दोनों का अर्थ जानना आवश्यक है। उपयोग मूल्य का संबंध किसी वस्तु की उपयोगिता मे निहित होता है जिसके माध्यम से मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। जिस वस्तु से मानवीय आवश्यकता की जितनी अधिक पूर्ति होती है उसका उपयोग मूल्य उतना ही अधिक होता है। परन्तु यह अनिवार्य नही है कि प्रत्येक उपयोगी वस्तु का कोई मूल्य हो जैसे हवा और पानी उपयोगी तो है, लेकिन इसके बावजूद भी इनका कोई मूल्य नही होता। उपयोगिता की प्रकृति तुलनात्मक होती है जो वस्तु एक के लिये उपयोगी हो जरूर नही कि वह दूसरे के लिये भी उपयोगी हो। अर्थात् उपयोगिता को किसी वस्तु के मूल्य का आधार नही बनाया जा सकता। कार्ल मार्क्स के अनुसार विनिमय मूल्य के आधार पर ही किसी वस्तु के मूल्य का निर्धारण हो सकता है। विनिमय मूल्य वह अनुपात है जिसके आधार पर किसी वस्तु का दूसरी वस्तु से विनिमय किया जा सकता है उदाहरण के लिये यदि दस किलो दाल के बदले मे बीस किलो शक्कर प्राप्त की जा सकती है तो एक किलो दाल का विनिमय मूल्य दो किलो शक्कर होगी। मार्क्स कहते है कि किसी वस्तु का विनिमय मूल्य (Exchange value) इसलिए होती है क्योंकि उस वस्तु के उत्पादन मे मानव श्रम खर्च किया जाता है। उदाहरण के लिये वायु और जल पर कोई मानव श्रम खर्च नही किया जाता अतः उनका उपयोगी-मूल्य है परन्तु किसी वस्तु का विनिमय मूल्य इसलिए होता है क्योंकि उसमे मानव श्रम का समावेश है। स्पष्ट है कि मूल्य का अर्थ किसी वस्तु के उस विनिमय मूल्य से है जिसमे उस वस्तु के उत्पादन मे मानव श्रम खर्च किया जाता है। 

अतिरिक्त मूल्य क्या है?

मार्क्स के अनुसार अतिरिक्त मूल्य वस्तुओं के विनिमय मूल्य और श्रमिकों द्वारा प्राप्त मजदूरी मे अंतर है। मार्क्स का कथन है कि प्रत्येक वस्तु का मूल्य उस पर खर्च किये गये श्रम के अनुसार ही होता है। परन्तु बाजार मे वह वस्तु ऊंचे दामों पर बेची जाती है। यह अतिरिक्त धन पूंजीपति अपने पास रख लेता है। यही अतिरिक्त मूल्य है।

इस प्रकार अतिरिक्त मूल्य वह मूल्य है जिसे पूंजीपति श्रमिक के श्रम से प्राप्त करता है लेकिन जिसके लिये उसने श्रमिक को कोई उचित मूल्य नही चुकाया है।

उदाहरण के लिए; किसी फैक्ट्री मे एक श्रमिक कुर्सी बनाता है। इसके लिये उसे 40 रूपये मजदूरी मिलती है। कुर्सी बनाने मे 100 रूपये की सामग्री लगती है। इस प्रकार कुर्सी का मूल्य हुआ 140 रूपये। परन्तु बाजार मे वह कुर्सी 200 रूपये मे बेची जाती है।

इस प्रकार लागत मूल्य से 60 रूपये अधिक मूल्य पर कुर्सी बेची जाती है। यह अतिरिक्त मूल्य सीधा पूंजीपति की जेब मे जाता है। जबकि इस पर श्रमिक का भी अधिकार होता है।

अतः न्यायोचित मांग यह है कि श्रमिक को उसका अधिकार मिलना चाहिये। परन्तु पूंजीवादी व्यवस्था मे उत्पादन व्यवस्था मे श्रमिकों का कोई अधिकार नही होता अतः उत्पादन के स्वामी पूंजीपति इस धन को हड़प लेते है। चूंकि श्रमिकों के पास उत्पादन के साधनों को खरीदने की शक्ति नही होती इसलिए बाध्य होकर उन्हें अपना श्रम नाममात्र की कीमत पर पूंजीपति को बेचना पड़ता है और उनके श्रम से प्राप्त अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति की जेब मे चला जाता है।

इस प्रकार मार्क्स के अनुसार अतिरिक्त मूल्य के द्वारा पूंजीपति श्रमिकों का शोषण करते है, पूंजी मे वृद्धि करते है। इससे श्रमिकों के कष्टों मे वृद्धि होती है।

शोषण की अवधारणा 

कार्ल मार्क्स का मत है कि पूंजीवादी समाज का जन्म सामंतवादी समाज के बाद हुआ। ज्यों-ज्यों उद्योग धंधों मे वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण उन्नति हुई पूँजी उन लोगों के हाथों मे पहुँची जिनका उत्पादन के उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण था। पूँजी पर लोगों का अधिकार हो गया जो बड़े-बड़े कारखाने चलाने की क्षमता रखते थे। इसी से पूँजीवादी समाज का जन्म हुआ। 

पूँजीवादी समाज के विकास के संबंध मे मार्क्स का मत है कि कुछ धनी लोग श्रमिकों को खरीदते है तथा श्रमिकों को कम मूल्य पर नौकर रखकर अधिक से अधिक काम लेकर उनके श्रम से मूल्यवान वस्तुओं का निर्माण कराते है। उन वस्तुओं को बाजार मे बेचकर अधिक लाभ श्रम से मूल्यवान वस्तुओं का निर्माण कराते है। उन वस्तुओं को बाजार मे बेचकर अधिक लाभ कमाकर धन अपनी जेबों मे रखते है। इस तरह श्रमिकों के शोषण पर समाज मे पूँजीवाद का जन्म होता है। पूँजीपति एक पैसा लगाकर दो पैसे कमाता है और श्रमिकों को उनकी कमाई का एक पैसा भी आसानी से नही मिल पाता है। इस तरह पूँजीवाद फलता फूलता है एवं विकास की तरफ अग्रसर होता है।

मजदूरी का निर्धारण 

अतिरिक्त मूल्य तथा शोषण के पदों मे श्रमिक की मजदूरी का निर्धारण कैसे होता है? इस संबंध मे मार्क्स का कहना है कि," श्रमिकों को सिर्फ उतनी ही मजदूरी दी जाती है जिससे वह जीवित रहते हुए अपना पेट भर सके, काम करने योग्य बना रहे, अपना एवं बाल बच्चों का भरण-पोषण करते हुए संतानोत्पत्ति कर सके। इसी को मजदूरी का लौह नियम कहा जाता है। उसकी मजदूरी इसी सिद्धांत के अनुसार निश्चित होती है। 

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की आलोचना 

कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की अनेक कमियों एवं दोषों के आधार पर आलोचना की जाती है जो इस प्रकार से है--

1. श्रम के महत्व पर आधिक बल 

केवल श्रम के आधार पर ही किसी वस्तु का विनिमय मूल्य निर्धारित नही होता बल्कि किसी वस्तु के निर्माण मे श्रम के अतिरिक्त पूँजी प्रबंध, साहस तथा वैज्ञानिक ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। किन्तु कार्ल मार्क्स ने उत्पादन मे केवल श्रम पर बल देकर अन्य तत्वों की अपेक्षा की है। लाभ को केवल श्रम का अतिरिक्त मूल्य न मानकर इन सभी साधनों का परिणाम मानना न्यायसंगत व तार्किक है। आज के आधुनिक समाज मे विज्ञापन भी किसी वस्तु के विनिमय-मूल्य को निर्धारित करने मे महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

2. पूँजीपति द्वारा किये जाने वाले अनेक व्ययों का उल्लेख नही

पूँजीपति केवल श्रमिक को मजदूरी देने मे ही धन खर्च नही करता, बल्कि मशीनों के रखरखाव, सुधार, श्रमिकों के बीमा, बोनस इत्यादि आवश्यकताओं पर भी धन लगाता है। इन समस्त व्ययों की पूर्ति पूँजीपति द्वारा मार्क्स के तथाकथित अतिरिक्त मूल्य मे से ही की जाती है जिसका कि उल्लेख मार्क्स ने नही किया है।

3. मानसिक श्रम की अवहेलना 

मार्क्स ने मानसिक श्रम की अवहेलना की है और केवल शारीरिक श्रम को ही श्रम माना है। जबकि व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाये तो वस्तुओं के उत्पादन मे उद्योगपति तथा प्रबंधकों के मानसिक श्रम का भी योगदान रहता है। तकनीकी ज्ञान, प्रबंधन और व्यवसाय कुशलता, विज्ञापन इत्यादि वस्तुओं की बिक्री हेतु बाजार उपलब्ध कराते है जो शारीरिक श्रम की अपेक्षा कही अधिक महत्वपूर्ण है।

4. केवल विनिमय मूल्य पर आधारित 

मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत केवल विनिमय मूल्य पर आधारित है। इसमे वस्तु की उपयोगिता का कोई महत्व नही है। वास्तव मे विनिमय मूल्य भी उपयोग मूल्य पर निर्भर करता है। यदि कोई वस्तु मानव की आवश्यकता को पूरा नही करती तो उसका लाभपूर्ण विनिमय मूल्य नही होता।

5. सिद्धांत एकपक्षीय 

यह सिद्धांत एकपक्षीय है, यदि वास्तव मे देखा जाये तो वस्तुओं के मूल्यों मे सदैव उतार-चढ़ाव होता रहता है लेकिन श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी मे कोई कटौती नही की जाती। आर्थिक मंदी की स्थिति मे भी उद्योगों को भारी हानि झेलना पड़ती है। इस पर मार्क्स ने अपनी सिद्धांत मे कहीं भी चर्चा नही की।

6. क्रांति पर विशेष बल

वास्तुतः इस सिद्धांत का मूल उद्देश्य प्रत्येक स्थिति मे श्रमिकों को पूँजीपतियों का विरोध करने की प्रेरणा देना तथा वर्ग-संघर्ष द्वारा उन्हें क्रांति का रास्ता दिखाना है। इस सिद्धांत मे सिर्फ यह दिखलाया गया है कि पूँजीपति श्रमिकों का शोषण करते है। इसलिए कैरयूहण्ट ने लिखा है," यह मूल्य का सिद्धांत नही है, यह तो वास्तव मे शोषण का सिद्धांत है।"

7. सिद्धांत स्पष्ट नही

मार्क्स ने पूँजी, मूल्य और कीमत शब्दों की कही पर भी स्पष्ट व्याख्या नही की है। एलेक्जेंडर ने लिखा है ," कोई भी हमे यह नही बताता कि मूल्य से मार्क्स का वास्तव मे अभिप्राय क्या है?

उपर्युक्त आलोचनाओं के संदर्भ मे यह माना जा सकता है कि कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत पूर्णतः सही नही है फिर भी इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि श्रमिकों को उनका उचित पारिश्रमिक नही मिलता और पूँजीपति शोषण करने के लिये अपराधी है। यह सिद्धांत पूँजीवाद के इस कटू सत्य को उजागर करता है।

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